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| 05.31.2008 |
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कोठरी और आकाश |
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ऐसा
होता,
तो
ठीक रहता। ऐसा करते तो ठीक रहता। पीछे बहुत कुछ
‘ऐसा’
छूट
गया है जो कुछ और होता तो ठीक रहता। अतीत में छूटे हुए कुछ गड्ढे
जिनमें मेरा पैर चला जाता है और मैं मुंह के बल गिर पड़़ता हूँ।
गीता
को मरे छह साल हुआ। कभी सोचा ही नहीं कि दुबारा ब्याह करूँ। माँ पहले
साल से ही मेरे पीछे पड़़ गई थीं। ब्याह कर ले,
ब्याह
कर ले,
....रटती
रहतीं और वह उन पर झल्ला जाता। पता नहीं क्यों गीता की खाली जगह किसी
और को देते हुए अच्छा नहीं लगता था।
ऐसा ख्याल मन में आते ही एक अजीब सी मतली सी होने लगती थी।
उसने माँ को कई बार कहा था,
कि वह
अकेले रह सकता है पर दुबारा ब्याह नहीं करेगा। पर माँ तो कभी समझ ही
नहीं पाईं। आज भी यही कहती हैं,
कि
दुबारा ब्याह कर लेता तो ठीक रहता। पर आज कभी-कभी उसे लगता है,
कि
माँ ठीक कहती थीं। उसे गीता की खाली जगह किसी और को दे देनी थी। वह
अपने भीतर के एक हिस्से को काटकर,
फेंककर ऐसा कर सकता था। पर उसने नहीं किया।
माँ सही कहती थी। उसने गलती की। वह शायद दुबारा शादी कर सकता
था।
‘माँ
और क्या कह रही थीं?’
‘जेल
से छुट्टी का पूछ रही थीं। सो मैंने बता दिया अभी मंजूर नहीं हो
पायेगी। तीन सौ दो के
मुलजिम की छुट्टी बड़ी कठिन है....कहो बरसों ना मिले।‘
मैं
चुप हो गया। उसने शायद
मेरा चेहरा पढ़ लिया । फिर अपनी तरफ से ही कहने लगा-
‘देख
विभु
इस
बारे में मैं बार-बार झूठ नहीं बोल सकता। हर बार तेरी माँ कहती है कि,
छुट्टी का क्या हुआ?
पिछली
बार तो कहा था,
कि
अबके मंजूर हो जायेगी,
फिर
काहे नहीं हुई?
दरख्वास्त गई के नहीं?
जेलर
सा’ब
क्या कह रहे थे?
तुम
मिले थे क्या?
क्यों
नहीं मिले?
काहे
नहीं बात की?....ये
सब किचर-पिचर अपने से नहीं होती। सो मैंने सही-सही बता दी।‘
मैं
इस उम्मीद को बने रहने देना चाहता था। मुझे अच्छा नहीं लगा कि माँ की
यह उम्मीद थोड़ा सा बिखर गई। वह एक अनिश्चित सा इंतजार करती रहती थी,
कि
विभु
की
छुट्टी मंजूर होगी और वह कुछ दिनों के लिए घर आयेगा। उसे भी ऐसा
सोचकर अच्छा लगता,
कि
माँ को यकीन है छुट्टी मंजूर हो जायेगी।क्या मालूम यह बात सही हो जाय।
ऐसा कई बार हुआ है। माँ
सोचती है और वह बात हो जाती है। यह उम्मीद बनी रहती तो ठीक रहता....।
छुट्टी वाली बात पर माँ ने कुछ कहा?’
‘नहीं...कुछ
नहीं कहा....।‘
‘कुछ
तो कहा होगा।‘
‘नहीं
बस चुप हो गईं..।‘
‘काकू
घर आये थे।‘
‘हाँ
माँ बता रही थीं,
दो
माह पहले आये थे। बस एक रोज को। कुछ गल्ला रख गये हैं। कह रहे थे अब ना
हो पायेगा। यह आखरी बार है। िभु
को
बताओ वही देखे...। तो माँ ने भी उसे खरी-खरी सुना दी। कह रही थीं,
थोड़़ा चिढ़ गया था।‘
‘पर
माँ को ऐसा नहीं कहना था।‘
‘काहे...।‘
‘काकू
के अलावा अब और कौन है,
जो उनकी मदद कर सके।‘
‘पर
अब वे नहीं आयेंगे मदद करने। माँ खुद कह रही थी। वो साफ कह गये हैं। अब
वे नहीं आयेंगे।‘
‘स्साले...सब
स्वार्थी
हैं...सब। जब तक मतलब है,
चिपके रहेंगे गुड़ में मक्खी की तरह और जब मतलब पूरा हो गया पलट के भी
नहीं देखते....पुराने रास्ते भूल जाते हैं।‘
हम
दोनों थोड़ी देर चुपचाप बैठे
रहे।
वह सुट्टा फूंकता रहा।
‘देबू
कैसा है?’
‘पूरे
समय घर में बंद रहता है। माँ घर को भीतर से बंद रखती हैं। कहीं बाहर
चला गया तो कहाँ ढूँढने जायेंगी। उसकी भी जेल ही हो गई समझो....।‘
‘देबू
घर में कैसे रहता होगा?’
‘वह
तो बस मौका ताकता था,
कि कब
घर का दरवाजा खुले और वो ये भाग,
वो
भाग....। गली मोहल्लों में ठुमकता घूमता। मुझे ही दौड़़ना पड़़ता था,
उसके
पीछे। उसके पीछे भागते-भागते मैं हाँफ जाता था। एक खेल सा हो जाता था।
माँ कहतीं,
पूरे
मोहल्ले किलकारी मारता घूमता है,
इसे
नजर लग जाती है,
सो
मैं ध्यान रक्खा करूँ कि कहीं बाहर ना भाग जाये। पर देबू कहीं मानता
था। हर रोज माँ नमक और मिर्च
से
उसकी नजर उतारती थीं। मुझे उसे यूँ
भागता
देखकर बड़ा मजा आता था। मैं जानबूझकर घर का दरवाजा खोल देता था,
ताकि
वह घर से बाहर भाग जाये और मुझे उसे उसके पीछे भागते हुए पकड़़ने का
मजा आये। पर अब वह घर में बंद सा है।’
वह घर
में कैसे रह लेता होगा?
वह तो
रह ही नहीं सकता था। क्या वह याद करता होगा कि वह कैसे किलकारी मारते
हुए भागता था और मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ता था। क्या वह इतना बड़ा हो
गया है कि इन बातों को सोच सके?
....घर
में बंद-बंद उसे घुटन नहीं होती होगी?
मुझे
अपने भीतर कुछ बिखरता सा लगा। जैसे पतझर में सूखे पत्तों का ढेर जो हवा
में बिखरता रहता है।
वह सो
गया था। मुझे नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी देर बाद किसी के बूटों की आवाज़
सुनाई दी। वे जेलर साहेब थे। जब वे मेरी कोठरी के सामने से गुजरे मैं
उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
‘साहेब...मेरे
को सिर्फ़
दो
रोज के लिए छोड़ दीजिये। मैं वापस आ जाऊँगा। यकीन मानो साहेब बराबर लौट
आऊँगा। सिर्फ़
एक
बार.....।’
‘तुम
अजीब पगल हो....यह क्या मेरे बस की बात है।‘
‘साहेब
आप कर सकते हो...साहेब मेरे एक बेटा है,
देबू ....।‘
‘यह
संभव नहीं है। ...अच्छा ठीक है,
तुम एप्लीकेशन लगा दो,
तुम्हारे पैरोल का मामला सरकार को मंजूरी के लिए भेज देते हैं।‘
मेरी
पैरोल दो बार नामंजूर हो चुकी थी। जेलर साहेब बता रहे थे कि,
पुलिस
ने रिपोर्ट
दी थी,
कि
मैं शातिर हूँ। अगर छूट गया तो बवाल करूँगा। सरकार ने पुलिस की रिपोर्ट
को
सही माना और मेरी छुट्टी नामंजूर हो गई। मैं फिर से जेलर साहेब के
सामने घिघियाने लगा।
‘साहेब
छुट्टी तो नामंजूर हो जाती है। ...आप तो सक्षम हो दो रोज के लिए छोड़़
दो साहेब... सिर्फ़
दो
रोज के लिए।‘
अबकी
बार जेलर साहेब ने मुझे घुड़क दिया। और आगे बढ़ गये।
उस
रात फिर से मुझे नींद नहीं आई। मैं पूरी रात जागता रहा। उस रात रौशनदान
के पर के काले आकाश को देखकर मुझे बचपन की एक बात याद आई। तब मैं बहुत
छोटा था। तब पिताजी
ज़िंदा थे। गर्मियों के दिन थे और मैं रात को पिताजी के पास सोता था।
पिताजी मुझे एक कहानी सुनाते और कहानी के बाद मुझसे पूछते-
‘विभु
तुम
कौन सा तारा लोगे?’
मैं
हर बार एक ही चमकीले तारे की ओर इशारा करता।
फिर कुछ दिनों बाद माँ ने उस तारे का नाम रख दिया - विभु
का
तारा। वह तारा आज भी जेल की कोठरी से रौशनदान के पार दिख रहा है। एक
अजीब सी इच्छा हुई। काश वह तारा रौशनदान पर कर जेल की इस अंधियारी
कोठरी में आ जाता। अगर ऐसा हो जाय तो मैं उस तारे को अपनी मुट्ठी में
भींच लूँगा....ठीक उसी तरह जिस तरह लोगों के हाथों में हमारी कुछ
धड़कनें भिंची होती हैं,
जिन्हें वे गिड़गिड़़ाने पर और नाक रगड़़ने पर भी नहीं देते हैं। मैं
भी उस तारे को अपनी मुट्ठी में भींच लूँगा और किसी को नहीं दूँगा,
कोई
माँगे तब भी नहीं...कोई गिड़गिड़ाये तब भी नहीं...। हाँ मैं नहीं
दूँगा।
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