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| 05.31.2008 |
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कोठरी और आकाश |
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मैं
और वो जेल की एक ही कोठरी में बंद थे। वह जेबकतरी करने के कारण छह माह
के लिए बंद था और मैं हत्या करने के कारण आजीवन कारावास भुगत रहा था।
पर वह मुझसे ज्यादा शातिर था। जेल में वह खुराफ़त करता रहता था। कभी
किसी कैदी से झगड़ा,
तो
कभी रसोइये से गाली गलौज,
तो
कभी बंदियों में गुटबाजी करना,
तो
कभी कुछ और जेलर से लेकर संतरी तक हर कोई उस पर निगाह गड़ाये रहता,
कि
कहीं वह कोई नई आफ़त ना खड़ी कर दे।
सभी उसे शंकित निगाहों से देखते थे।
उस रोज वह मुझे नसीहत देने लगा-
‘काम
धंधा ऐेसा रहना चाहिए कि पूरे समय जेल में ना रहना पड़े। छह महीने जेल
में रहो और छह महीने बाहर। इस मामले में अपना काम चोखा है। पुलिस वाला
अपने से खुश है। रेलवे
स्टेशन में अपना जलवा है और स्टेशन मास्टर वो तो अपना यार। तुम गड़बड़
किये। ऐेसा ही धंधा ढूँढते ठीक रहता।’
उसने
मेरे कर्म
के
सामने प्रश्न चिन्ह लगा दिया। जब मैंने हत्या की थी,
तब
कोई प्रश्न नहीं था। जब वह जेल की कोठरी में मुझसे बतियाता है,
तब
प्रश्न हो जाता है। फिर मुझे रात को नींद नहीं आती प्रश्न है। मैं उस
प्रश्न का जवाब कोठरी के रौशनदान से रात को दिखने वाले काले आकाश में
ढूँढता हूँ। यहाँ से खरबों किलोमीटर दूर तारों वाले काले आकाश में।
शायद वहाँ जवाब हो।
उस
रात भी ऐसा ही हुआ। मैं देर रात तक उसकी बात गुनता रहा। रात की ड्यूटी
वाला कैदी चिल्ला रहा था-’जागते
रहो’।
मुझे नींद नहीं आ रही थी।
उसका
‘जागते
रहो’
मेरे
जागने को डिस्टर्ब
कर
रहा था। मेरे भीतर दो बातें खेल रही थीं,
पहली
उसका कहा
‘चोखा
काम’
और
दूसरा
‘जागते
रहो’।
दो बातें जो एक दूसरे की उल्टी हैं। किसी खेल में दो प्रतिद्वंद्वी
टीमों की तरह एक दूसरे के विपरीत भिड़़ने को आतुर।
मैंने
देखा वह सो चुका है। वह बहुत सोता है। मुझे जागता देखकर उसे हैरानी
होती है। मुझे उससे बहुत कुछ पूछना है। वह जब भी आता है,
मुझे
कई बातें बताता है। पिछली बार उसने बताया था कि,
करीब
एक महीने पहले वह मेरे घर गया था। तब मेरी माँ का दमा पहले से ठीक हो
गया था। जब वह गया था तब वह कुछ कम खाँस रही थी। देबू याने मेरा बेटा
अब पूरे दो साल का हो गया है। दो साल बाद उसे स्कूल भेजना है। माँ अभी
से चिंतित है। बोल रही थीं,
विभु
याने
कि मैं चाहता था,
कि वह
पढ़ने जाये। उसे स्कूल ज़रूर भेजना है। किसी अच्छे स्कूल में एडमीशन
दिलाना है। पर उसे स्कूल कौन ले जायेगा?
कौन
ऐसे एडमीशन दिलायेगा?
फीस
कौन देगा?
माँ
बहुत चिंतित है। माँ बहुत परेशान है। .......इसी तरह की कई और बातें वह
मुझे बताता है। तरह-तरह की बातें। माँ की और देबू की बातें।
पर आज
मैं अभी तक उससे वे सब बातें पूछ नहीं पया हूँ। उससे पूछने के लिए मौका
देखना पड़़ता है। वह आसानी से नहीं बताता है। उससे बात पूछने के लिए
उसे पटाना पड़़ता है। वह बहुत शातिर है। वह जान चुका है कि माँ और देबू
कि बातें मेरे लिए कितनी अहमियत रखती हैं। इसलिए वह मुझे जल्दी नहीं
बताता है। वह मुझे घुमाता है। वह मुझसे पूरे शिष्टाचार की अपेक्षा रखता
है। बात जानने के लिए मुझे पहले ऐसे थोड़़ा खुश करना पड़ता है।
उसकी लल्लो चप्पो करनी पड़़ती है। फिर जब मुझे यकीन हो जाता है,
कि वह मुझसे खुश है,
बस
तभी मैं उससे ये सब बातें पूछ सकता हूँ। अगर इस तरह नहीं पूछो तो सबकुछ
गड़़बड़़ हो जाता है। वह चुप हो जाा है। यूँ
प्रदर्शित करता है,
जैसे
वह मुझसे नाराज हो,
जैसे
मुझे उससे यह बात यूँ
नहीं
पूछनी चाहिए थी। फिर मैं लाचार हो जाता हूँ। वह जान चुका है,
कि वे
बातें मेरे लिए क्या अहमियत रखती हैं। उन बातों में मेरे प्राण हैं।
काश मेरे पास उसे देने को कुछ होता,
तो
मैं उसे वह चीज माँ और देबू की बातों को बताने के ऐवज में उसे दे देता।
मैं उन बातों के बदले कुछ भी दे सकता हूँ। अपनी साँसें भी।
पता
नहीं मुझे वे बातें कब पता चलेंगी?
कब वह
मुझे वे बातें बतायेगा। वे बातें जिसके लिए मैं उसके जेल में आने का
इंतजार करता हूँ। उस रात मैं देर तक सोचता रहा।
पता नहीं कब?
पता
नहीं किस समय?.........मैं
उस समय तक सोचता रहा जब तक मुझे रात की ड्यूटी वाले कैदी की आवाज़
सुनाई देती रहीं -
’जागते
रहो।
‘
एक
बार उसने मुझे झूठ बात बताई थी। उसने बताया था,
कि
माँ अब पूरी तरह से ठीक हो गई हैं। वह मेरी माँ को कुछ पैसे भी दे आया
है। फिर मुझे पता चला कि उसने मुझसे झूठ कहा है।
मैं उस पर नाराज हो गया। मैंने उससे कहा कि उसे इस तरह झूठ नहीं
बोलना चाहिए था। बात बहुत बढ़ गई।
मेरा और उसका झगड़ा हो गया। मैं हाथापाई पर उतर आया।
हम दोनों का अच्छा खासा झगड़ा हुआ। और फिर बातचीत बंद हो गई। पर
कुछ दिनों के बाद मैंने अपनी ओर से उससे बात शुरू करने की कोशिश की।
मुझे उससे बात करनी थी। मुझे उससे माँ और देबू की बात पूछनी थी। पर
उसने फिर मुझे वे बातें नहीं बताईं। मैंने उससे माफी माँगी। मैं उसके
सामने गिड़गिड़ाया। पर उस पर कोई असर नहीं पड़ा। उसने मुझे वे बातें
नहीं बताईं। मुझे अपने आप पर भी गुस्सा आया। क्यों मैं उससे लड़़ पड़़ा?
मेरी
भी गलती है। चुपचाप सब
सह लेता तो क्या हो जाता?
मुझे
चुप रहना था। हाँ मुझे चुप रहना था। बिना बात के दिक्कत मोल ले ली। अब
वह मुझे वे बातें नहीं बतायेगा। जब-जब मैं यह सोचता कि वह वे बातें
मुझे नहीं बतायेगा,
मुझे
अजीब सी घबराहट और तकलीफ होती और मैं फिर से गिड़गिड़ाता हुआ उससे माफी
माँगता। जेल के कुछ दूसरे बंदी भी मेरी तरफ से उसे समझाते पर वह नहीं
माना। अगली बार जब वह जेल आया तब भी उसने शुरू-शुरू में मुझसे कोई बात
नहीं की। पर मैंने उसे मना लिया। इस बार मेरा गिड़गिड़ाना काम आ गया।
वह मान गया। पर वह मुझे कुछ बता नहीं पाया,
क्योंकि वह मेरे घर तरफ नहीं गया था। पर इस बार वह ज़रूर गया होगा। इस
बार वह ज़रूर खबर लाया होगा।
मुझे
लगता काश माँ पढ़ी लिखी होतीं। ताकि वह मुझे चिट्ठी भेज पाती। तब माँ और
देबू की बातें जानने किसी और की ज़रूरत नहीं पड़ती। चिट्ठियों से सब कुछ
पता चल जाता। मैं देबू को ज़रूर पढ़ाऊँगा। उसको ज़रूर स्कूल भेजूँगा। पर
तभी मुझे याद आया कि माँ कह रही थीं,
कि
देबू को स्कूल कैसे भेजेंगे?
कैसे?
कोई
भी तो नहीं है,
जो
उसे स्कूल में भर्ती
करा
दे। उसकी स्कूल की फीस कौन भरेगा?....सोचने-सोचते
मेरा मन भारी हो जाता।
अगले
दिन सुबह-सुबह ही सिपाही आ गया। उसने बताया आज हम दोनों को गड्ढे
खोदने हैं। पौधे लगाने के गड्ढे। चार गड्ढे मुझे खोदने हैं और चार
गड्ढे उसे खोदने हैं। मैंने सोचा कि उसके हिस्से के गड्ढे भी मैं ही
खोद दूँगा। तब वह मुझसे खुश हो जायेगा और मुझे माँ और देबू की बातें
बता देगा। जब मैंने ऐसे बताया कि उसके हिस्से के गड्ढे भी मैं ही खोद
दूँगा,
तो वह
काफी खुश हुआ। उसने ड्यूटी वाले सिपाही से एक बीड़़ी ली और फूँकने
लगा। पूरे समय वह उस सिपाही से बतियाता रहा और मैं जेल के बगीचे में
जेल की दीवार के किनारे-किनारे गड्ढे खोदता रहा।
जब
सारा काम हो गया,
तब तक
शाम हो गई थी। मैं बहुत थक गया था। बैरक में लौटते समय उसने मुझे वे
बातें बताईं।
‘माँ
अब बिस्तर से कम उठ पाती है। उसका दमा बढ़ गया है। वैद्य
कहता
है,
कि बुढ़ापे का मर्ज
है।
मरते तक चलता है।‘
‘चौका
चूल्हा कैसे करती है?’
‘उसी
कमरे में खाना बनाती है और उसी में सोती है। घर से बाहर कम ही निकलती
है। थोड़़ा चल ले तो थक जाती है। सो पूरे समय घर ही रहती है।‘
‘माँ
कुछ कह रही थी?’
‘कह
रही थी,
गीता
के मरने के बाद विभु
दूसरी
शादी कर लेता तो ठीक रहता।
‘
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