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| 05.31.2008 |
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गुलमेंहदी की झाड़ियाँ |
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उस
दिन धूप बहुत तेज थी। सुबह से ही लू चल रही थी। रेल्वे ब्रिज की रोड से
उठती गर्म
हवा
सड़क के ऊपर दीख रही थी।मानो कोई पारदर्शक पर्दा
हवा
में डोल रहा हो। गर्मी
के
कारण रोड पर जगह-जगह पानी गिरे होने का भ्रम हो रहा था। डामर पिघलकर
फिसलन भरी हो गई थी। इस रोड से चलकर,
ब्रिज
के नीचे उतरते समय वह पिघली डामर से सावधान रहती थी। पिछले साल ऐसी ही
गर्मी
में
रोड से उतरते समय उसकी चप्पल डामर में फंसकर टूट गई थी। चप्पल ऐसी टूटी
कि फिर जुड़ नहीं पाई। उसे पूरी गर्मी
नंगे
पैर ही चलना पड़ा था। पीछले साल वह पूरी गर्मी
पिघलते डामर पर नंगे पैर चली थी। पिघलते डामर वाली रोड पर तपती धूप में
नंगे पैर चलते हुए उसे तकलीफ होती थी। पैर का तला जलने लगता। वह थोड़ी
देर तक ब्रिज के नीचे खड़े रहकर खुद को तैय्यार करती थी,
कि वह
इस जलते पुल को कैसे पार करेगी। फिर वह अँगूठे
और
ऐढ़ियों को रोड पर टिकाकर और पैर का तला ऊपर खींचकर तेजी के साथ दौड़ती
सी रोड पार करती थी। वह पूरी गर्मी
माँ
से चप्पल के लिए जिद करती रही। उसने माँ से चप्पल के लिए बहुत जिद की।
वह रोती झींकती सी जिद करती थी। तब जाकर उसे नई चप्पल मिल पाई। बरसात
बाद उसे माँ ने नई चप्पल लाकर दी। अब वह पिघली डामर पर सतर्क होकर चलती
है। इस चप्पल को वह डामर में फंसाकर खोना नहीं चाहती है।
रोड से नीचे उतरकर रेल्वे का
यार्ड
है।
यार्ड
से
ओव्हर ब्रिज और स्टेशन दोनो दिखते हैं। पर गर्मियों की दोपहर में,
दोनों
जगह वीरानी सी छाई रहती है। दिन की,
भरी
दोपहर की वीरानी,
जो
रात के चिर-परिचित सन्नाटे से कहीं ज्यादा भयावाह होती है। चमकते सूरज
के साथ का सन्नाटा,
जो
रात के सन्नाटे से ज्यादा मनहूस होता है। रेल्वे स्टेशन में सवारी
गाड़ी,
महज
रुकने के नियम के कारण रुकती है। ना कोई चढ़ता है और ना कोई उतरता है।
ओव्हर ब्रिज पर भी कोई नहीं दिखता है। एक्का-दुक्का थ्री व्हीलर या कोई
ट्रक थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल में,
मुर्दानगी को चीरते हुए दिख जाते हैं।
वह
यार्ड
के
पास तक उतर आई। तपती हुई पटरियों पर,
एक
मालगाड़ी खड़ी है। वह यहाँ तीन दिन से खड़ी है। उसके वैगनों के गेट
लटके हुए हैं। आने के बाद वह इस मालगाड़ी की छाया में क्षण भर को
सुस्ताती है। उसकी काली देह में जगह-जगह खरोंच के निशान हैं। जब वह
अपने काम में मशगूल रहती है तब गुलमेहँदी की सूखी डाल गर्म
हवा
के झोंको के साथ उसके शरीर से रगड़ जाती है और ऐसा एक और निशान बना
देती है। उसकी फ्रॉक में बटन नहीं हैं। पीठ पर वह व्ही के आकार में
खुली रहती है। कभी-कभी वह इतनी ज्यादा खुल जाती है कि उसकी एक बाँह
कुहनी तक उतर आती है और फिर वह एक झटके के साथ उसे कंधे पर चढ़ा लेती
है। उसके रूखे बिखरे बाल,
उसके
छोटे-नाजुक कन्धों पर गुच्छे के गुच्छे बिखरे रहते हैं। धूप में जब वह
काम करती है,
तब
उसका सिर बहुत खुजाता है। वह बुरी तरह से बाल खुजलाती है और फिर उसके
बाल नारियल के जूट की तरह खड़े हो जाते हैं।
वह
मालगाड़ी की छाया में,
पटरी
के किनारे पड़े गिट्टी के ढेर पर थोड़ी देर बैठी रही। रोज वह सुन्दर के
आने तक इसी तरह बैठी रहती है। सुन्दर उससे छोटा है और उसकी माँ की
झुग्गी के पास ही रहता है। पहले वह एक होटल में काम करता था। उसने,
उसे
एक बार वह होटल दिखाया था। जहाँ वह रहती है,
उससे
थोड़ी दूर एक देसी शराब की दुकान है और उसी के पास वह होटल है। वह वहाँ
बर्तन साफ करने वालों की मदद करता था। साबुन और राख से मंजी प्लेट,
गिलास
धोने का काम। पहले होटल के मालिक ने उसे पानी लाने के काम में लगाया
था। पर वह पानी की बाल्टी उठा नहीं पाता था,
सो
उसे बर्न माँजने का काम मिल गया। उसको महीने के ढ़ाई सौ रूपये मिलते
थे। होटल के मालिक ने उसकी पगार पचास रूपये और बढ़ाने की बात की थी। पर
एक लफड़ा हो गया। एक रोज
सरकारी दफ़तर से कोई इन्सपेक्टर आया और होटल मालिक को कहने लगा कि इतने
छोटे लड़के से वह काम नहीं करवा सकता है। मालिक ने उसे समझाया। सुन्दर
ने भी कहा कि उसके लिए यह काम ठीक ठहरता है। उसको कोई परेशानी नहीं है।
उस रोज तो वह इन्सपेक्टर चला गया,
पर
हफता दस दिन बाद पुलिस का एक आदमी आया और होटल के मालिक को अपने साथ ले
गया। लफड़ा बहुत बढ़ गया था। कोर्ट-कचहरी
तक का चक्कर हो गया था। फिर एक रोज मालिक ने सुंदर के पगार का हिसाब
किया और उसकी छुट्टी कर दी। सुंदर के बाप ने मालिक से खूब मन्नत माँगी।
गिड़गिड़ाया भी। पर वह नहीं माना बोलने लगा- उसको कोई झंझट नहीं चाहिए।
इसलिए उसने सुंदर को निकाल दिया है। फिर सुंदर को होटल वाला काम नहीं
मिल पाया और वह भी उसके साथ कचरा बीनने आने लगा। आज भी जब वह सुंदर से
होटल वाले काम के बारे में पूछती है,
तो वह
होटल की बातें और किस्से सुनाने लगता है। उसके पास उस होटल के बहुत से
किस्से हैं। तरह-तरह के लोग जो उस होटल में आते थे। ज्यादातर दारुबाज
लोग रहते थे,
पर
कुछ लोग बड़े नेक थे। एक आदमी ने तो एक बार सुंदर को पचास रुपये का नोट
दे दिया था। उस रोज सुंदर को बहुत अच्छा लगा था। सुंदर के बापू ने उस
पैसे से सुंदर को फेरी वाले के पास से एक हाफ पेन्ट खरीद दी थी। उस
होटल के किस्से सुनाते वह नहीं थकता है। जब भी वह पूछती,
वह
उसे कोई ना कोई नया किस्सा सुना ही देता है। फिर वह कभी-कभी उदास हो
जाता है,
उससे
पूछता है कि क्या उसे फिर से होटल वाला काम मिल पायेगा?
वह उस
इन्सपेक्टर को गाली भी देता है,
जिसके
कारण उसकी नौकरी चली गई। वह इन्सपेक्टर सुंदर को चाल्ड लेबुर(चाइल्ड
लेबर) कहता था। पता नहीं इसका क्या मतलब है। बडा अजीब सा शब्द है -
चाल्ड लेबुर। कभी-कभी वह सुंदर को चिढ़ाती है - चाल्ड लेबुर और वह पटरी
के किनारे पड़ी गिट्टी को उठाकर मुट्ठी में भर लेता है। एक दो बार तो
उसने उसे गिट्टी से मार ही दिया था। लेकिन फिर भी,
जब
उसका मन करता है वह सुंदर को इसी तरह चिढ़ाती है। उसने कई लोगों से पूछा
था,
कि
चाल्ड लेबुर के क्या मायने हैं। पर उसे कोई नहीं बता पाया। पर सुंदर को
चिढ़ाने के लिए यह शब्द बडा अच्छा है- चाल्ड लेबुर।
उसने
ओव्हर ब्रिज की ओर देखा। शायद तपती रोड पर से उठती गर्म
हवा
की लहरदार आकृति और रोड पर बिखरे पानी की तरह दिखने वाले धोखे में,
सुंदर
दिख जाय। आज देर हो गई। वह नहीं आया। वह थोड़ी देर तक देखती रही। शायद
ओव्हर ब्रिज से उतरता हुआ,
छोटे
गुड्डे की तरह सुंदर दीख जाये। पर वह नहीं दिखा।
तभी
उसे रेल्वे के स्कूल की एक सी ट्रिन्न।.... करती घण्टी सुनाई दी। वह
थोड़ा घबरा गई। आज बहुत देर हो गई और उसने अब तक अपना काम शुरू नहीं
किया। वह उठ खड़ी हुई। पर दूसरे ही क्षण उसे लगा वह थोड़ी देर सुंदर का
और इन्तजार कर सकती है। फिर वह जल्दी-जल्दी काम करेगी। थोड़ी देर
और.....। थोड़ी देर में कुछ नहीं होता।....पर दूसरे ही पल उसे लगा कि,
जल्दी-जल्दी काम करने से गुलमेंहदी की टहनियों का ध्यान नहीं रहता। वे
पूरी देह को खरोंच डालती हैं। पर इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। देह पर
पड़ने वाली खरोंच धीरे-धीरे खुद ही ठीक हो जाती है। बस एक खुरण्ट रह
जाता है और खुरण्ट के झड़ने के बाद एक चिकनी चमड़ी वाली लकीर.....। पता
नहीं यहाँ कितनी गुलमेंहदी उगी है और हर साल बढ़ती जा रही है। कहीं-कहीं
तो वह रेल की पटरी तक बढ़ आई है। जब मुनिस्पलिटी की कचरा फेंकने वाली
गाड़ी आती है,
तब वह
बहुत सी गुलमेंहदी की झाड़ियों को कुचल देती है। पर फिर भी वह हर साल
उग आती है। वह और सुंदर अक्सर इन झाड़ियों के छोटे-छोटे फल तोड़कर
इकट्ठा कर लेते थे। उन्होंने एक दो बार ये फल खाये भी। उन्हे ये फल
बड़े अच्छे लगते थे। पर एक दिन फल खाने के बाद सुंदर के पेट में बहुत
दर्द हुआ और वह वापस घर चला गया। उसकी तबियत खराब हो गई। उस रोज माँ ने
उसे भी फटकार लगाई और गुलमेंहदी के बीज नहीं खाने को कहा। तब से
उन्होने उसे खाना बंद कर दिया है। |
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