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| 05.31.2008 |
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छूटा हुआ भगवान |
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‘माँ
ये वह वाली मूर्ति तो नहीं है....है ना।’
‘पता
नहीं।’
‘माँ
ध्यान से देखकर बताओ ना...।’
माँ
हाथ जोड़े कुछ बुदबुदाती सी खड़ीं थीं। मेरा यूँ
टोकना
उन्हें अच्छा नहीं लगा। वे झुंझलाहट भरी नजर से मुझे देखने लगीं। निशा
ने कुहनियों से मेरी पीट दबाई और इशारे से पूछने लगी- क्या हुआ?
मैं
चुपचाप खड़ा रहा। थोड़ी देर बाद मैंने माँ से फिर पूछा-
‘लगता
है।....नई मूर्ति है।’
‘नहीं
ये वही है।’
‘पर
माँ वह ऐसी कहाँ थी?’
‘तुझे
क्या मालूम तू तो छोटा था। यकीनन यह वही है।’
मैं
संदेह में था। बचपन की स्मृति में मूर्ति का आकार खत्म हो चुका था।
‘यह
मूर्ति बहुत पहले से यहाँ पर है। बरसों पहले से। पहले यहाँ सिर्फ़
एक
चबूतरा था और उस पर खुले आकाश के नीचे भगवान विराजे थे। फिर....।’
पुजारी ने हमारी बात सुन ली थी। उस ने बताया यह मूर्ति वही है। पर
मैंने उस की बात को अनसुना र दिया। मेरा मन किया कि मैं असुना कर
दूँ। मुझे उसे सुनने का मन नहीं किया। ये वे भगवान कैसे हो सकते हैं?
इनके पास तो हज़ारों लोग हैं। उनके पास कोई
नहीं था। उनके पास तो कुछ नहीं था। पर इनके पास तो सोने के जेवर
हैं,
सुंदर
कपड़े हैं। उनकी कोई छत नहीं थी। पर इनके पास तो पूरा मंदिर है। वे
इतने बेसहारा थे,
कि
उनके लिए एक बच्चे की शर्ट
भी
बहुत थी। वे इतने गरीब थे,
कि
बच्चे भी उन पर दया करते थे। बचपन में हमें लगा था,
कि
उन्हें हमारे सहारे की ज़रूरत है। उनके पास हम खेले थे। तब लगा था,
कि वे
हमारे खेल को देखकर खुश होते होंगे। हम सतर्क रहते थे कि भगवान देख रहे
हैं।....यकीनन ये वे भगवान नहीं हो सकते। क्या मैं इनके लिए माँ की
डाँट खा सकता हूँ?
क्या
इनके लिए रात भर सोचते-सोचते जाग सकता हूँ?
क्या
इस मंदिर का झण्डा कौतुहल पैदा कर सकता है?
क्या..... जाने क्या हुआ मैं मंदिर के बाहर आ गया। अन्धेरे में मेरे
बचपन का शहर पहाड़ के नीचे जगमगाता दीख रहा था। थोड़ी देर बाद निशा आ
गई।
‘क्या
हुआ?’
‘देख
रहा था इन चमकती लाइटस में से हमारे बचपन का घर कौन सा है...?’
तभी
उन्होंने सर्च
लाइट
जलाई और उठ खड़े हुए। टार्च
की
लाइट छिछले पानी पर गिर रही थी और पानी का शांत सा प्रतिबिम्ब गुफा की
ऊबडखाबड़ दीवार पर पड़ रहा था। मेरे मन में अभी भी उस
रात के चित्र बन रहे थे,जब
हम आखिरी बार उस मंदिर गये थे। जब भी वह बात याद आती है,
मैं
उसे भूलने की कोशिश करता हूँ। वह बात अक्सर याद आती है। पता नहीं कैसे
वह महत्वपूर्ण
हो गई?
हम
दोनों गुफा के और भीतर जाने लगे। वे मुझे गुफा के बारे में बताते जा
रहे थे और मैं एक अजीब से आकर्षण के साथ उनके पीछे-पीछे चलता रहा। हम
करीब दो घंटे तक चलते रहे। कहीं गहरे संकरे रास्तों पर,
तो
कहीं अन्धेरे गहरे खोहनुमा हिस्सों में। जगह-जगह बेतरतीब चट्टानें और
अन्धेरे में खडी ऊँघती सी विशाल आकृतियाँ थीं। जैसे पत्थरों के विशाल
दानव खड़े हों,
हाथियों से भी बड़े। अजीब सी भूलभुलैय्या चारों ओर थी जो घनघोर काले
अन्धेरे और सन्नाटे के कारण कुछ भयवाह से लग रहे थे। जगह-जगह शाखाओं की
तरह संकरे अन्धेरे रास्ते थे। गुफा के कई हिस्सों में कुछ गड्ढे और
गलियारे से थे,
जिनमें से कुछ अनजान रास्ते गुजरते थे। जहाँ कोई नहीं जाता था।
चलते-चलते हम एक विशाल बोगदेनुमा हिस्से में पहुँचे। गुफा की दीवार और
किनारों से कई संकरे रास्ते भीतर के अनजान अंधेरों में खोये हुए थे।
मेरी इच्छा हुई कि इनमें से किसी रास्ते में चला जाय। ऐसा रास्ता जहाँ
वे भी नहीं गये हों।
‘नो...इट्स
ए रिस्की जॉब।’
‘रास्ता
ध्यान रहे तो फिर कोई
परेशानी नहीं होगी।
‘
यद्यपी अब तक का रास्ता मुझे खुद याद नहीं था। अगर मुझे छोड़ दिया जाता,
एक टॉर्च
लेकर
तो भी मैं बाहर नहीं आ सकता था। पर मैं निश्चिंत था,
कि वे
मेरे साथ हैं। वे कई बार यहाँ आ चुके हैं।
‘मैं
उधर कभी नहीं गया हूँ।’
‘बहुत
अन्दर नहीं जायेंगे....बस।’
‘इट्स
अगेंस्ट द रुल्स।’
‘रुल्स।’
‘हाँ,
फॉरस्ट डिपार्टमेण्ट का रूल है। फिक्स रूट के अलावा दूसरे पर नहीं जा
सकते हैं।’
‘यहाँ
कौन देख रहा है। जमीन से कई मीटर नीचे घुप्प अन्धेरे में कि आप फालो कर
रहे हो या नहीं।’
‘बट....।’
‘लेट्स
मूव।’
मैं
आगे को बढ़ गया। वह थोड़ी देर को झिझकता सा वहीं खड़ा रहा। मैं अकेला
कुछ आगे तक बढ़ गया। थोड़ी दूरी के बाद टार्च
की
रौशनी आनी बंद सी हो गई। मैं बहुत आगे चला गया था। उनके हाथ में वह
टार्च
एक
बिंदु की तरह दिख रही थी। मुझे अजीब सा अकेलापन लगा। कई फीट जमीन के
नीचे,
बहुत
अन्दर। लगता मानो यह जगह इस संसार का हिस्सा नहीं है। शायद कोई
नहीं जानता कि हम यहाँ हैं। मुझे एक अंतरिक्ष यात्री के संस्मरण
याद आये जो मैंने कुछ दिनों पहले पढ़े
थे।
वह चाँद पर गया था। उसे एक अजीब सा डरा देने वाला अकेलापन महसूस हुआ था,
जब उस
ने लाखों मील दूर आकाश पर चमकती पृथ्वी को देखा था। दूसरी दुनिया में
होने के अहसास से उपजा अकेलापन बहुत अलग होता है। थोड़ी देर बाद वह
मेरे पीछे-पीछे आने लगा। हम अनजान रास्ते पर चल पड़े।
एक
संकरी कंदरा में कुछ दूर चलने के बाद रास्ता बंद सा लगा। हम रुक गये।
पर वहाँ गुफा में बहने वाला पानी एक गड्ढे में उतर रहा था। एक चौड़ा
अंधेरा गड्ढा। हमें लगा शायद वहाँ से आगे को रास्ता हो। हम धीरे-धीरे
उस गड्ढे में उतरने लगे। फिसलन भरे उस
गड्ढे में कुछ देर तक उतरने के बाद हम संकरी सी एक जगह पर थे जो
चारों ओर से ऊबड़-खाबड़ चट्टानों से अटी पड़ी थी। हम आगे बढते रहे। कभी
चट्टानों पर चढ़ते तो कभी संकरे रास्तों पर नीचे उतरते....हम चलते रहे।
तभी हम एक अजीब सी उमस भरी जगह पहुँचे। इस जगह चारों ओर चट्टानों के
बीच की खाली जगहों पर तरह-तरह के सफेद क्रिस्टल से थे। हमने उन्हें
टॉर्च
की
रौशनी में देखा। उनमें से बहुत से क्रिस्टल पानी के भीतर चमकते से थे।
‘ये
बहुत रेअर फॉरमेशन है।’
‘यह
चमकता भी है।’
मैंने
उन्हें छूकर देखा। वे कुछ भुरभुरे से थे। हम उन्हें देखने के कौतुहल
में और आगे बढ़ गये। जगह-गजह पानी के गिरने और सूखने से क्रिस्टल जैसी
आकृतियाँ बन गयी थीं।
‘तुम्हें
यहाँ अकेलापन नहीं लग रहा है। दुनिया से दूर इस घनघोर अन्धेरे में...।’
‘मुझे
लगता है। भगवान हर जगह है। यहाँ भी फिर अकेलापन कैसा।’
मेरी
ओर देखकर मुस्कुराते हुए उस ने कहा। मुझे अन्धेरे में उस के चमकते दांत
दिख गये।
चलते-चलते हम एक ऐसे संकरे गलियारे में थे,
जहाँ
घुटनों-घुटनों तक पानी भरा था। हम संभलकर आगे बढ़ रहे थे,
कि अचानक उस का पैर फिसल गया। मैंने लिया पकड़ लिया पर सर्च
लाइट
उनके हाथ से फिसल कर पानी में गिरकर बुझ गई। चारों ओर घोर अंधेरा हो
गया। हमने किसी तरह वह लाइट पानी से टटोल कर बाहर निकाली। उसे जलाने की
कोशिश की पर वह नहीं जली। हम घबरा गये। डर की बात यह थी,
कि हम
बाहर कैसे निकलेंगे। गुफा के भीतर हमें लगभग पाँच घंटे हो चुके थे।
अन्धेरे में रास्ता ढूँढना नामुमकिन था। हम एक दूसरे का हाथ पकड़े
रास्ता ढूँढते रहे। मैं बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था। दो घंटे,
चार घंटे,
पाँच घंटे.... और फिर घड़ी में नये दिन की तिथी रेडियम में चमकने लगी।
पर हम रास्ता नहीं ढूँढ पाये। हम जिन रास्तों पर टटोलाते हुए बढे़ थे,
शायद
वे गलत थे और हम और भी ज़्यादा उलझ गये थे। पर फिर भी अंत तक हमने कोशिश
नहीं छोड़ी। हम लगे रहे। तब तक लगे रहे जब तक कि हमें विश्वास नहीं हो
गया कि अब कुछ नहीं हो सकता....। यहाँ से निकलना अब नामुमकिन है। हम अब
कभी भी यहाँ से नहीं निकल पायेंगे। हम उस
गुफा से फिर निकल नहीं पाये। मुझे इमैनुअल की बात याद आई। मुझे
उसका मरना याद आया। मुझे तकलीफ हुई। क्योंकि मैं इतनी जल्दी मरना नहीं
चाहता था। उस गुफा में
फंसे हमें पाँच दिन हो गये थे। हम बोल भी नहीं पा रहे थे। पर मैं उससे
वह बात कह चुका था-
‘तुम
पूछते थे ना....ड़ू यू
बिलीव
इन गॉड। सुनो मेरे एक ईष्ट थे। मेरे भगवान....पहाड़ के ऊपर। बचपन से
मैंने उन्हें ही जाना। पर अब लगता है,
जैसे
वे बदल गये हैं। जैसे उन्हें मेरी ज़रूरत नहीं। मानो किसी ने उन्हें
मुझसे अलग कर दिया हो। वे बदल गये हैं। उन्हें बदल दिया गया है। वे अब
मेरे वाले भगवान नहीं रहे। मुझे एक बात विचार आया था,
कि,
मैं
किसी दूसरे भगवान को अपना लूँ। सब लोग तो ऐसा करते हैं। एक बार में
कई-कई भगवानों की पूजा करते हैं। मैं भी कर पाऊँगा। पर मैं नहीं कर
पाया। मैं उस भगवान की
जगह किसी और को नहीं ला पाया। पता नहीं मैं क्यों नहीं कर पाया?’
दूसरी ओर से कोई
आवाज़ नहीं आई। मैंने रुककर उस से दूसरी बात पूछी-
‘क्या
मैं नास्तिक हूँ?
तुम
क्या सोचते हो....एम आई एन एथीस्ट?’
दूसरी
ओर से कोई आवाज़ नहीं आई। मैंने उन्हें अन्धेरे में टटोलकर देखा। उनका
शरीर ठंडा पड़ चुका था। उनकी साँस बंद थी और नब्ज़ गायब।
मरने
से पहले उन्होंने अपने भगवान को याद किया था। और मैं सोच रहा था,
कि
मैं कितना अकेला हूँ। मेरे कोई
भगवान तक नहीं... थोड़ी देर बाद मैं उस
घुप्प अन्धेरे में सीलन भरे फर्शपर लुढ़क गया। मैं इन्तज़ार करने
लगा-जाने मैं कब मरुँगा? |
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