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04.18.2014


यथार्थ

अनगिनत है उनकी संख्या
जो मुझसे नफ़रत करते हैं।
अनगिनत है उनकी संख्या
जो मेरे राह में मेरे लिये
शोलों के पथ
काँटों की पगडण्डियाँ
तैयार करते हैं।

फिर तमाशाई बन
बड़ी उत्सुकता से
उस पथ से मेरे गु्ज़रने का
इन्तज़ार करते हैं।

जिससे कि मैं उन्हें देख
उन शोलों की जलन
उन काँटो की चुभन
को महसूस कर, भयभीत हो
शायद पुनः लौट जाऊँगा
वे ऐसा समझते हैं।

पर शायद उन्हें मालूम नहीं कि
जो इस धरती का बेटा हो।
इन अंगारों का भाई हो
इन काँटो का आशिक़ हो
उसे ये शोलों के पथ
ये काँटों की पगडण्डियाँ
कैसे जला सकते है
मंज़िल तक पहुँचने से पहले?

क्योंकि ये शोले ये शोले, ये काँटे
उन इन्सानों जैसे नहीं होते है
जो गले मिलकर भी
गला काट देते हैं।


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