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एक चित्रकार
हर रोज़
बनाता है, मिटाता है,
अनगिनत रेखाचित्र
मगर वह कभी उनमें
भरता नहीं है रंग।
वह उन रेखाचित्रों की
कोरी हथेलियों में बिछा
रेखाओं का जाल
उन रेखाचित्रों को
उनमें स्वयं रंग भरने हेतु
छोड़ देता है इस धरा पर।
कुछ रेखाचित्र
तय कर अपना लक्ष्य
परिश्रम के द्वारा
सफलता प्राप्त कर
स्वयं में रंग भर
बना लेते है
अपनी ज़िन्दगी को
रंगीन, हसीन,
तो कुछ रेखाचित्र
भाग्य भरोसे बैठ
ज़िन्दगी भर हार कर
एक दिन फँसकर
उन रेखाओं के जाल में
मिटा जाते है
स्वयं अपना अस्तित्व।
उस चित्रकार को
"विधाता"
और उन रेखा को
इन्सान कहते हैं।
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