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| 05.31.2008 |
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गुलमेंहदी की झाड़ियाँ |
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कचरा
बीनते समय स्कूल की घण्टी थोड़े-थोड़े समय बाद सुनाई देती है। आजकल
बच्चों की परीक्षा चल रही हैं। सो स्कूल नहीं लगता है। हर गर्मी
ऐसा
ही होता है। पिछले साल भी ऐसा ही हुआ था और इसके पिछले साल भी। कुछ
दिनों में स्कूल की छुट्टी हो जायेगी। स्कूल बंद हो जायेगा। स्कूल की
घण्टी की आवाज़ भी आना बंद हो जायेगी। सुंदर बता रहा था कि सब स्कूल
गर्मियों में बंद हो जाते हैं। फिर कोई भी स्कूल नहीं जाता है। जोर की
गर्मियाँ जो पड़ती हैं। ऐसी तेज गर्मी
में
सब लड़के लड़कियाँ अपने घर में रहते हैं। तपती लू में,
पूरी
दोपहर वे घर में ही रहते हैं। ....... उसने आकाश की ओर देखा। उसकी
आँखें च्œधिया
गईं। उसे लगा उसका चेहरा जल ना जाये। उसने तेजी से अपने चेहरे को अपने
हाथों के बीच दबा लिया।
रेल्वे वाला स्कूल ब्रिज के ठीक पहले पडता है। घण्टाघर चौराहे से ब्रिज
की ओर मुड़ते समय रोड के किनारे-किनारे दूर तक स्कूल की बाउण्ड्री है।
वह अक्सर उस रास्ते से गुजरते समय ठिठक जाती है और स्कूल की बाउण्ड्री
के बीच बनी लोहे की जाली से स्कूल के अंदर झाँकती है। कुछ दिनों पहले
जब स्कूल चलता था,
वह
कभी-कभी क्षण भर को रुक कर बाउण्ड्री के जंगले से स्कूल के अंदर झाँकती
थी। उसे ऐसा करना अच्छा लगता था। वह आज भी जबकि स्कूल बंद है,
आते
वक्त बाउण्ड्री के अंदर झाँक लेती है। वह अजीब सी प्रतीक्षा कर रही है,
जाने
कब स्कूल खुलेगा और बच्चे आयेंगे
?
कभी
कभी वह सोचती है,
अगर
वह स्कूल जाती तो क्या-क्या होता
?
वह
बाउण्ड्री से दिखने वाले किनारे के कमरे में बैठती है। उस कमरे में
उसकी उम्र के बच्चे बैठते हैं। वह जो किनारे वाली खिड़की है,
रोड
से बिल्कुल सटी हुई। बस उसी खिड़की के पास। अगर वह स्कूल जाती तो वह
वहीं बैठती। उन बच्चों की ड्रेस बड़ी अच्छी है। खासकर लड़कियों की।
काले जूते,
सफेद
मोजे,
सफेद
ब्लाउज,
नीला
स्कर्ट,
सफेद
रिबन ........... और तो और बिल्कुल एक से गहरे नीले रंग के बस्ते।
................
हाथों
के बीच चेहरा दबाये-दबाये उसके चेहरे की जलन कुछ कम हो गई थी। उसने
गुलमेंहदी की झाड़ियों की ओर देखा और फिर अपनी मैली कुचैली फ्रॉक की
ओर। यह फ्रॉक माँ ने लाकर दी थी। किसी के घर वह खाना माँगने गई थी और
उसने उसे यह फ्रॉक दे दी थी। जब यह फ्रॉक नई थी,
तब
गुलाबी सफेद रंग की थी। अब इसका कोई रंग नहीं है। धूल,
पसीना
और धूप खाकर यह सिर्फ़
एक
मैला-कुचैला कपड़ा भर रह गई है। उसके पास बस यही एक फ्रॉक है। ... उसने
सोचा वह माँ से जिद करेगी कि,
उसे
नई फ्रॉक ला दे। भले माँ उसे डाँटे,
उसे
मारे। पर वह जिद करेगी। ज़रूर करेगी।
............
वह
फिर से स्कूल के बारे में सोचने लगी। जब पहली-पहली बरसात होती है,
तब
स्कूल की खिड़कियों से बच्चो के कई छोटे-छोटे हाथ खिड़की के बाहर निकल
आते हैं। हर बच्चा पानी की ब्¡दे
अपने हाथ में लेने के लिये मचल उठता है। पूरे स्कूल में शोर सा मचने
लगता है। खिड़की से बाहर निकले हाथ,
पानी
की छोटी-छोटी ब्¡दो
में घूमते हैं। उठते और गिरते हैं। बच्चों में होड़ सी लग जाती है।
स्कूल के टीचर उन्हे डाँटते हैं और उनके हाथ खिड़की के अंदर करवाते हैं
पर हल्ला मचता रहता है। बहुत देर बाद ही,
बच्चों का शोरगुल थम पाता है। उसने सोचा स्कूल के बच्चे तो पागल हैं
भला बरसाती पानी में हाथ नचाना कोई अच्छी बात है। उसे तो बरसात से डर
लगता है। जब बरसात चालू होती है,
उसका
मन भारी हो जाता है। क्योंकि उसे फिर पानी में भीगते हुए कचरा बीनने का
काम करना पडता है। पूरे यार्ड
में
पानी और कीचड़ भर जाता है। तेज पानी में भागकर कहीं जाया भी नहीं जा
सकता। वह बूढ़ा चौकीदार भी यार्ड
की
शेड में उन्हे खड़ा नहीं होने देता है। अगर कोई मालगाड़ी खड़ी हुई तो
वह और सुंदर उसमें घुस जाते हैं। पर ज्यादा देर को नहीं। क्योंकि फिर
काम भी तो करना होता है। पिछले साल माँ ने पॉलीथिन को सीकर एक बरसाती
बना दी थी। पर वह भी ज्यादा टिक नहीं पाई .....। बरसात तो खराब होती
है। पता नहीं स्कूल के बच्चों को बरसात कैसे अच्छी लगती है। और वे
पगलाये से चिल्लाते हैं। वह स्कूल में होती,
तो
बच्चों को समझाती कि बरसात अच्छी नहीं है। बरसात खराब है।
पर
क्या स्कूल के बच्चे उसकी बात मानते
?
.....
उसे
विश्वास है कि स्कूल के बच्चे उसकी बात मानते। अगर नहीं मानते तो वह
मनवा लेती। उसकी बात तो माननी पड़ती है। सुंदर नहीं मानता था,
पर अब
मानने लगा है। उसकी हर बात में सुंदर हामी भरता है। उसे लगता है,
वह
समझदार है और चीजों को ज्यादा बेहतर जानती है। सो उसकी बात सुनी जानी
चाहिए। सुंदर सुनता है और उसकी बात मानता है। स्कूल के बच्चे भी मानते।
नहीं मानते तो वह मनवा लेती। वह ज्यादा समझदार जो है। ..... ऐसा सोचकर
उसे अच्छा लगा।
उसे
अपने पैरों में जलन सी महसूस हुई। गर्मियों में दोपहर दो बजे के बाद
उसे ऐसी जलन महसूस होती है। उसने यार्ड
के
किनारे लगे नल को देखा और आसपास उस चौकीदार को भी। जब उसे यह विश्वास
हो गया कि वह कहीं नहीं है,
तो वह
नल की ओर चली गई .....।
लौटी
तो सूरज पश्चिम की ओर उतरने लगा था। गर्मी
और
तेज हो गई थी। उसने बुझी नजर से ओव्हर ब्रिज की ओर देखा .....। सुंदर
शायद अब नहीं आयेगा। पर एक अजीब सी उम्मीद उसे है। वह आता है,
तो
उसे अच्छा लगता है। गर्मियों के सन्नाटे में,
उसे
अकेले काम करना अच्छा नहीं लगता है। सुंदर आता है,
तो वे
दोनों बातें करते हैं। साथ-साथ कचरा बीनते हैं। साथ-साथ सुस्ताते हैं।
..... अकेले में उसका मन भारी हो जाता है। अगर गर्मियाँ नहीं होती,
तो
उसे बोरियत नहीं होती।
एक
बार वह और सूरज स्कूल के अंदर तक चले गये थे। उस दिन स्कूल का मेनगेट
खुला था। स्कूल का चौकीदार भी नहीं दीख रहा था। वे दोनों थोड़ी देर
बाहर खडे रहे। फिर सुंदर ने भीतर चलने को कहा। पहले तो उसने सुंदर को
मना कर दिया । उसे यूँ
खड़ा
रहना अच्छा लग रहा था। उसकी भी इच्छा हो रही थी,
कि एक
बार भीतर तक देखकर आये। स्कूल की कक्षायें,
खेलने
वाला मैदान,
स्कूल
के टीचर,
.....
पता
नहीं क्या-क्या तो होता है
?
पर
चौकीदार के भय के कारण उसने सुंदर को मना कर दिया। पर दूसरे ही क्षण
उसे लगा कि चौकीदार भला क्या करेगा
?
धक्का
देकर बाहर कर देगा ...... बस और कुछ तो नहीं करेगा ना। ऐसा सोचने के
बाद वह भी स्कूल के भीतर तक जाने को तैयार हो गई। उसे लगा एक बार जाया
जा सकता है। फिर स्कूल का गेट भी तो बंद ही रहता है। मौका कहाँ मिलता
है। उस दिन वो और सुंदर भीतर तक गये थे। स्कूल के मेन गेट से भीतर तक
एक रोड थी,
जिसके
दोनों ओर घास उगी हुई थी। घास के किनारे-किनारे सुंदर फूल उगे थे। वह
सुंदर के साथ उस कमरे की खिड़की के पास तक गई थी,
जिस
कमरे के बच्चे उसे सबसे अच्छे लगते हैं। जिस कमरे के बारे में वह सोचती
है कि अगर वह स्कूल गई तो वह वहीं बैठेगी। वे दोनों थोड़ी देर तक
खिड़की के पास खड़े रहे थे। खिड़की के किनारे बैंच पर एक लड़की बैठी
थी। उस लड़की ने उन दोनों को देखा था। वह लड़की उन दोनों को टुकटुका कर
देख रही थी। जैसे वे दोनों कोई अजीब सी चीज हों। ..... लेकिन थोड़ी ही
देर में उसने देख लिया था कि,
चौकीदार वापस आ गया था और उसकी नजर उन दोनों पर पड़ गई थी। उसने तेजी
के साथ सुंदर का हाथ पकड़ा और दोनों भागते हुए स्कूल के बाहर निकले
गये। स्कूल का चौकीदार स्कूल के गेट तक उन्हे पकड़ने उनके पीछे भागा,
पर वह
पकड़ नहीं पाया और वे दोनों भाग निकले। ...... उस बात को याद करते हुए
उसे हँसी आती है,
और
उसने सोच रखा है,
कि वे
दोनों फिर से एकाद बार स्कूल के अंदर तक जायेंगे। पर स्कूल का गेट उस
दिन के बाद से उन्हे कभी खुला नहीं मिला। जब वे दोनों स्कूल के पास से
गुजरते हैं,
स्कूल
का चौकीदार उन्हे अजीब सी हिकारत भरी निगाह से ताकता है। उन्हे स्कूल
की बाउण्ड्री के पास भी नहीं जाने देता है। अगर उसकी निगाह पड़ जाये,
कि वे
दोनों स्कूल की बाउण्ड्री के पास खड़े हैं,
तो वह
उन्हें डपटकर भगा देता है।
स्कूल
के बच्चे तो बेवकूफ से हैं। उस दिन उसने देख लिया। वह लड़की कैसे उन
दोनों को टुकुर-टुकुर देख रही थी और वे दोनों उस पर हँस रहे थे। कैसे
गबदू-गबदू बच्चे हैं। बेवकूफ से। अगर वह इस स्कूल में होती तो इन सब पर
अपना रौब गाँठती। और सब उसकी मानते। बिल्कुल मानते। वह मनवा जो लेती
है। वह ज्यादा समझदार जो है। पर बच्चों की सब बातें खराब नहीं हैं। उसे
उनकी कई चीजें अच्छी लगती हैं। जब वो एक साथ गाते हैं। तब कितना सुंदर
लगता है। सुंदर बता रहा था,
उसको
पोयम कहते हैं। हाँ बस वही। वह कितना अच्छा है। कभी कभी स्कूल के
बच्चों की पोयम की आवाज़ रेल्वे के यार्ड
तक
आती है। कभी-कभी वह और सुंदर उस आवाज़ को ध्यान से सुनकर जानने की कोशिश
करते हैं कि वे क्या गा रहे हैं। उसे कोई पोयम वाला गाना नहीं आता है।
कुछ फिल्मी गाने आते हैं। खासकर शाहरुख खान ी फिल्मों के गाने।
उसकी झुग्गी के पास एक पान की दुकान है। पानवाला कई फिल्मी गाने बजाता
है। और वह पहचान जाती है कि कौन सा गाना शाहरुख की फिल्म का है। उसे
उसकी फिल्म के सब गाने पता हैं। पर वो गाने अलग तरह के हैं। पोयम वाले
गाने में सब बच्चे एक साथ गाते है और सुना है कि वह सिर्फ़
बच्चे
ही गाते हैं,
जबकि
फिल्मी गाने फिल्म के हीरो हिरोइन गाते हैं। फिर फिल्मी गाने समझ में
आते हैं। पर पोयम वाला गाना समझ में नहीं आता है। पर फिर भी उसे पोयम
वाला गाना अच्छा लगता है। सारे बच्चों की एक सी आवाज़ उसे अच्छी लगती
है। उसने कई बार लोगों से जानने की कोशिश की है कि वे क्या गाते हैं
?
उसने
माँ से पूछा,
पंचू
मामा से पूछा ...... पर कोई नहीं बता पाया कि वे क्या गाते हैं
? ....
खैर,
जो भी
हो। पर वे गाते बहुत अच्छा हैं।
लू
कुछ कमजोर पड़ गई थी। गुलमेंहदी के छोटे-छोटे फूल रेल की पटरी और
गिट्टी के ढेर के इर्द गिर्द फैली झाड़ियों पर ठुमक रहे थे। उसे ये फूल
बहुत अच्छे लगते हैं। एक ही फूल में कई छोटे-छोटे पीले-लाल फूल। हर फूल
छोटे-छोटे फूलों का एक गुच्छा है। कितने सुंदर। पर इन फूलों को कोई
उगाता नहीं है। कोई इनकी माला नहीं बनाता। कोई इन्हें भगवान पर नहीं
चढ़ाता .....। पता नहीं क्यों
?
उसे
समझ नहीं आता। पता नहीं क्यों लोग ऐसा करते हैं?
एक
दिन सुंदर ने गुलमेंहदी के खूब सारे फूल तोड़कर उसे दिये थे। फिर वह भी
उन्हे तोड़ने लगी थी। उसने उन फूलों को अपनी फ्रॉक में झोली
सी बनाकर भर लिया था। उनमें से कुछ फूल उसने अपने सूखे भूरे
बालों में लगा लिये थे। सुंदर उसे देखकर हँस रहा था। उसे भी खुद पर
शर्म
आ गई
थी। पता नहीं वह भी क्या-क्या पागलपन करती रहती है।
तभी
मालगाड़ी के पीछे वाली पटरी से कोई सवारी गाड़ी निकली। वह गिट्टी के
ढेर पर खड़े होकर उसे देखने लगी। ट्रेन से किसी ने चिप्स का एक खाली
पैकेट फैंका। ट्रेन के जाने के बाद उसने वह पैकेट बटोर लिया। उस पैकेट
के अंदर पड़े चूरे को अपने हाथ में झाड़ा और उसे चाटने लगी। उसे खाने
की हर चीज अच्छी लगती है।
सूरज
थोड़ा और पश्चिम में सरक गया। मालगाड़ी की छाया गुलमेंहदी के पेड़ों तक
बढ़ गई। अचानक उसकी तंद्रा टूटी। वह भी जाने क्या-क्या सोच रही थी।
चिप्स के नमक का नमकीनपना अभी भी उसके मुँह में था। तभी रेल्वे स्कूल
की लम्बी घण्टी सुनाई दी। वह घबरा गई। कितना समय बीत गया। शाम होने को
आई। और उसने अभी तक काम शुरू नहीं किया। उसने बोरे में झाँककर देखा।
बोरे के नीचे मुट्ठी भर कांच और प्लास्टिक के टुकड़े पड़े थे। रोज जब
वह अपनी झुग्गी पहुँचती है,
माँ
उससे उसका बोरा ले लेती है और उसे झुग्गी के अंदर एक कोने में उलट देती
है। जब बोरा पूरा भरा होता है,
तब
माँ कुछ नहीं कहती है। पर जब बोरा कम भरा होता है तब माँ उसे डाँटती है,
उसे
भला-बुरा कहती है। कभी-कभी कम कचरा बटोरने का उसे दण्ड भी मिलता है।
बोरा कम भरा देखकर माँ बहुत ज्यादा नाराज हो जाती है। वो उसे
मारती-पीटती भी है। वह चिल्लाती है,
पर वे
उसकी नहीं सुनती हैं। वह उसे गंदी और भद्दी गालियाँ देते हुए पीटती है।
फिर उसे खाना भी नहीं देती हैं। उसे माँ पर बहुत गुस्सा आता है। पर वह
जानती है,
वह
छोटी है। वह माँ से लड़ नहीं सकती। एक दिन तो उसे माँ पर इतना गुस्सा
आया कि उसने माँ को पत्थर उठाकर मार दिया और भाग गई। पर कुछ समय के बाद
उसे वापस झुग्गी आना पड़ा। उस रोज वह जान गई थी,
कि वह
भागकर कहीं नहीं जा सकती है। उसे हर बार वापस आना है और माँ की गालियाँ,
फटकार
और मार सहनी है।
........
यह सब
सोचकर वह और घबरा गई। सूरज क्षितिज पर था और रात घिरने को थी। उसने
कचरा बीनने का काम अभी ठीक से शुरू नहीं किया था। वह घबरा रही थी। उसे
लगा आज माँ उसे मारेगी। उसे अपनी माँ बहुत खराब लगती है। बस रात दिन
उससे काम करवाती है और काम न करो तो डाँटती-मारती है। उसे माँ पर कई
बार गुस्सा आता है। वह माँ को
कई बार गालियाँ भी दे देती है। जब माँ उसे मारती है,
तब वह
अपना हाथ छुड़ाकर भाग जाती है,
और
दूर तक माँ को गालियाँ देती रहती है। उसने सोचा है,
जब वह
बड़ी हो जायेगी,
तब
माँ को छोड़कर चली जायेगी। अपना अलग झोपड़ा ले लेगी। पर माँ के पास
नहीं रहेगी।
......
पर आज
वह बुरी तरह घबरा गई थी। कल भी उसका बोरा कम भरा हुआ था और माँ ने उसे
डाँटा था। और आज पता नहीं क्या होगा
?
ऐसा
सोचने पर उसे अपना मन भारी सा लगा। वह बोरा उठाकर कचरे की ओर चली गई।
फिर वह कचरे पर टूट गई। पर जल्दी ही रात घिर आई। उसका बोरा आधे से भी
कम भर पाया था।
लौटते
वक्त रास्ते में वह सोचती रही। उसे खुद पर भी गुस्सा आ रहा था। वह भी
पता नहीं,
कहाँ-कहाँ भटकती रहती
है?
जाने
क्या-क्या सोचती रहती है?
उसे
पूरा ध्यान काम पर लगाना चाहिए। अगर वह सुबह से सिर्फ़
काम
पर लगी रहती,
सुंदर
का इन्तजार नहीं करती,
गिट्टी के ढेर पर आराम नहीं करती,
स्कूल
की बात नहीं सोचती
...... तो उसका काम शाम से पहले ी निबट जाता। उसकी भी गलती है। उसे इस
बात का मलाल भी हुआ कि वह छोटी है उसे लगता कि अगर वह थोड़ा बड़ी होती,
तो
जल्दी-जल्दी कचरा बीन पाती। इतनी जल्दी थकती भी नहीं। उसे यह सोचकर
बुरा लगा कि वह छोटी है।
झुग्गी से पहले ही सुंदर मिल गया।
‘तू
आज काहे नहीं आया
?’
‘मेरे
को बापू एक होटल ले गया था। मेरे को फिर से होटल का काम मिल गया है।’
सुंदर
ने चहकते हुए कहा। उसे सुंदर की बात अच्छी नहीं लगी। उसे लगा काश उसे
भी ऐसा कोई काम मिल जाता। कचरा बीनने से अच्छा काम। उसे सुंदर से चिढ़
सी हुई।
‘चाल्ड
लेबुर।’
उसने
सुंदर को जीभ दिखाते हुए कहा। सुंदर ने उसे गाली दी
और भाग गया। उसे खराब लगा। उसे लगा उसे सुंदर को ऐसा नहीं कहना
था।
जब वह
झुग्गी के पास पहुंची माँ नहीं थी। कालू झुग्गी के बाहर मिटटी में कुछ
सूँघ रहा था। कालू देसी कुत्ता है। जब वह पिल्ला था वह उसे ले आई थी।
उसने बोरा एक तरफ पटका और बाहर निकल आई। उसे माँ पर गुस्सा आ रहा था।
पता नहीं चाण्डालिन कहाँ घूमती रहती है। सुंदर से उसे अभी भी जलन हो
रही थी। पर उसकी यह जलन यह कुढ़न अब सुंदर की बजाय माँ पर उतर रही थी।
माँ को घर में न पाकर वह माँ पर अपनी कुढ़न निकाल रही थी।
आजकल
माँ गल्ला मण्डी जाती है। अनाज की तौल के बाद जो अनाज जमीन पर गिर जाता
है उसे बटोरती रहती है। सुबह से शाम तक इसी काम में लगी रहती है,
जैसे
पता नहीं कहाँ का पहाड़ तोड़ लाई हो।
उसे
दूर धुंये भरी रात की कालिख में माँ की छाया दिखाई दी। अंधेरे में
डुलती सी छाया। वह समझ गई आज भी पीकर आई है। गल्ला मण्डी के बाहर ही
देसी दारू की दुकान है। आधे दिन काम करती है और आधे दिन उस दुकान में
बैठी रहती है...अपने यारों के साथ। उसे सब पता है। माँ की छाया देख उसे
माँ पर और गुस्सा आया। वह दूसरी ओर मुँह कर खड़ी हो गई। उसे
माँ के आने की आवाज़ सुनाई देती रही। वह आई और सीधे झुग्गी में
घुस गई। थोड़ी देर बाद माँ तेजी के साथ झुग्गी से बाहर आई।
‘आज
भी खाली बोरा ले आई - रांड।
माँ
के एक हाथ में लकड़ी का एक टुकड़ा था। वह घबरा गई। पर माँ के लिए मन
में जो गुस्सा था,
वह
निकल पड़ा-
‘दिन
भर मस्ती मारती है और मेरे को काम पर लगाये रहती है। कल से नहीं
बीनूँगी कचरा ... सुन ले।’
माँ
उसकी ओर लपकी। वह भागने को हुई पर उसका झोंटा माँ के हाथों में आ गया।
‘स्साली
... एक तो काम नहीं
करेगी और ऊपर से जबान लड़ाती है।’
‘हाँ
नहीं बीनूँगी कचरा .....।’
उसने
बड़ी डिठाई के साथ कहा। माँ ने लकड़ी से उसकी सुताई कर दी। वह चीखकर
रोने लगी।
‘खाने
को मन भर चाहिए। और काम चोरी में अव्वल।’
माँ
ने लगातार उसके पैरों और पीठ पर डंडे बरसा दिये। वह बिलबिला गई। उसने
पूरी ताकत से अपने को माँ से छुड़ाया और भाग खड़ी हुई। भागते हुए वह
माँ को गाली देती रही।
वह
देर तक रोड के किनारे पटरी पर गुड़मुड़ी बनी सुबकती रही। कालू उसके पास
चला आया था। उसने अपने पैरों और हाथों पर उसकी गीली नाक का स्पर्श
महसूस किया। पर देर रात कालू भी चला गया। वह बहुत देर बाद झुग्गी वापस
लौटी। सारा शहर सो गया था। रोड पर कोई ट्रेफिक नहीं था। एक्का-दुक्का
गाड़ियाँ आ-जा रहीं थी।
उसने
महसूस किया कि वह बहुत कमजोर है। उसे अपने छोटे होने पर शर्म
सी
आई। उसे अपने ऊपर गुस्सा भी आया। उसे लगा काश वह बड़ी होती।
उसके
पैर और पीठ पर डण्डे के निशान उभर आये थे। पूरा शरीर दर्द कर रहा था।
पीठ की खाल बुरी तरह जल सी रही थी।
उसे
यह भी लगा अगर वह कचरा बीनते समय सुंदर का इन्तजार नहीं करती,
स्कूल
की बात नहीं सोचती ..... और सिर्फ़
काम
करती रहती तो यह नौबत नहीं आती।
माँ
सो चुकी थी। जब वह अश्वस्त हो गई कि माँ सो गई है,
तो वह
धीरे से झुग्गी में सरक आई। बोरे के टुकड़े पर वह लेट गई। कालू जाग गया
था। वह उसके पास आकर सो गया। वह अब भी सोच रही थी उसे लगा शायद वही गलत
है। लेटे-लेटे उसने खुद से एक वादा किया कि कचरा बीनते समय वह सिर्फ़
कचरा
बीनने का काम करेगी। वह कुछ भी नहीं सोचेगी। न तो सुंदर के बारे में और
ना ही रेल्वे वाले स्कूल के बारे में। वह कचरा बीनने के अलावा और कुछ
नहीं करेगी। ना गुलमेंहदी के फूल बटोरेगी और ना गट्टी के ढेर पर बैठकर
देर तक सुस्तायेगी। और ना खेलेगी। स्कूल की तरफ तो वह बिल्कुल भी नहीं
जायेगी।
उसे
भूख लग रही थी। वह धीरे से चूल्हे की ओर बढ़ी। पतीले में कुछ नहीं था।
जब माँ नाराज हो जाती ै,
तब
उसके लिए वह कुछ नहीं छोड़ती है।
वह
रात देर तक जागती रही। उसकी भूख बढ़ गई थी। और उसका खुद से किया वादा
पक्का होता जा रहा था। ..... हाँ वह नहीं सोचेगी। काम करते समय स्कूल
वाली बात तो वह बिल्कुल नहीं सोचेगी। पता नहीं क्यों उसे स्कूल की बात
सोचने में मजा आता है। स्कूल की बात सोचो तो समय कितना जल्दी बीत जाता
है। वह अब कचरा बीनते समय स्कूल की बात नहीं सोचेगी। वह सिर्फ़
अपना
काम करेगी। जब तक वह बड़ी नहीं हो जाती,
तब तक
वह कुछ और कर भी तो नहीं सकती है। |
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