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05.31.2008
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फोटो का सच
तरुण भटनागर 


जब वे सरकारी दफ़्तर पहुँचे, वे हाँफ रहे थे। वह दफ़्तर बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर था। वे कुछ दिनों से कई बार यहाँ आते रहे हैं। वे बड़ी मुश्किल से सीढ़ियाँ चढ़कर इस दफतर तक पहुँच पाते हैं। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, उन्हें एकाद दो बार थकावट भरा चक्कर सा आ जाता है। ऐसे में वे अपनी छड़ी किनारे टिकाकर, किसी कुर्सी पर बैठ जाते हैं। दफ़्तर के हर मंजिल पर प्रतीक्षार्थियों के लिए कुछ कुर्सियाँ रखी हैं। जहाँ बैठकर उन्हें सुस्ताना पड़ता है। पर तीसरी मंजिल तक पहुँचते पहुँचते वे थककर चूर हो जाते हैं। उन्हें अपने दिल की धड़कन कान में बजती सुनाई देती है। पूरे कपड़़े पसीने से भीग जाते हैं और एक बार जो छाती की धौंकनी चलनी चालू होती है, वह फिर घण्टों तक बंद नहीं होती।

तीसरी मंजिल पर पहुँचकर वे उस कमरे तक पहुँचते हैं। वे पिछले छह माह में कई बार यहाँ आ चुके हैं। उस कमरे के बाहर पड़ी बैंच पर वे थोड़ा देर सुस्ता लेते हैं। फिर धीरे-धीरे अपनी छड़ी टेकते हुए कमरे में उस क्लर्क की टेबल तक पहुँचते हैं।

उन्हें वह क्लर्क हमेशा उसी टेबल पर मिला है। उस दिन भी वह वहीं था। उन्हें हर बार उस क्लर्क को वहाँ पाकर संतोष होता है। वह एक सी मुद्रा में फाइल को गोद रहा होता है। उसके एक तरफ टेबल पर फाईल का अंबार लगा होता है और दूसरी तरफ लाल पीले कपड़ों में लिपटी कुछ फाईलें बेतरतीब ढंग से जमीन पर पड़ी होती हैं।

उस दिन वे सीधे उस क्लर्क की टेबल के पास पहुँचे और उसकी टेबल पर दो फोटो रख दीं। एक ब्लैक एण्ड व्हाइट फोटो जो आकार मे थोड़ी बड़ी थी और पुरानी होने के कारण ब्लैक एण्ड व्हाइट की बजाय थोड़ा सीपिया रंग की हो गई थी और दूसरी एक रंगीन फोटो जो हाल ही में खींची गई एक नई फोटो है।

क्लर्क अपने काम में लगा रहा। उसने अपने चश्मे के कांच और भौंह के बीच से अपनी आँख चुराते हुए उन्हें देख लिया था। उसे पता चल गया था कि वे उसके सामने खड़े हैं। उसे यह भी पता था कि वे क्यों खड़े हैं। पर फिर भी वह फाइलों को गोदने में लगा रहा। वह कुछ यूँ प्रदर्शित कर रहा था, कि वह व्यस्त है। उसके पास और भी जरूरी काम हैं। उसे, उनकी परवाह नहीं। ऐसा प्रदर्शित कर वह उन्हें टालना चाह रहा था। पर उन्हें यह बात समझ में नहीं आई। वे उसकी टेबल के सामने खड़े रहे। उन्हें उम्मीद थी कि वह क्लर्क उनकी ओर देखेगा। वे पहले भी कई बार आ चुके हैं। उन्होने क्लर्क से कई बार बात की है। कभी-कभी देर तक बात की है। क्लर्क उन्हें जानता है। वह उन्हें अवश्य तवज्जो देगा। पर क्लर्क ने बहुत देर तक उनकी ओर नहीं देखा। थोड़ी देर बाद वे टेबल के पास रखी बिना हत्थे वाली कुर्सी पर बैठ गये। वे तिहत्तर वर्ष के हैं। यहाँ तक आते-आते वे इतना थक जातें है कि देर तक खड़े नहीं रह पाते। उन्हें बैठना पड़ता है।

सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते वे कई बार खुद से खिन्न हो जातें है। वे मन ही मन इतने कड़वे हो जाते हैं, कि अपने शरीर को और सीढ़ियों को गालियाँ देने लगते है। ये कम्बख़्त सीढ़ियाँ खत्म होने का नाम ही नहीं लेती........... बूढ़े आदमी का ख्याल ही नहीं। कम से कम बूढ़े आदमी के लिए तो इन्हें खत्म होना चाहिए। साँप की तरह बढ़ती जाती हैं। और यह शरीर...........। कितनी तेजी से कब्र ढूँढ रहा है। इन टाँगो को जाने क्या होता जा रहा है। ये टाँगे तो उनका कहा मानती ही नहीं। जब से अर्थराइटिस हुआ है, बिल्कुल लक्कड़ सी हो गई हैं। जरा सा घुटना क्या मोड़ लो, पूरा पैर सूजकर शकरकंद जैसा हो जाता है।

वे थोड़ी देर तक कुर्सी पर बैठे रहे।

वे बीसियों बार इस दफ़्तर आ चुके हैं। उनके बेटे जीवेन्द्र की मृत्यु के बाद सरकार ने कहा था कि उन्हें पैसा मिलेगा। आदेश भी आ गया है। पर क्लर्क कहता है कि उन्हें कोई ऐसा सबूत पेश करना पड़ेगा जिससे सिद्ध हो कि वे ही जीवेन्द्र के पिता हैं। उन्होंने घर में बहुत छानबीन की। दोनों अलमारियाँ, बड़ा संदूक, जीवेन्द्र की अलमारी, टेबिलों के ड्रार और यहाँ तक कि दीवान का बॉक्स और उसमें रखा सारा सामान और तो और उन्होने बुक शैल्फ की एक-एक कितब को पलटकर-झटकारकर देखा.......। शायद कहीं कोई ऐसा कागज हो, जो प्रमाणित करे कि वे ही जीवेन्द्र के पिता हैं। पर ऐसा कोई कागज नहीं मिला। जीवेन्द्र की मार्कशीट, उसका बर्थ सर्टिफिकेट,.......... सब जीवेन्द्र के पास ही था। पता नहीं उसने कहाँ रखा था। अब बहुत मुश्किल हो गई। पहले-पहल उन्हें क्लर्क ने बताया था कि मुनिस्पलिटि से दूसरा बर्थ सर्टिफिकेट मिल सकता है। उन्होनें मुनिस्पलिटी के भी चक्कर लगाये। पर वहाँ इतना पुराना रिकार्ड नहीं है। वहाँ का अधिकारी कहता है, पुराना रिकार्ड ना होने से डुप्लिकेट बर्थ सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा। उन्होंने यह पूरी कहानी क्लर्क को सुनाई। क्लर्क ने उनसे कहा कि वे यूनिवर्सिटी से जीवेन्द्र की मार्कशीट ले सकते है। फिर उन्होनें युनिवर्सिटी के चक्कर लगाये। युनिवर्सिटी के सेक्शन ऑफिसर ने उनसे कहा कि डुप्लिकेट मार्कशीट के लिए उन्हें ओरिजनल मार्कशीट के गुमने की एफ. आई. आर. पुलिस के पास करवानी पड़ेगी.........। अब इस उम्र में वे कहाँ-कहाँ भटकें। एक दिन उन्होनें क्लर्क से कह दिया कि वे भाग दौड़ नहीं कर पाते हैं। उनका शरीर साथ नही देता है। वे क्या करें? फिर शालिनी को भी देखना पड़ता है। शालिनी उनकी पत्नी है। उनसे तीन साल छोटी है। उसकी शुगर बहुत बढ़ गई है। उसे हाइपोग्लाइसीमिया के कारण चक्कर आते हैं। जीवेन्द्र की मृत्यु को एक साल होने आया। पर वे आज भी घुटती हैं। ढंग से खा पी नहीं पाती हैं। डॉक्टर कहता है कि ऐसा ही रहा तो प्राब्लम और बढ़ जायेगी। एक बार तो शालिनी की शुगर इतनी लो हो गई थी, कि उसे गश आ गया था। वे घबरा गये थे। वे शालिनी को देर तक अकेला नहीं छोड़ सकते। दूसरा कोई देखने वाला नहीं है।

उस दिन क्लर्क को यह सब कहते हुए वे कुछ रुआँसे हो गये थे। फिर उन्हें हमेशा की तरह खुद पर, अपने शरीर पर खीज हो आई। वे अपनी तुलना अपने दोस्त विशेश्वर के साथ करते हैं। विशेश्वर उन्हीं की उम्र का है। पर वह पूरी तरह भला चंगा है। छिहत्तर साल में भी चकाचक। उसे ना तो दमा है और ना आर्थराइटिस। वे खुद को बहुत ढ़ांढ़स बंधाते हैं। पर क्या करें शरीर साथ नहीं देता। उन्हें अपने शरीर को धकियाना पड़ता है।

उस दिन क्लर्क ने उनकी सारी बातें सुनी थी। उस दिन से उन्हें यह क्लर्क ही सब कुछ नजर आने लगा है। उन्हें लगता है, यह क्लर्क उनकी समस्या का देर सबेर निदान निकाल ही लेगा। जो काम मुनिस्पलिटी और युनिवर्सिटी में नहीं हो पाया, वह यह क्लर्क कर सकता है। एक तरह से उन्होनें खुद को आश्वस्त किया है कि यह क्लर्क उनका काम कर सकता है। फिर यह दफ़्तर भी उनके घर से पास ही है। वे यहाँ आसानी से आ जा सकते हैं। दिनों दिन वे मजबूर से होते जा रहे है। वे इस दफ़्तर से आगे नहीं जा सकते। वे इस दफ़्तर से आगे उम्मीद नहीं कर सकते।उनके शरीर ने उन्हें ज्यादा उम्मीद करने लायक नहीं छोडा है। उनकी उम्मीदें इस दफ़्तर और क्लर्क पर आकर रुक गई हैं। वे अपने शरीर को तो किसी तरह धकियाकर आगे बढ़ा लेते हैं, पर उम्मीदों को नहीं।

ये क्या है ?’

क्लर्क ने कुछ iढढाई के साथ, उन फोटुओं की ओर इशारा कर उनसे पूछा। उन्होनें अपना गला खंखारकर साफ किया। वे झिझक रहे थे। उन्होने जानबूझकर अपना गला खखारा। पर जब उस दिन शालिनी ने उनसे कहा था कि वे ये फोटुयें क्लर्क को दिखायें, तब उन्हें कुछ भी अटपटा नहीं लगा था। वे तुरंत तैयार हो गये थे। शालिनी ने कहा था कि शायद इन फोटुओं से बात बन जाये। और उन्हें लगा कि यह ख्याल उन्हें क्यों नहीं आया? उन्हें लगता है कि इन फोटुओं से बेहतर कुछ भी नहीं। कितना आसान है, यह बताना कि यह जीवेन्द्र है और यह मैं। देखो ये हम दोनों है और ये शालिनी है। देखो..............। क्या अब भी किसी प्रमाण की ज़रूरत है। क्या अब भी शंका है। ये फोटुयें कितना स्पष्ट कहती हैं। ये फोटुयें कहती हैं, कि मैं ही हूँ जीवेंद्र का पिता। हाँ वे ही......कितना साफ है कि वे ही जीवेन्द्र के पिता हैं। और यूँ सोचते हुए उनका मन भारी हो जाता, जैसे बरसात में भीगकर कपड़े भारी हो जाते हैं। जैसे मरने के बाद शरीर भारी हो जाता है। जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर खुद को, अपने जिगर के टुकड़े, अपने बेटे का पिता बताने के लिए, भटकते हुए, अक्सर उनका मन भारी हो जाता है। हाँ उनका मन दोनों तरह से भारी हुआ है। कभी बरसात में भीगे कपड़ों की तरह, तो कभी मरी हुई लाश की तरह....। उन्होंने अपने को झटकारा। वे मन के भारी होने वाली बात को झटककर अलग करना जाहते थे। उन्होंने खुद को उस बात से अलग कर लिया।

 

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