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04.18.2014


महाभारत

समरक्षेत्र से भाग गया
कलियुगी धनुर्धर
छोड़ के अपना तरकश
ढीले पड़े हैं उसके
धनुष के सारे अन्तस्तल में
वह्वि के शर।
लुटती रह गई बीच सभा में
द्रोपदी!
देखता रह गया
होकर वो निर्लज्ज।
कर लिया है उसने धारण,
निर्लज्जता का तिमिरयुक्त वसन।
भूल गया उपदेश
श्री कृष्ण के
बह गया वो
अकर्मण्यता-विलासिता
और वासना के सागर में।
इसीलिए
नहीं रचा जाता है
धर्म युद्व के लिए
अब फिर से
कोई ‘महाभारत‘।


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