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05.31.2008
 
असगरी बाई की आवाज़

तरुण भटनागर 


असगरी बाई की आवाज़
मैं उन्हें अक्सर सुनता रहता हूँ।

पुराने टेप और कैसेट से निकलती,
उनकी आवाज़,
जो हर रोज,
सज-धजकर अपनी उम्र को झुठलाती है।

खिड़की से छनती धूप में,
अगरबत्ती के धुओं के लच्छों की तरह,
ताजा और खुशबुदार,
उनकी आवाज़ ने,
मेरे लिए बदला है समय।

जब मेरे कान से नीचे उतरकर,
भीतर के खोखले में,
नाचते-कूदते हैं ध्रुपद के बोल,
तब बदल जाते हैं,
समय के मायने,
और दिन के रंग।

मैंने असगरी बाई को सिर्फ़ इतना ही जाना था,
कि एक आवाज़ है,
एक यंत्र है,
दिन की मशीन को सुधारने,
ले जाने कहीं और,
जैसे उत्सुकता और बदलाव के लिए,
कोई सैर सपाटा,
कोई मनचाही पिकनिक।

पर फिर अखबार में पढ़ी एक खबर -
असगरी बाई आजकल बीमार है,
वह रहती है,
टीकमगढ़ में अपनी बेटी की झोंपड़ी में,
गिनते हुए जीवन के अंतिम कुछ साल,
नि:सहाय और अकेली,
उसका बेटा चाट बेचता है,
और बमुश्किल ही अपना घर चला पाता है।

अब उसकी चाहत और प्राथमिकतायें बदल गई हैं,
पहले वह चाहती थी,
कोई ऐसा आदमी,
जो सीखता उसका गुर,
बनाये रखता गायन की उसकी परंपरा,
जैसे आदि शंकराचार्य ने सौंपी थी,
अपनी छड़ी।

पर अब उसकी चाहत और प्राथमिकतायें बदल गई हैं,
ज़िंदगी के आखरी पड़ाव पर,
वह चाहती है एक छत,
एक घर,
छोटा सा एक घर,
क्योंकी उसके बेटे-बेटियों के पास ऐसा कुछ नहीं है,
जिसे घर कहा जा सके,
उसे अपने लिए नहीं चाहिए यह सब,
उसका जीवन तो पूरा हो गया,
पर वह अपने बेटे बेटियों को तकलीफ में नहीं देख पा रही है।

एक ज़रूरत,
जो समय को बदल देने वाली उसकी आवाज़ से,
ज्यादा अहम हो गई है।
एक ज़रूरत जिसे अहम बना दिया गया है।

उसी क्रम में,
जहाँ निर्लज्जता के साथ,
समय लाद दिया जाता है।

और पहली बार मुझे लगा,
मानो किसी ने,
अलग कर दिया हो,
असगरी बाई और असगरी बाई की आवाज़ को,
जैसे उखाड़ा जाता है,
मांस पर से नाखून,
और फिर बेमानी सा लगता है,
बीता हुआ पूरा जीवन,
कि क्यों चिपका था,
नाखून मांस पर,
ज़रूरत क्या थी?

इतना सब होते हुए भी,
असगरी बाई की आवाज़,
आज भी धोखा नहीं देती है,
बाजार से उसका कैसेट खरीदते हुए,
मुझे आज भी लगता है,
कि कौड़ियों के मोल मिली है,
मुझे असगरी बाई की यह आवाज़..


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