अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.31.2008
 

किस्तों में ज़िंदगी
तसलीम अहमद


बिला नागा हर महीने
चुका रहा हूँ मैं
टेलीफोन का बिल
अखबार का बिल
बिजली का बिल
सोसायटी का बिल
दूध और सब्जी-किराने वाले का बिल।
पूरी शिद्दत और हिम्मत के साथ
तमाम सपनों और उम्मीदों के साथ
बराबर
जमा कर रहा हूँ
बीमे की किस्त
मकान की किस्त
गाड़ी-स्कूटर की किस्त।
ड्योंढ़ी के भीतर से हर माह जा रही है
फ्रीज, गीजर और टीवी की किस्त।
क्या यही है मेरे शहर का अंजाम
बिल और किस्तों में
हो जाएगी ज़िंदगी की शाम।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें