अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.31.2008
3

फोटो का सच
तरुण भटनागर 


कितनी अजीब चीज है, किसी बात को याद करना। जैसे बैकवॉटर होता है। समुद्र में डूबने वाली नदी में रोज चढ़ता समुद्र के ज्वार का बैकवॉटर। वह नदी के प्रवाह के विपरीत नदी में चढ़ता है। नदी का जो पानी समुद्र में मिल जाता है, समुद्र में डूब जाता है और यूँ खुद को खोकर समुद्र हो जाता है, वही पानी फिर से नदी में चढ़ता है। नदी में उतरता है। नदी के बहाव के विपरीत नदी में फैलता जाता है। कभी आपने देखा है, यह दृश्य। यह समुद्र किनारे का सामान्य दृश्य है। वहाँ यह रोज होता है। हमारे जीवन में भी यह रोज होता है। एक ज्वार के साथ, यादें चढ़ती हैं समय की धार के विपरीत। फिर ज्वार खत्म होने लगता है और यादें समय के प्रवाह के विपरीत उतरती हैं और फैलने लगती हैं। पता ही नहीं चलता है कि, कहाँ है बहते समय की धार और चढ़कर घुलती यादें। सबकुछ फैलने लगता है और यूँ समुद्र के किनारे एक झील सी बन जाती है। वह झील सा इकट्ठा पानी देर तक बना रहता है। हम खुद में डूबे रहते हैं। पर फिर चढ़े हुए पानी को वापस जाना होता है। यादों को लौटना होता है। यादें लौटती हैं। पानी वापस समुद्र में उतरता है। दिन फिर से चल निकलता है। नदी वापस बहने लगती है। सारा पानी फिर से समुद्र में मिलने लगता है। दिन अपनी धार पकड़ लेता है। रुका हुआ समय बहने लगता है।

उन्हें क्लर्क से फोटो के बारे में कहते हुए अच्छा लग रहा था। यह तस्वीर अक्सर वे और शालिनी ही देखते रहे हैं। वे दोनों ही इस पर बात करते रहे हैं। उन्हें नहीं याद कि यह तस्वीर उन्होनें किसी और को इस तरह दिखाई हो। पूरी संजीदगी के साथ। खुलकर। कभी कदास घर आने वाले लोगों में से कुछ ने पुराना एलबम पलटते हुए एक उड़ती नजर से इस फोटो को देखा होगा। पर उन्हें नहीं याद कि किसी को उन्होंने इस फोटो की बात बताई हो। शायद ही किसी और को इस फोटो की बात पता हो। उन्होनें इस फोटो के बारे में आज पहली बार किसी बाहरी आदमी से बात की। हो सकता है, किसी और से भी की हो। पर उसे इस फोटो के बारे में इतना नहीं बताया होगा। बस इतना ही कहा होगा-यह जीवेन्द्र के जन्म के समय की फोटो है। ये जो मेरी गोद में है। यह बच्चा यह जीवेन्द्र है। ....या ऐसी ही कोई बात। यह क्लर्क पहला आदमी है जिसे वे इस फोटो के बारे में इतना कुछ बता रहे हैं। बहुत विस्तार के साथ बता रहे हैं। वे इस फोटो को बहुत संभालकर रखते हैं। उस समय ब्लैक एण्ड व्हाइट फोटो ही खिंचती थी। कितनी अदभुत है, यह फोटो............।

क्लर्क बेपरवाह था। वह उनकी बात सुन भी रहा था और नहीं भी। वह कभी फाइल गोदने लगता, तो कभी बीच में उनकी ओर देखकर मुस्कराता। उसकी मुस्कान बनावटी थी। वह उन्हें टालने के कुछ संकेत दे रहा था, जिस पर उनका ध्यान नहीं गया। वे फोटो और उसकी बातों में डूबे रहे।

बहुत दिनों से उन्होनें खुद यह तस्वीर नहीं देखी थी। जीवेन्द्र की मृत्यु के बाद सारी फोटुयें और एलबम बक्से में बंद रहे। वे कुछ दिनों से उन फोटुओं को शालिनी के साथ शाम को चाय पीते हुए, पुराने दिनों की तरह देखना चाहते थे। वे कुछ दिनों से खुद को तैयार कर रहे थे। वे खुद को तैयार कर रहे थे कि, वे किस तरह इस फोटो का सामना करेंगे। जीवेन्द्र के मरने के बाद इस फोटो के मायने बदल गये है। उन्हें लगता है यह फोटो उन्हें कमजोर बना देगी। उनके भीतर जो चीजें इकट्ठा होकर, नया आकार ले रही हैं, वे फिर से इधर-उधर हो जायेंगी। उनका मन करेगा कि वे शालिनी के कंधों पर अपना सर रखकर थोड़ा देर रो लें। जैसा वे यदाकदा अवसाद और पीड़ा के समय करते आये हैं। पर वे ऐसा नहीं कर पायेंगे। उन्हें अब शालिनी का कंधा इतना कमजोर लगता है कि, अगर उन्होनें उस पर अपना सिर रख दिया तो वह कंधा टूट जायेगा। वे शालिनी के कारण खुद को रोक रखते है।

पुराने दिनों इस फोटो को देखकर वे और शालिनी लगभग एक सी बातें किया करते। शालिनी कहती- तुम तो जीवेन्द्र को इस तरह गोद लिये हो जैसे तुम्हें बच्चे पालने का एक्सपीरियेंस हो। वे कहते- देखो सबसे पहले माँ का रोल मैंने किया था। .............एक सी बातें। इस फोटो की बात कभी खत्म नहीं हुई। कभी रुकी ही नहीं। सोचा ही नहीं था कि एक दिन बात रुक जायेगी और फोटो बक्से में रख दी जायेगी। पूरे एक साल तक हम यह फोटो नहीं देखेंगे। इस फोटो पर कोई बात नहीं करेंगे। ...............कभी सोचा ही नहीं था।

फोटुओं का मतलब कितनी जल्दी बदल जाता है। उनका अर्थ कभी स्थाई नहीं रहता। फोटुयें बहुत निर्लज्जता के साथ बदल जाती हैं। अब इसी फोटो को लो। कहाँ तो शालिनी अक्सर इस फोटो को देखती रहती थी। वह कभी अघाती नहीं थी। गहराई से, टकटकी लगाकर वह इसे देखती रहती थी। इसे देखकर हँसती थी। इस पर चहकते हुए बात करती थी। और आज....। आज वह इसे देख भी नहीं सकती। उसे डर लगता है। वह टूटकर दु:खी हो जाती है। वह इस फोटो को देखकर अब नहीं हँस सकती। वह इस फोटो पर अब चहकते हुए बात नहीं कर सकती। और तो और वह इस फोटो का सामना तक नहीं कर सकती। वह इस फोटो को नहीं देख सकती। पूरे एक साल से यह फोटो लोहे के बक्से में अपने एलबम में दबी हुई पड़ी रही। जैसे इस फोटो के हाथों कोई पाप हो गया हो। शायद पाप ही हुआ है। इस फोटो ने एक पाप किया है। इस फोटो ने जीवेन्द्र की यादों को बनाये रखने का पाप किया है। वे यादें आज भी उस फोटो से निकलकर बाहर आ रही हैं। यह फोटो कभी जान ही नहीं पाई, कि ये यादें जिन्हें वह इकट्ठा कर रही है, एक दिन उसके नियंत्रण के बाहर हो जायेंगी। और तब सब फोटो का यह पाप जान जायेंगे। एक दिन ऐसा ही हुआ। यादें उसके नियंत्रण से बाहर हो गईं। शायद यह नहीं सोचा गया था, कि एक दिन सब कुछ खुल जायेगा। और यह फोटो एक अपराधी बन जायेगी। वे और शालिनी यह सब जान चुके हैं। जान चुके हैं कि इस फोटो ने पाप किया है। जिस दिन उन्होंने यह जाना, बस उसी दिन, ठीक उसी दिन उन्होंने उस फोटो को लोहे के बक्से में बंद कर दिया। यह उसके पाप का दण्ड है, कि वह उनकी नजरों के सामने ना आये। कैद रहे उन यादों के साथ, जो उसने इकट्ठी की हैं। पर वे इस फोटो को धोखेबाज नहीं कहते हैं। उन्हें इस फोटो से प्यार है। वे इसे धोखेबाज नहीं कह सकते।

उनके हाथ हल्के से काँप रहे थे। उनकी उंगलियों में दबी वह तस्वीर भी काँप रही थी। उस तस्वीर के ग्लेज़्ड पेपर पर पड़ रही टयूबलाईट की रोशनी भी काँप रही थी। पता नहीं वे उंगलियाँ क्यों काँप रही थीं ? शायद बुढ़ापा या शायद कुछ और..............। यूँ  उंगलियाँ बेवजह नहीं काँपती।

ही वाज ए लवली चाइल्ड।

उन्होनें धीरे से ããसाते हुए कहा। इतना धीरे कि क्लर्क नहीं सुन सकता था। वास्तव में यह बात उन्होनें अपने आप से कही।

उनका ध्यान ही वाज पर नहीं गया। यह उन्हें अब सामान्य लगता है। यह कहते हुए उन्हें कोई हिच नहीं होता। पर कई बार जब वे अकेले होते हैं, तब वे खुद से जीवेन्द्र के लिए नहीं कह पाते हैं- ही वाज। पर दूसरों से कह पाते हैं। वास्तव में दूसरे के सामने खुद से भी कह पाते हैं। जीवेन्द्र के मरने के बाद एक साल में डाइल्यूट हो गया है- ही वाज। पर सिर्फ़ उनके लिए, शालिनी के लिए नहीं। उसके लिए ये शब्द आज भी जड़ हैं। उनका अर्थ समय नहीं बदल पाया है। वे इंतजार कर रहे हैं, कि चीजें शालिनी के लिए भी बदल जायें। पर अब इंतजार करते-करते वे थक गये हैं। वे मानते है कि कुछ चीजें छूट जायें। जैसे ट्रेन से फेंका डिस्पोजेबल गिलास होता है, जिसके लौटने की कोई उम्मीद नहीं। एक दिन ठीक इसी तरह फेंक दिया जायेगा- ही वाज। शालिनी के लिए यह बहुत जरूरी है। पर कब ? यह प्रश्न उन्हें थका डालता है।

क्लर्क से बात करते समय वे ये नहीं जान पाते हैं, कि कौन सी बात वे खुद से कह रहे हैं और कौन सी क्लर्क से। ज्यादातर वे खुद से ही कहते हैं। खुद से कहना अजीब है। लोग प्रश्न खड़ा करते हैं। भला कोई खुद से बात करता है। जब हम कहते हैं,तो माना जाता है कि हम किसी से कह रहे हैं। यह नहीं माना जाता,कि हम जो कह रहे हैं वह हम खुद से कह रहे हैं। अजीब सी दादागिरी है। अगर हम खुद से कहें तो भी कहा जाता है, कि हम किसी और से कह रहे हैं। हमारी हमसे ही कही बात, किसी और से कही बात बताई जाती है। उस बात पर से हमारा हक छीन लिया जाता है। पर कई बार हम भूल जाते हैं, कि ऐसा है। कि यही माना जाता है। हम जानबूझकर भूल जाते हैं। हम भूलने का नाटक करते हैं। और खुद से बात करने लगते हैं। हमें खयाल ही नहीं आता कि वह बात हमारी बात नहीं मानी जा रही है। ........वे खुद से बात करते समय, क्लर्क तक अपनी बात जाने देते हैं। उनके लिए इस बात का मतलब नहीं है, कि वे किससे बात कर रहे हैं। उन्हें खुद से कुछ कहना है। क्लर्क का वहाँ होना उनके लिए बेमानी सा है।

वे क्षण भर को चुपचाप क्लर्क की टेबल के पास खड़े रहे। क्लर्क अपने काम में मगन था। फिर वे चुपचाप टूटे हत्थे वाली कुर्सी में बैठ गये। वे दोनों फोटो उनके हाथ में थीं। उन्हें क्लर्क का यूँ अनरियेiक्टव होना अजीब सा लगा। जिस फोटो को लेकर वे और शालिनी घण्टों बात करते हैं, जो उनके लिए बहुत अहम हो गई है। उस फोटो पर कोई इतना अनरियेiक्टव कैसे हो सकता है?

फिर उन्हें यह भी महसूस हुआ, कि वे कुछ ज्यादा ही बोलते है। ज्यादा ही चबड़-चबड़ करते है। उन्होंने क्लर्क को परेशान कर डाला। पूरे समय खुद ही बक-बक करते रहे। क्या ज़रूरत थी, पूरी रामकहानी कहने की ? उन्हें क्लर्क पर थोड़ा तरस आया।

   आगे -- 1, 2, 3, 4


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें