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04.18.2014


रात को फिर कोई

रात को फिर कोई तारा टूटा होगा।
फिर कोई पंछी उससे टकराया होगा॥

आज पूनम को भी उजाला बहुत कम है,
किसी पंछी ने डैनों में चाँद छुपाया होगा॥

संवेदनाओं के जुगनू चमचमा रहे हैं,
किसी ने चिराग़े-अम्न कहीं जलाया होगा॥

आज पत्थर भी जो रो पड़ा है शायद,
प्यार से किसी ने उसे सहलाया होगा॥

नदी से अब हर अक़्स मिट गया है,
पानी को किसी ने हाथों से हिलाया होगा॥

आज फिर से चाँद लापता हो गया,
ढूँढो! किसी पंछी ने ही चुराया होगा॥

वक़्त की जो रफ़्तार तेज़ी से बदल रही है,
‘तन्वीर‘ ने उड़ने को पर फैलाया होगा॥


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