अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.31.2008
 

हड़ताल
तसलीम अहमद


अचानक शहर में आ गया भूचाल
यह था सिर्फ दीवार पर चिपके एक पोस्टर का कमाल

पोस्टर क्या था, एक अँगारी थी
शायद अँगारी भी नहीं,
जेठ के माह चूल्हे की राख में दबी एक चिंगारी थी
होमगार्ड ने कर क्या दिया उस पर पेशाब
शहर भर की दिनचर्या पर पड़ गया अजाब
वहीं खड़ा था एक कर्मचारी
उसने मूत रहे होमगार्ड को लात दे मारी।

गज़ब हुआ!
वह लात तो पुलिस महकमे को जा लगी
और भड़के एक सिपाही ने वहाँ गाली आ बकी
शुरू हुआ तो रुकी नहीं गालियों की बौछार
थोड़ी ही देर में आ धमके कर्मचारी दो-चार
केस बिगड़ता देख बिगड़ गई हलका दरोगा की चाल
कभी खरबूजे सा पिलपिला तो कभी मिर्च सा लाल
थक-हार कर गिड़गिड़ाया, कराऊँगा मामले की पड़ताल
पर तब तक हो गई पुलिस के खिलाफ़ शहरव्यापी हड़ताल।

और इस तरह...
बॉस के खिलाफ़ हड़ताल ने करा दिया बडी हड़ताल का ऐलान
पहली को भूल कर्मचारी बनाने में जुटे नई का प्लान
शहरभर में लगाए गए बैनर-होर्डिंग और इश्तिहार
जैसे पहली बार मनाया जा रहा कोई राष्ट्रीय त्योहार।

मामले में यह क्या नया मोड़ आ गया
हड़ताल का मुद्दा छाई की तरह शहरभर में छा गया।

कर्मचारियों के पक्ष में आ गए श्रमिक संगठनों के कर्मचारी
पर विरोध में उतर पड़े सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी
कर्मचारियों की यह आदत उन्हें रास नहीं आई
हड़ताल के खिलाफ़ अखबार में विज्ञप्ति छपवाई
विज्ञप्ति छपते ही बढ़ी सरकार की कठिनाई
विपक्ष ने चार दिन में दस बार संसद ठप करवाई
पता नहीं चल रहा, कौन किस के पक्ष में
हाँ, वार्ताएँ लगातार हो रहीं बंद कक्ष में
संसद में हंगामे से चढ़ा राजनीति का पारा
नेताओं की चाल में देश बेचारा हारा

हर तरफ हाहाकार!
क्या बाबू, क्या रिक्शा वाला, उलझा चौकीदार
हर चौक-चौराहे पर शुरू जूतम-पैजार
देखते ही देखते सड़कें हुईं खून से लाल
और आम जनता के सिर से उतर गए बाल
किसी ने हड़ताल को हथियार बनाया, किसी ने ढाल
विरोधियों को फँसाने के लिए एक से बड़ी एक चाल

यह क्या मुसीबत!
दिल्ली एक अकेली की जान पर बन आई
चारों ओर से दी जब हड़ताल की सुनाई
विपक्ष से पिटी सरकार जब तक होश में आई
सैकड़ों लोगों ने तब तक अपनी जान गँवाई
गुस्सा सरकार को आया तो अपनी सी पर उतर आई
बड़े-बड़े हड़तालियों को जेल की सैर करवाई।

नया मोड़...
जैसे ही रखा गया संसद में हड़ताल के खिलाफ़ बिल
भूल-भाल लड़ाई सब सरकार पर पड़े पिल
बिल को लेकर देश में हो गई एक और हड़ताल
क्या बाबू क्या चपरासी, सब ठोक रहे थे ताल
बंद हुए सब ऑफिस और बनिये की टाल
किसानों ने टाँगे जुएँ, नहीं लगी किसी घोड़े को नाल
काम रखेंगे बंद, चाहे गुजरें सालों-साल
सफल बनाओ हड़ताल भैया सफल बनाओ हड़ताल।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें