अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.31.2008
 

बेज़ार चिड़िया
तसलीम अहमद


आँगन में ओंधे मुँह पड़ी लाचार चिड़िया
अभी-अभी मुंडेर से लुढ़की बेज़ार चिड़िया।

मुँह में झाग, आँखों में बेचारगी
काँपते शरीर को थामने की कोशिश में चिड़िया।

मैं दौड़ा, हथेली पर उठाया, सहलाया
मरणासन्न, पर उड़ने को बेकरार चिड़िया।

कटोरी में पानी, होठों पर इल्तिजा
कुछ भी सुनने को नहीं तैयार चिड़िया।

\डूबती आँखें, मौत से संघर्ष
फिर भी उड़ने की ज़िद पर सवार चिड़िया।

जतन किए हजार, सब गए बेकार
ज़िद की मैंने भी, तो रोई ज़ार-ज़ार।

क्यों... आखिर क्यों...?
तो हार गई चिड़िया-

मुझे पानी नहीं, पंख दे दो
एहसान नहीं, खुला आकाश दे दो।
बाज़ के चंगुल से छूटकर
गिरी थी इसी तरह आँगन में
पानी पिलाया, सहलाया, मरहम लगाया
कुछ चंगी हुई, तो छुरी ले आया।
भागी हूँ किसी तरह जान लेकर,
बाज़ सी आदमी की पहचान लेकर।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें