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04.18.2014


आओ प्रिये! आओ

आओ प्रिये! आओं
फिर रात ढली
फिर चाँद पुकारे
ज्यों रोशनी को
चिराग तरसे।
यों तुम्हारी याद में
नैन बरसे।।
आओ प्रिये! आओ
दिल की हर धड़कन
तुम्हें पुकारे।।
तुम्हारी छुअन से मिलती
नई चेतना मुझको।
नेह में डूबी हुई
नई प्रेरणा मुझको।
वही चिर-परिचित सम्बल,
वही तुम्हारा अहसास,
और सम्वेदना
आज भी
दिल में महफ़ूज़ है।
आओ प्रिये! आओ
मेरी सम्वेदना
तुम्हें पुकारे।।
शब्द सुगन्ध औ स्पर्श की
कल्पना में नहाई रोशनाई
और रात के धुँधलके में
चाँदनी की भाँति
प्रिये! मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।
आओ प्रिये! आओ
श्वासों का नेह-बन्धन
तुम्हें पुकारे।।
आओ प्रिये! आओ।।


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