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05.31.2008
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गुलमेंहदी की झाड़ियाँ
तरुण भटनागर 


वह उठ खड़ी हुई। उसकी छोटी-छोटी हथेलियाँ पसीने से भीग गईं थीं और हथेली की लकीरों में फंसा काला मैल चिपचिपा रहा था। उसने अपना हाथ अपनी फ्रॉक से पौंछा। अपनी हथेली की लकीरें देखकर उसे एक बात याद आई। रोज जब वह आती है, तब ओव्हर ब्रिज से पहले, रोड की पटरी पर आम के पेड़ के नीचे एक बाबा बैठते हैं। वे लोगों का हाथ देखते हैं। जाने हाथ में क्या देखते हैं। एक बार उसकी इच्छा हुई कि बाबा से पूछे कि वे हाथ में क्या देखते हैं। क्या वे उसका हाथ देख सकते हैं ? पर फिर वह रुक गई। उसने अपना हाथ देखा। पूरे हाथ में पसीना था और लकीरों में फंसा काला मैल चिपचिपा रहा था। उसे अपने पर शर्म आई। ऐसा गंदा हाथ वह बाबा को कैसे दिखा सकती है। किसी दिन हाथ साफ कर आयेगी, तब दिखायगी। पर फिर मौका नहीं बना। फिर आजकल तेज गर्मियाँ हैं, सो बाबा नहीं बैठते हैं।

उसने मालगाड़ी के खाली वैगन को देखा और उसके पास आकर खड़ी हो गई। वैगन का दरवाजा लटक रहा था। उसने एक हाथ से वैगन के दरवाजे के किनारे की सरियों को पकड़कर वैगन के नीचे लटकते लोहे के क्ल्ौंप में अपना एक पैर फंसाया और दूसरा लटकते दरवाजे की लोहे की पट्टी पर टिकाया और वैगन पर लटक सी गई। उसने दरवाजे की भीतर झाँककर देखा। वैगन खाली थी। जैसे किसी ने पूरी वैगन में झाड़ू लगा दी हो। कोयले का एक टुकड़ा भी नहीं था। ..... स्साले सब ले गये..... उसने मन ही मन सोचा। उसे उन लोगो पर बहुत गुस्सा आता है। वे रेल्वे लाइन के पार वाली झुग्गियों में रहते हैं। वे बहुत बड़े लड़के हैं। उससे और सुंदर से कहीं ज्यादा बड़े। सुना है जब रेल्वे वाले वैगन का सारा कोयला उतार लेते हैं, तब वे सब शाम को यहाँ आते हैं और वैगनों में पड़ा बाकी कोयला झाड़ पोंछकर पूरी रात इकट्ठा करते हैं और फिर सुबह सुबह चंपत हो जाते हैं। एक बार सुंदर ने एक वैगन से कुछ कोयला निकाल लिया था और कचरा भरने के अपने बोरे में छिपा लिया था। सुंदर का बाप बहुत खुश हुआ। सुंदर के बाप ने सुंदर से कहा था, कि वह रोज कुछ कोयला ले आया करे। पर थोड़ा सावधान रहे, किसी को पता ना चले। सो सुंदर कचरे के बोरे में नीचे कोयला भरता और और ऊपर कचरा। इस तरह वह छिपाकर कोयला ले जाता था। फिर कुछ दिन वह भी ले जाती रही। माँ ने उससे कुछ नहीं कहा। पर इतना ज़रूर कहा कि रोज ले आया कर। पता नहीं यह बात उन लड़कों को कहाँ से पता चल गई। सुंदर कहता है, ज़रूर यार्ड के उस बूढ़े चौकीदार ने बताया होगा जो अक्सर उन दोनो को वहाँ से भगा देता है। राम जाने सच क्या है ? पर एक दिन वे लड़के वहाँ आ गये और उन्होने सुंदर और उसकी पिटाई कर दी। सुंदर को तो उन्होने रेल्वे की पटरी पर ही पटक दिया था। उस दिन को याद करके वह आज भी बुरी तरह डर जाती है। वह कचरा बटोरते समय सतर्क रहती है कि कहीं वे लड़के न आ जायें। उसने सोच रखा है कि अगर वे आ गये तो वह गुलमेंहदी की झाड़ियों में छुप जायेगी......। उसे गुलमेंहदी के छोटे-छोटे कांटों से डर जो नहीं लगता। तो वह छुप जायेगी। सुंदर भी छुप जायेगा, फिर वे  उन्हे ढूँढ नहीं पायेंगे। जिस दिन उन लड़कों ने उसे और सुंदर को मारा था, उस दिन वह बहुत रोई थी। वो और सुंदर रोते-रोते अपनी झुग्गी तक गये थे। सुंदर के तो पैर से खून भी निकल आया था। माँ ने सुंदर की चोट को पानी से साफ किया था। उस रोज उसने माँ से कहा था, कि वह अब कचरा बीनने नहीं जायेगी। वे लड़के फिर आ गये तो। पर माँ ने उसकी एक ना सुनी। उस दिन उसे अपनी माँ पर बहुत गुस्सा आया था। उस दिन से उसे माँ किसी राक्षस की तरह लगती हैं। जो जल्लाद की तरह उससे कचरा बिनवाती है और खुद मस्ती करती रहती है। उस दिन उसने माँ से कह दिया था, कि वह कचरा बीनने नहीं जायेगी। कहीं लड़के फिर आ गये तो....। पर माँ ने उसकी एक ना सुनी। जब वह जिद करने लगी तो माँ ने उसकी सुताई कर दी। वह बहुत रोई और फिर उसे यहाँ रोज की तरह आना पड़ा। सुंदर को भी आना पड़ा। उसने सुंदर को समझाया था कि, कुछ नहीं होता .... वे लड़के भला अब क्यों आयेंगे। वे उनके हिस्से का कोयला जो नहीं लेते। उसने उस बूढ़े चौकीदार को भी बता दिया है, कि वे कोयला नहीं लेते हैं, वे अब कोयला नहीं लेंगे। तो फिर वे क्यों आयेंगे? उसने सुंदर को समझाया और सुंदर समझ गया था। उसे अच्छा लगा कि सुंदर समझ गया। वह बड़ी ज है। उसकी बात तो समझेगा ही। सझना ही चाहिए। ह सुंदर से बड़ी है। वह सुंदर को समझा सकी है .....ऐसा सोचकर उसे अच्छा लगा। उसे अच्छा लगा कि वह बड़ी है। पर सुंदर को समझाने के बाद, वह खुद डरती रही थी। वह आज तक डरती है। सुंदर नहीं डरता है। क्योंकि सुंदर को वह समझा चुकी है। सुंदर को विश्वास हो गया है, कि वे लड़के अब नहीं आयेंगे। पर वह डरती है। सो उसने सोचा है कि अगर वे आ गये तो वह गुलमेंहदी की झाड़ी में सुंदर के साथ छुप जायेगी।

वह वैगन से नीचे उतर आई। ....... उसके मन में अब भी गालियाँ थीं ...... स्साले, भोसड़ी के, हरामी...... सारा बचा हुआ कोयला ले गये। वैगन में झाडू लगाकर ले गये।

उसने गिट्टी के ढेर पर रखा अपना बोरा उठाया और कचरा बीनने लगी। टूटे कांच के टुकडे, प्लास्टिक की टूटी फूटी चीजें, कागज और गत्ते की चीजें........ वह बड़ी तेजी से बटोर रही थी। उसे मालूम है, उसे क्या बटोरना है और क्या नहीं ? माँ कह रही थी, पंचू (कबाड़ वाला) आजकल हर चीज देखकर लेता है। तोल भाव भी ज्यादा करने लगा है। कचरे की कोई भी अच्छी चीज उसकी निगाह से नहीं बच सकती। पहले वह कांच और प्लास्टिक के टुकड़े बटोर लेती है और फिर कपड़ों की चिंदिया, रद्दी और गत्ते के टुकड़े बटोरती है। फिर वह धूल भरे कचरे के ढेर को अपने हाथों से उलट पलट देती है। वह कचरे को भीतर तक खखोलती है। ढेर को उखाड़ती है। कांच के कुछ और टुकड़ों और प्लास्टिक के नये टुकड़ों के लिए, वह कचरे से लगभग लड़ती सी है।

वह पूरी तन्मयता से अपने काम में लगी रहती है। उसके सामने सब हार जाते हैं, तपती, झुलसा देने वाली लू, आग उगलता सूरज, सब उसके सामने हार जाते हैं। बीच-बीच में थककर वह थोड़ा रुक लेती है। उसका तांबई चेहरा, सूरज की रौशनी में दमकता सा है। कचरे से बटोरी हर चीज वह अपने बोरे मे बेतरतीब ढंग से भरती जाती है। एक ढेर से कचरा बटोर लेने के बाद वह बोरा अपनी पीठ पर लटकाये, दूसरे ढेर की ओर बढ़ जाती है। बीच-बीच में वह रेल्वे स्टेशन की ओर देखती है। खासकर तब जब कोई ट्रेन वहाँ आकर रुकती है। कभी-कभी वह पलटकर ओव्हर ब्रिज की ओर देख लेती है। क्या पता सुंदर आता हुआ दीख जाय ? पता नहीं आज क्यों नहीं आया ?

पहले-पहल जब उसने कचरा बीनना चालू किया था उसे यह काम अच्छा नहीं लगता था। वह बहुत जल्दी थक जाती थी। पर अब वह इस काम की अभ्यस्त हो गई है। कभी-कभी कचरे में उसे कोई अच्छी अनमोल सी चीज मिल जाती है। अभी कुछ दिनों पहले उसे कचरे में शाहरुख खान की पूरी साबुत फोटो मिली थी। वह फोटो बिल्कुल ठीक थी। बस उसका कांच एक तरफ से चटक गया था। शाहरुख खान उसे अच्छा लगता है। उस फोटो को पाकर वह बहुत खुश हुई। फिर उसने उस फोटो को झाड़-पोंछकर अपनी झुग्गी में लगा लिया। कभी-कभी कचरे से कुछ अच्छी चीजे मिल जाती हैं। उसे अब कचरा बुरा नहीं लगता है। उसे लगता है, पता नहीं उसमें से क्या ना निकल आये ? कांच और प्लास्टिक के टुकड़े बटोरते बटोरते कभी कभी कुछ अनमोल निकल ही आयेगा। इतना अनमोल कि उसकी खुशियों का ठिकाना न हो। पता नहीं क्या है ? पर इतना तय है कि कचरा अब उसे बुरा नहीं लगता। उसे उसमें कुछ उम्मीद सी लगती है।

उस दिन भी उसे कचरे से एक अद्‌भुत चीज मिली। एक पेंसिल। एक पूरी साबुत पेंसिल। बस वह एक तरफ से थोड़ा टूटी थी, बाकी वह पूरी ठीक थी। उस पेंसिल को पाकर उसे खुशी हुई। वह अपना बोरा लेकर वापस गिट्टी के ढेर पर आकर बैठ गई। उसने पैंसिल को अपने दांतों से छीला। एक अजीब सा कसैला स्वाद उसके मुँह में भर गया। और फिर गत्ते के एक टुकड़े को वह पेंसिल से गोदने लगी।

गिट्टी के ढेर पर बैठे-बैठे उसने अपनी फ्राक  ठीक की। घुटने मोड़े और ठीक उसी स्टाइल में बैठ गई, जैसा कि रेल्वे स्कूल के बच्चे अपनी बैंचों पर बैठते हैं। पैंसिल से कागज को गोदते-गोदते वह सोचने लगी, कि अगर वह स्कूल जाती तो क्या क्या होता ? कैसा लगता ?..... वह कई बार तरह-तरह की बातें सोचती रहती है। खासकर कचरा बीनते समय जब वह बिल्कुल अकेली होती है, तब तो वह जाने कहाँ-कहाँ की बातें सोचती रहती है। पर स्कूल की बातें सोचना उसे सबसे अच्छा लगता है।

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