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05.31.2008
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फोटो का सच
तरुण भटनागर 


 

वे बैठे रहे। क्लर्क ने अपनी फाइलों से अपनी आँख ऊपर करते हुए उन्हें उड़ती नजर से देखा। फिर बेपरवाही से कहने लगा-

बाबा। फोटो नहीं चलेगी। कोई डाक्यूमेण्ट लाना पड़ेगा।

उनका भ्रम क्षण भर को टूटा। फोटुओं को सबसे बेहतर मानने का भ्रम। पर दूसरे ही पल वे संभल गये। वे जानते हैं इन फोटुओं से बेहतर कुछ नहीं।उन्हें यकीन है,इनसे बेहतर कुछ नहीं। उन्होनें पलभर सोचा। बस वे क्लर्क को समझा नहीं पाये हैं। इतनी सी तो बात है। बस समझाना है, कि ये फोटुयें सबसे बेहतर कैसे हैं ? उन्हें उस क्लर्क पर थोड़ा गुस्सा भी आया। उनके मन में आया कि कह दें- ये फोटुयें बेहतर हैं। बेहतर हैं उन सब चीजों से जिन्हें तुम रोज देखते हो। क्योंकी तुम्हारे देखने में छलावा है। तुम्हारा देखना डरी हुई आँख का देखना है। उस आँख का देखना है, जो तुम्हारे मन के पैरों तले नाक रगड़ती है। उस आँख का देखना है, जो हर बार देखने से पहले तुम्हारे मन से पूछती है, कि यह देखूं या नहीं। और अगर देखूं तो इस दृश्य से क्या-क्या काट दूँ। क्या-क्या छुपा दूँ। छि: कितने गंदे तरीके से देखती है, आँख.....। आँख का देखना भी कोई देखना है। देखना है, तो इन फोटुओं को देखो। ये उस कैमरे से खींची गई हैं, जिसका कोई मन नहीं है। जिसपर किसी के मन का बस नहीं चलता। जो वही दिखाता है, जो है। और इन फोटुओं के बाद भी तुम कहते हो कि, कोई डाक्युमेण्ट लाओ। ....पागल हो गये हो क्या? तुम्हें शर्म नहीं आती। .....पर वे चुप रहे। उन्हें लगा मामला कहीं बिगड़ ना जाये।

डाक्यूमेण्ट वाला प्राब्लम तो आपको पता है।

फिर तो बड़ा मुश्किल है।

अच्छा तो आप ये वाली फोटो देख लो।

अरे बाबा..............।

आप देख तो लो। मुझे यकीन है कि आपके बड़े अधिकारी इस फोटो पर सहमत हो जायेंगे। फिर किसी चीज की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

देखिये ये काम करते हुए मुझे दस साल हो गये हैं। मैं जानता हूँ ऐसे नहीं हो सकता।

अच्छा आप देख तो लो.............।

क्लर्क ने उनकी ओर हिकारत भरी नजर से देखा। पर इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। वे उठे और क्लर्क की टेबल के सामने खड़े हो गये। उन्होनें दूसरी तस्वीर उस क्लर्क के सामने रख दी। क्लर्क उस फोटो को देखने लगा। उन्हें अच्छा लगा कि वह अबकी बार वह फोटो को देख रहा है। उन्हें लगा बात बन जायेगी। वे क्लर्क को बताने लगे।

ये जीवेन्द्र की आखरी फोटो है। देखो ये मैं हूँ। मैं नहीं चाहता था कि शालिनी उसके क्रेमनेशन में जाये। हमारे यहाँ औरतें नहीं जाती है। पर वह जिद कर के गई थी। स्ट्रांग लेडी........। देखो ये वही है। जीवेन्द्र की चिता के पीछे खड़ी है.................।

उन्होनें बहुत सपाट ढंग से कहा। क्लर्क उनकी ओर देखने लगा। वे इस फोटो को नहीं लाना चाहते थे। वे पहली वाली ब्लैक एण्ड व्हाइट फोटो भी नहीं लाना चाहते थे। पहले वे कुछ दूसरी फोटुयें ला रहे थे। उन्होंने कुछ दूसरी फोटुयें लोहे के बक्से से निकाल भी ली थीं। वे उन्हीं फोटुओं को लाने वाले थे। उनमें से एक फोटो इiण्डयन मिलिट्री एकेडमी में खींची गई थी। उस रोज एकेडमी में जीवेंद्र की पासिंग आउट परेड थी। वह अपनी मिलिट्री वाली ड्रेस में था। उसने अपनी ड्रेस में वे तमगे लगा रखे थे,जो उसे कुछ देर पहले मिले थे। उसकी शर्ट की बकल पर एक तमगा शालिनी ने भी लगाया था। वह मिलिट्री का अफसर बन चुका था। फर उन तीनों ने वह फोटो खिंचवाई थी। वे, जीवेंद्र और बीच में शालिनी। वह फोटो बड़ी सपाट थी। उस फोटो में स्पष्ट था, कि यह जीवेन्द्र है और ये वे। पूरे बाइस साल का जीवेन्द्र। उनका पूरा परिवार। स्पष्ट सबूत। ये वे हैं, जीवेन्द्र के पिता। कितना स्पष्ट। .........ऐसी कई फोटुयें हैं उनके पास। बिल्कुल स्पष्ट। पर वे उन फोटुओं की जगह ये फोटुयें ले आये। फोटुओं को टटोलते वक्त वे इन फोटुओं पर रुक गये थे। फिर उन्हें ही उठा लिया। वे जानते हैं ये फोटुयें स्पष्ट नहीं हैं। एक सबूत के तौर पर स्पष्ट नहीं हैं। पहली फोटो में गोद में एक बच्चा है। सामने वाला पूछ सकता है, कि वह बच्चा जीवेन्द्र कैसे है। वह कोई और बच्चा भी तो हो सकता है। दूसरी फोटो में जीवेन्द्र की चिता है। उसमें जीवेन्द्र की शकल नहीं दिख रही है। दोनों ही फोटुओं में जीवेन्द्र छुपा हुआ है। फिर वे कैसे कह सकते हैं, कि यह रहा जीवेन्द्र और ये वे। कितनी अस्पष्टता, कि वे कह भी नहीं सकते कि अब कोई गुंजाइश नहीं.....यही सबूत है, कि वे ही जीवेन्द्र के पिता हैं।

पर फिर भी वे उन्ही फोटुओं को ले आये। वे दूसरी फोटुयें ले आये। उनका मन हुआ कि वे इन्हीं फोटुओं को ले चलें। उनके लिए फोटो का एक सबूत होना बेमानी हो गया। फोटो का स्पष्ट होना बेमतलब की बात हो गया। वे बस इन्हीं फोटुओं को ले जाना चाहते थे। ये फोटुयें उनकी पसंदीदा फोटुयें जो हैं। फिर उन्होंने अर्से से इन फोटुओं को नहीं देखा था। इन फोटुओं पर किसी से बात नहीं की थी। उनका मन हो रहा था, कि वे इन फोटुओं को किसी को दिखायें। किसी से इन फोटुओं पर बात करें। अगर जीवेंद्र मरा नहीं होता और शालिनी इस तरह दु:खी नहीं होती कि पूरा समय चुप बनी रहे, तो वे शालिनी से ही बात करते। हमेशा की तरह शाम की चाय के साथ इन फोटुयें के बारे में बतियाते। पर यह संभव नहीं है। लेकिन आज उन्हें ऑफिस के क्लर्क से इन पर बात करने का बहाना मिल गया। इन फोटुओं के बहाने, इन फोटुओं पर बात। उनके भीतर कुछ कुलबुला रहा था, जैसे पतीले में खौलता पानी और उसकी भाप से ढक्कन पर जमा लटकती पानी की बूँदें.....। गर्म और गीला, दोनों एक साथ। उनका खुद पर नियंत्रण नहीं रहा। उन्हें वे फोटुयें ही ले जानी पड़ीं।

इन फोटुओं को लाते वक्त उनके मन में एक बात और थी। उन्हें लगता इन फोटुओं को देखकर क्लर्क पसीज जायेगा। क्लर्क को उन पर दया आ जायेगी। वह उनकी पीड़ा महसूस कर पायेगा। उसका मन खुद उससे कह देगा, कि बहुत हो गया इस दु:खी आत्मा को भटकाते। फिर वह उनसे जीवेन्द्र का पिता होने का सबूत नहीं माँगेगा। वह माँग ही नहीं पायेगा। और यूँ बात आसान हो जायेगी। उनका काम हो जायेगा। रास्ता सुगम हो जायेगा। पर जब-जब उन्हें यह ख्याल आता उन्हें खुद पर शर्म आती। वे ग्लानि से भर जाते। यूँ एक चोर उनके भीतर दुबका बैठा था। उन्हें लगता वे अपना रास्ता निकालने के लिए इन फोटुओं का सहरा ले रहे हैं। उन्होंने कभी इन फोटुओं को अपना रास्ता साफ करने वाली चीज के रूप में नहीं देखा था। उन्हें इन फोटुओं से लगाव था। उन्हें इन फोटुओं से प्यार था। उन्होंने इन फोटुओं को लाभ वाली किसी चीज की तरह नहीं देखा था। उन्हें लाभ वाला गणित सूझा ही नहीं। और जब एक क्षण को यह खयाल आया कि इन फोटुओं के सहारे उनका रास्ता सुगम हो जायेगा, तो वे खुद को जैसे बरदाश्त नहीं कर पा रहे हों। कितना गंदा खयाल है। जब भी वे ऐसा सोचते तो खुद को झटकारने का बेतुका सा प्रयास करते, जैसे कीचड से सनी भ्ौंस अपने शरीर को झटकारती है, पर हर बार झटके के साथ उड़ने वाले कीट पतंगे फिर से उसके शरीर पर आकर बैठ जाते हैं। जब जीवेन्द्र मारा गया था, उन्हें यकीन नहीं हुआ था। उन्होंने जीवेन्द्र को हटाकर नहीं सोचा था। उन्हें नहीं सूझा कि जीवेन्द्र को हटाकर भी सोचा जा सकता है। तभी उन्हें लगा था, जैसे किसी ने उनसे भद्दा मजाक किया हो। फिर जब लगा कि मजाक नहीं है। तब वे देर तक यकीन करते रहे कि बात गलत है। वह सुबह थी। करीब छह बज रहे थे। जीवेन्द्र की ब्रिगेड के ब्रिगेडियर का फोन आया था। वह उन्हीं का फोन था। उन्होनें बिना कुछ इधर-उधर की बात किये स्पष्ट बताया था कि सेकेण्ड लैफिटनैण्ट जीवेन्द्र माथुर एक एम्बुश में मारा गया। उन्होंने कुछ और जगह से फोन पर इस बात को कन्फर्म किया। जीवेन्द्र के एक साथी का भी फोन आया। फिर टी. वी. पर न्यूज़ में भी आया.........। शालिनी सो रही थी। वे देर तक शालिनी से कह नही पाये कि जीवेन्द्र अब नहीं है।

उन्होनें वह फोटो अपने हाथ में उठा ली।

ये जो शालिनी के पास खड़ा है। ये देखो.................। ये सांवला सा लड़का। यह जीवेन्द्र का दोस्त है। एस. पिल्लई। आजकल लैफिटनेण्ट हो गया है। जीवेन्द्र अगर ज़िंदा होता तो वह भी लैफिटनेण्ट होता। ........लड़ाई में जाने से पहले जीवेन्द्र वोदका की एक बोतल लाया था। आप जानते हो वोदका। एक रूसी शराब होती है। उसने कहा था, जब हम जंग जीत लेंगे तब वह बोतल खोलेंगे। हम जंग जीत चुके हैं। मेरे पास आज भी वह बोतल है। वह बंद है। मैंने उसे नहीं खोला। मैंने उसे संभाल कर रख लिया है।

उनकी उंगलिया फिर से काँप रही थीं। उन्होंने वह फोटो क्लर्क की टेबल पर रख दी।

उन्हें वह दिन याद आया जब जीवेन्द्र को मरणोपरांत सम्मान दया गया था। वे और शालिनी दोनों साथ-साथ थे। मिलिट्री का बैण्ड बज रहा था। शालिनी रो रही थी। वे शालिनी को समझा रहे थे। कुछ लोग उनसे हाथ मिला रहे थे। जीवेन्द्र उनकी एक मात्र संतान थी। उन्हें इच्छा हो रही थी, कि वे लोगों को जीवेन्द्र के बारे में बतायें। पर हर मौका जाता रहा। जब लोगों ने पूछा, वे चुप रहे।

वे क्लर्क से कहने लगे-

पता नहीं क्यूँ सब अविश्वसनीय सा लगता है। जैसे कुछ भी नहीं हुआ हो। बचपन में जब जीवेन्द्र छोटा था, मैं उससे बहुत कम बात कर पाता था। मेरी नौकरी कठिन थी। मैं अक्सर देर रात घर लौटता। अक्सर जब मैं रात को घर लौटता, वह सो चुका होता था। सुबह-सुबह वह जल्दी स्कूल चला जाता था। मैं थका होने के कारण अक्सर सुबह जल्दी नहीं उठ पाता था। मैं उससे बहुत कम बात कर पाता था। उन दिनों जीवेन्द्र तीन-चार साल का था। रात को सोने से पहले मैं थोड़ी देर बिस्तर पर लेटे-लेटे कोई नॉवेल पढ़ता। तब यदा-कदा जीवेन्द्र नींद में ऊँघता सा अपने कमरे से दबे पाँव चलकर मेरे कमरे के दरवाजे तक आता और धीरे से पर्दे के किनारे से झाँककर मुझे देखता था। मैं उसे अपने पास बुला लेता। फिर वह नॉवेल के पन्ने पलटता और उसके बारे में मुझसे पूछता। .........आज भी एक भ्रम सा होता है। जैसे घर के किसी पर्दे के पीछे से वह झाँककर मुझे देख रहा है। कितनी पुरानी है यह बात। पर लगता है जैसे वो अभी आ जायेगा। जैसे वह आ सकता है....................।

कहते-कहते वे अचानक रुक गये। उन्होंने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। दूसरी तरफ एक कोरी सफेद दीवार थी। वहाँ कुछ भी नहीं था।

वे अपने आप को समझाते रहते है। वे खुद को समझाते हैं कि कुछ भी तो नहीं हुआ। वे कोशिश करते हैं कि उनका चेहरा सामान्य ही दिखे। पर कुछ है जिस पर वे नियंत्रण नहीं कर पाते हैं। जब मुट्ठी भींचते हैं तो वह पिचड़कर उंगलियों को सानता हुआ, उंगलियों के बीच से बाहर निकलने लगता है। उनके चेहरे पर कुछ रेखायें उभर आती है। वे रेखायें उनका कहना नहीं मानती है। आँखों में उतरने वाला पानी सबकुछ धुंधला देता है। यह सब वे दूसरों को नहीं दिखाना चाहते हैं। यह सब उन्होंने शालिनी से भी छुपाया है। पर वह सब छुप नहीं पाता है। दूसरों के सामने उन्हें खोल देता है। और तब एक बात छूट जाती है। जीवेन्द्र की बात। जिसे वे बता रहे थे। जिसे वे बता नहीं सकते।

फोटो की बात। जिसे वे कह रहे थे। अधूरी छूट जाती है। एक लाइन है जिसके पार वे नहीं जा पाते हैं। एक लाइन जहाँ फोटो की बात खत्म होती है और उनकी अपनी बात शुरू होती है। जिसे वे पूरे एक साल बाद भी किसी से कह नहीं पाते हैं। शालिनी को तो कभी कह ही नहीं सकते। बाकी लोग अजनबी है। उनसे क्या कहना? इस क्लर्क से जाने वे कैसे कह गये। वे खुद को रोक नहीं पाये। शरीर के साथ-साथ मन में भी एक कमजोरी आ गई है। फिर यह फोटो का जादू है। फोटो कहलवा देती है। उन्हें कहना पड़ता है। उन्होंने कह दिया। फोटो के कारण वे रुक नहीं पाये।

कई बार उनका मन करता है, वे अपने को बिखर जाने दें। सिर्फ़ एक बार। फिर बहता पानी खुद ढाल ढूँढ लेगा। चीजें फिर से उन्हीं जगहों पर जमने लगेंगी, जहाँ से वे हटी हैं। पर वे ख़ुद को ढ़ांढ़स बंधायें रहते हैं। अभी नहीं। यह ठीक नहीं है।

उनका चेहरा दूसरी ओर था। क्लर्क उनका चेहरा नहीं देख सकता था। पानी से भरी उनकी आँखों ने सामने के दृश्य को धुंधला बना दिया था।

बाबा....................। परेशान मत हो।

क्लर्क ने धीरे से कहा।

वे उठ खड़े हुए। उन्होंने अपने आँसू पोछे। वे जाने लगे। जाते-जाते उन्हें क्लर्क की बात सुनाई दी-

बाबा.... इस काम में फोटो की कोई वैल्यू नहीं है। कोई कागज पत्तर हों तो ले आना......।

वे चले गये। क्लर्क अपने काम में लग गया। पता नहीं वे भूल गये या छोड़ गये....... वे दोनों फोटो क्लर्क की टेबल पर कुछ दिनों तक पड़ी रहीं।

 

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