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05.31.2008
 

कभी
तरुण भटनागर 


कभी
किसी बासी चादर में सूँघूँगा,
उस पर गुजरी,
सुख भरी नींद की गंध।

कभी
पेपरवेट के नीचे दबे,
थप्पी भर कागज,
बह जायेंगे,
उसी हवा में,
जिसमें वे फड़फड़ाते रहते हैं।

कभी डोरमैट में झड़कर गिरी मिट्टी में से,
मैं वह मिट्टी छाटूँगा,
जो मेरे गाँव से आई है,
परिचित पैरों में चिपककर,
अपरिचित की तरह झड़ जाने।

कभी,
कोई फूल बच जायेगा
सुबह फूल चुनने वाले पुजारी की नजर से,
पत्तों में छुपकर,
हो जायेगा बीज,
दुनिया से दुबककर....।

कभी,
मोहल्ले के बच्चे,
मेरे हिस्से का,
पिठ्‌ठूल का वह खेल खेलेंगे,
जो बचपन में मैं खेल नहीं पाया था,
पापा की डाँट के डर से।

कभी,
जमीन से बाहर निकलती सूखी जड़ पर,
एक हरी गाँठ सी उभरेगी।

कभी,
मैं चाहकर तुम्हें भूल जाऊँगा,
उखाड़ पाऊँगा अपना ही नाखून,
अपने ही मांस से,
अपने ही हाथों...।

कभी,
मुर्दा जमीन पर बनेगा एक घर,
गायेंगी घूँघट वाली औरतें,
ढोलक पर,
बन्नो का बार-बार सुना एक सा गीत।

कभी,
पहनूँगा वही चप्पल,
जो घिसती नहीं है,
छोड़ती जाती है अपने निशान,
धूप में पिघलते रोड के डामर पर...


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