मेरी मज़ार पे एक चिराग़ जला गया कोई तरुण शर्मा
मेरी मज़ार पे एक चिराग़ जला गया कोई बुझती उम्मीदों को एक आस दिखा गया कोई आज की रात बहुत बेचैन है कटती ही नहीं सुबह का एक ख़्वाब इसे दिखा गया कोई एक तेरे दर्द के बीमार थे हम, मर भी गए उसकी दवा सारे शहर को पिला गया कोई अपना चेहरा पहचानता तो था मैं लेकिन एक आईना कल रात मुझे दिखा गया कोई मैं एक कागज़ को लिए सोचता ही रहा तुझको तेरी एक तस्वीर फ़लक पे बना गया कोई