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03.09.2008
 

मेरी मज़ार पे एक चिराग़ जला गया कोई
तरुण शर्मा


मेरी मज़ार पे एक चिराग़ जला गया कोई
बुझती उम्मीदों को एक आस दिखा गया कोई

आज की रात बहुत बेचैन है कटती ही नहीं
सुबह का एक ख़्वाब इसे दिखा गया कोई

एक तेरे दर्द के बीमार थे हम, मर भी गए
उसकी दवा सारे शहर को पिला गया कोई

अपना चेहरा पहचानता तो था मैं लेकिन
एक आईना कल रात मुझे दिखा गया कोई

मैं एक कागज़ को लिए सोचता ही रहा तुझको
तेरी एक तस्वीर फ़लक पे बना गया कोई


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