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05.03.2012
 

बस यही सुर्ख़ियाँ हैं
तरूण सोनी "तन्वीर"


हो चुके हैं नपुसंक
शब्द सारे,
थोथे और अश्लील अर्थों के
झुण्ड में शामिल होकर,
तालियों की गड़गड़ाहट के
शोर गुल में
पुरस्कृत होने को!

लिखा जाता है हर बार
एक नया वसीयत नामा
उन नर कंकालों के माथे पर
जो अकालों, बाढ़ों-भुखमरी
और आतंकवाद की
भेंट चढ़ गये!

महज़ अपनी कुर्सी
बचाने को।
फैंक दिये जाते है
फिर कुछ नवजात
झाड़ियों में
नई कथाऐं रचने को।

और थमा दी जाती है,
लगाम
अंधे अक्षरों के हाथों में
हाकनें,
स्वर्णिम भविष्य के रथ को।

बस... यही सुर्खियाँ हैं
आज के वर्तमान की
तुम्हें सुनाने को!!!


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