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05.31.2008
 

सीढ़ियाँ...
तरुण भटनागर 


हर सीढ़ी बनाई गई है,
तभी तो,
कोई सीढ़ी नहीं है,
माउण्ट एवरेस्ट, आकाश, तारों ....तक।
सोच कहाँ जाती है,
बनाने से परे,
अगर जाती,
तो क्या
होता,
उस हर ऊँचाई का,
जहाँ तक सीढ़ियाँ जाती हैं।
कौन सोच पाता है,
सीढ़ियाँ आकाश तक।
सुना है, रावण ने सोचा था,
पर, राम ने उसे मार दिया।

(2)
पहुँच जाती,
भगवान तक,
हर मंदिर की सीढ़ियाँ,
अगर
वे,
मंदिर की न
होतीं।
उनके लिए चुने गये हैं,
देवस्थान, ईष्ट और लोगों के सपने।
अर्सा हुआ,
जब वे पहली बार,
भूली थीं,
भगवान का रास्ता।
अब वे सीढ़ियाँ,
जहाँ जाकर खत्म होती हैं,
वहाँ है,
मंदिर का चबूतरा,
जिस पर पिछले पचास सालों से,
माथा टेक रही है,
पास के झुग्गी वाले,
गरीब, सुदामा की माँ।
जी में आता है,
इन सीढ़ियों को रख दूँ,
किसी बस्ती में,
लोगों के बीच,
ताकि,
वे पहुँच जायें,
मनचाहे आदमी तक,
नीचे से ऊपर,
ऊपर से नीचे।
रख दूँ,
इन सीढ़ियों को,
रात के तारे भरे आकाश,
और मेरे घर के आँगन के बीच,
ताकि,
धीरे-धीरे पहुँच जाये,
मेरी दो साल की
बेटी,
उसके लाडले चंदा मामा के पास।
रख दूँ
इन सीढ़ियों को,
बाजार में,
ताकि इसे खरीद ले जाये,
माउण्ट एवरेस्ट का कोई
दीवाना।
रख दूँ,
इन सीढ़ियों को,
अपनी पहली प्रियतमा,
और अपने अतीत के बीच,
ताकि वहा जान जाये,
जो उसने नहीं जाना,
जिसे सोच मैं घुटता हूँ,
कि वह जान जाती।
रख दूँ
इन सीढ़ियों को,
किताबों पर,
जानने वह सब,
जो चाहकर,
भी नहीं लिख पाया,
उसका लेखक।
रख दूँ
इन सीढ़ियों को,
रेगिस्तान में,
ताकि रेत के कुछ टीले,
उसपर चढ़कर,
बादलों के पास जाकर,
पूछ सकें,
कि कब तक मुँह फेरे रहोगे।
मैंने सोचा है,
मैं एक दिन,
उसे मंदिर से उखाड़ ही लूँगा,
ताकि रख सकूँ,
ऐसी ही किसी जगह
पर।

(3)
शहर में,
नई इमारतों के साथ,
कुछ खण्डहर भी रहते हैं।
वे सदियों से,
टूटकर, बिखरकर, लड़कर...
उनपर उग आने वाली घास से जूझते हुए,
अब खण्डहर कहलाते हैं।
पर उनकी सीढ़ियाँ नहीं बदलीं।
वे आज भी वैसी ही हैं
जैसी उस समय थीं,
जब सदियों पहले उन्हें बनाया गया था।
जब खण्डहर पूरी तरह ढह जायेंगे,
हो जायेंगे मिट्टी
तब
सिर्फ़ सीढ़ियाँ रह जायेंगी,
जैसे शहर के कुछ मैदानों में,
कुछ सीढ़ियाँ अकेली खड़ी हैं.
उन खण्डहरों की सीढ़ियाँ,
जो अब नहीं
हैं।

(4)
उस बहुमंजिला इमारत में,
सीढ़ियों के स्थान पर,
लिफ्ट लगा दी गई है।
पहले वहाँ,
ऊँचाई थी,
चढ़ाई थी,
पर अब,
सिर्फ़ पहुँच है।
पहले,
हंफनी थी
कूदती सी धड़कन थी,
धौंकन थी,
पर अब,
सिर्फ़ घड़ी है।
पहले,
पहुँचने पर,
क्षण भर को सुस्ताने का सुख था,
पर अब,
पहुँचने पर भी,
हड़बड़ी है, भ्रम है...।
पहले,
हर कदम पर,
होता था गणित,
कि अभी और कितना चलना है,
पर अब,
मंजिल का ¬याल ही नहीं रहा,
मानो वह किसी और का सिरदर्द हो।
पहले,
सीढ़ियों वाले साथी,
देर तक साथ रहते थे।
साथ चलती थीं उनकी बातें,
उनके सुख, उनके दु:ख.....
पर अब,
बस बात शुरू करने के पहले की बात है।
पहले,
पहुँचने की जद्दोजहद थी,
पर अब,
लगता है,
जैसे मैं और मेरी मंजिल
एक दूसरे से चिपक गये हैं,
मानो मंज़िल मंज़िल नहीं,
मैं, मैं नहीं......।


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