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05.31.2008
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छूटा हुआ भगवान
तरुण भटनागर 


यह आसान सा प्रश्न मुझे उलझा देता है। मुझसे बहुत कम लोगों ने यह प्रश्न पूछा है। मैंने एक बार भी इस प्रश्न का जवाब नहीं दिया है। मुझे इस प्रश्न का जवाब नहीं आता है।  

मुझे बचपन में घर की खिड़की से दिखने वाला मंदिर का वह झण्डा याद आ गया।

कावेरी मुझे वहाँ जाना है।

मैं बचपन की प्यास खुजाने लगा। वह प्रश्न भी अटका रहा-ड़ू यू बिलीव इन गॉड। कावेरी मुझे उस मंदिर नहीं सो गई। लेकिन मुझे वहाँ जाना था। फिर मैंने अपने दोस्तों को वहाँ चलने को कहा। वे तैय्यार हो गये। और एक दिन मैं, मण्टू और आरती उस  पहाड़ की ओर चल पड़े। हम तीनों में आरती सबसे बड़ी थी। वह एक बार और जा चुकी थी। पर यूँ अकेली पहली बार जा रही थी। अकेली इसलिए, क्योंकि हम लोगों का होना ना होना बराबर था। वह आगे-आगे चल रही थी और मैं और मण्टू उस के पीछे। पता नहीं आरती को भी रास्ता पता था या नहीं। हमने उस से नहीं पूछा कि उसे रास्ता पता है या नहीं। उस ने बताया कि वह एक बार जा चुकी है, सो हम दोनों उस के पीछे-पीछे चल दिये। अक्सर हम दोनों उस के पीछे-पीछे चला करते थे। वह हम दोनों पर अपनी धौंस भी जमाती थी। उसने हमें समझाया था, कि वह हम दोनों से बड़ी है। और जिस तरह छोटों को बड़ों का आदर करना चाहिए वैसे ही मुझे और मण्टू को उसका कहना मानना चाहिए। मुझे और मण्टू को उस की बात ठीक लगी थी।  

पहाड़ कम पहले ही झाड़ियाँ शुरू हो जाती थीं। रास्ता थोड़ा कठिन था। चट्टानें थोड़ा गरम थीं। छाँव बहुत कम थी। चढ़ाई लगातार थी। जब हम थक जाते तब उमस भरे गर्म आकाश के नीचे किसी चट्टान पर सुस्ताने बैठ जाते। पर हम कम ही सुस्ताये। ज़्यादा देर चलते रहे। कभी-कभी बेतरतीब झाड़ियों के बीच से हमें रास्ता बनाना पड़ता। हम उनकी बिखरी डालों और टहनियों को इधर-उधर करते, रास्ता बनाते और चल पड़ते। गुलमेंहदी के काँटे हमें चुभ जाते और सूखी खाल पर सफेद लकीर सी बन जाती। एक अजीब सा आकर्षण था। पता नहीं वहाँ क्या-क्या होगा? मंदिर का झण्डा, वहाँ की मूर्तियाँ, पत्थर का चबूतरा, वहाँ से दिखने वाले छोटे-छोटे घर....। हम रास्ते भर बात करते रहे कि,वहाँ पहुँचकर कितना मजा आयेगा।

हम काफी देर बाद मंदिर पहुँच पाये। पहाड़ पर ऊपर पहुँच जाने के बाद भी मंदिर कुछ दूर था। वहाँ एक मैदान सा था और वह उस के बीच था। वह आम मंदिरों की तरह नहीं था। बस एक चबूतरा था, जिस पर पत्थर की मूर्ति रखी थी। मूर्ति के किनारे एक त्रिशूल था और मंदिर से थोड़ा दूर एक ऊँचा झण्डा गड़ा था। मूर्ति के पास मिट्टी का एक टूटा दिया रखा था, जिसमें बरसाती पानी भरा था। चबूतरे के दोनों तरफ़ नारियल के छिलके और दोने पड़े थे। मंदिर से थोड़ा दूर पानी का एक पोखर था। हम तीनों थोड़ा देर उस  पोखर के पास खेलते रहे और फिर मंदिर की मूर्ति के पास आकर बैठ गये।  

मैंने उस मूर्ति को देखा। वह शांत थी। क्या वे यहाँ अकेले हैं? क्या बरसों से वे अकेले हैं? उनकी कौन देखभाल करता होगा?....मैंने आरती से पूछा। उस ने बताया, कि कभी-कभी पुजारी आता है। वह भी त्यौहारों में। बाकी समय  तो इक्का-दुक्का दर्शनार्थी आते हैं। सो वह नहीं आता है। मुझे यह जानकर दु:ख हुआ कि भगवान को इस सुनसान निर्जन पहाड़ पर अकेले रहना पड़ता है। फिर मुझे उस  पुजारी पर भी गुस्सा आया। कोई  किसी को इस तरह अकेला छोड़ता है, भला।

यहाँ का पुजारी अच्छा नहीं है।

 क्यों?’    आरती ने पूछा।

वह भगवान को अकेले जो छोड़ जाता है।

जब कोई  पूजा करने वाला नहीं होगा तो पुजारी क्या करेगा।

पुजारी को भी तो पूजा करनी चाहिए।

हुँह...तेरे को तो कुछ भी नहीं मालूम। पुजारी पूजा थोड़े करता है। वह तो पूजा करवाता है। वह खुद थोड़े पूजा करता है।

जो भी हो उसे भगवान को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।

भगवान तो अकेले ही रहते हैं। वे बहुत बड़े हैं। उन्हें कोई  डर थोड़े लगता है कि वो अकेले ना रह पायें।    

हाँ आरती ठीक कहती है।

मण्टू ने आरती की हाँ में हाँ मिलाई।

पर ठंड में बरसात में भगवान को दिक्कत होती होगी, है ना....।

जाने क्या था मैं इस बात पर आरती और मण्टू की सहमति चाहता था। चाहता था कि वे मानें... कि भगवान को दिक्कत होती होगी। ठंड में वे ठंड से कुड़कुड़ाते होंगे। गर्मी में तपते पहाड़ पर उन्हें कितनी तकलीफ होती होगी। पर मेरी बात नहीं मानी गई।

भगवान को ठंड नहीं लगती। भगवान को गर्मी नहीं लगती। भगवान कोई  क्या हमारे जैसे होते हैं।  

 हमारे जैसे ही तो होते हैं। देखो उनके हाथ हैं, पैर हैं,। आँखें हैं, कान हैं,....। वे हमारे जैसे ही हैं। उन्हें ठंड भी लगती होगी और गर्मी भी। फिर तुझे कैसे पता, कि उन्हें ठंड नहीं लगती। तूने क्या भगवान से बात की है।

तू तो बुद्धू है।

बुद्धू तो तू है। अगर मेरी बात पर यकीन नहीं है।  तो तू खुद भगवान से पूछ ले कि उन्हें ठंड लगती है या नहीं....।

 हट....भगवान से कोई  बात कर सकता है क्या।

हाँ कर सकता है।....भगवान बोलते हैं।

 भगवान नहीं बोलते।

बोलते हैं।

 नहीं बोलते।

बोलते हैं।   

 नहीं बोलते, नहीं बोलते, नहीं बोलते.....एएएए।

आरती मुझे चिढ़ाते हुए अपनी जीभ दिखाने लगी। पर मण्टू ने मेरा समर्थन किया-

 नहीं आरती बोलते हैं। तेरे को और मुझे दादी ने ध्रुव वाली कहानी  सुनाई थी ना जिसमें भगवान ने ध्रुव से बात की थी। भगवान बोलते हैं।

मण्टू हम दोनों को छोड़कर मंदिर की ओर भाग गया। मैं और आरती बहस करते रहे। पर मैंने उसे चुप करा दिया। मुझे लगा मैं जीत गया। मुझे यकीन था, कि मैं सही हूँ। भगवान को ठंड लगती है। भगवान को अकेले में डर भी लगता होगा। ये कैसा पुजारी है। जो उन्हें अकेला छोड़ गया। पुजारी खराब है। माँ  तो ठाकुरजी का कितना खयाल रखती हैं। उनको नहलाती हैं। नये कपड़े पहनाती हैं। झूला झूलाती हैं। और यह पुजारी...। मुझे लगा इस भगवान को मैं अपने घर ले जाऊँ। थोड़ी देर बाद मण्टू चहकता सा हमारे पास आया। उस के हाथ में गेरू का एक ढेला था। उस ने गेरू से भगवान की मूर्ति के गले में माला, कान में बाली, करधनी,...लगभग सारे किस्म के गहने बना दिये थे।

 फिर मैं भी उस के साथ लग गया और भगवान का शेष बचा शृंगार गेरू से पूरा कर दिया। आरती हमें मना करती रही। पर हम दोनों ने उस की एक ना सुनी। थोड़ी देर बाद हम उस मंदिर से लौटने लगे।  भगवान को यूँ अकेला छोड़कर जाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे तकलीफ सी हुई कि भगवान अब हर रोज की भान्ति अकेले रह जायेंगे। रात को जब ठंड पड़ेगी तब वे ठंड से कुड़कुड़ायेंगे। कोई नहीं होगा उनकी मदद करने वाला। मुझे लगा मझे भगवान की मदद करनी चाहिए। पर कैसे?.....तभी मुझे एक उपाय सूझा। मैंने अपनी शर्ट उतारी और भगवान को पहना दी। आरती ने मुझे ऐसा करने से मना किया और धमकी भी दी कि अबकी बार वह मेरे साथ यहाँ नहीं आयेगी। पर मैं नहीं माना। मण्टू मुझे देखता रहा और फिर मुस्कुरा दिया...।

चलें...। क्या सोचने लगे?’   

 

वे खड़े हो गये। हम दोनों चल दिए। जीप वे ही चला रहे थे। कस्बा छोड़कर हम जंगलों की ओर बढ़ गये। फिर एक जगह उन्होंने गाड़ी रोक दी। आगे गाड़ी नहीं जा सकती थी और हमें अब पैदल चलना था। घने जंगलों के बीच हम एक पगडंडी पर चल दिए। चारों ओर सन्नाटा था। सूखे पत्तों पर हमारे जूतों की आवाज़ के अलावा वहाँ बस चुप्पी ही थी। करीब एकाद किलोमीटर चलने के बाद वह पगडंडी भी खत्म हो गई। सामने एक हल्की गहरी घाटी जैसी थी। चारों ओर पेड़ों और झाड़ियों से घिरे होने के कारण वह ढँक सी गई थी। पूरी घाटी थोड़ी गहराई में थी। हम दोनों कुछ देर से किसी ढाल पर उतर रहे थे। फिर संभलकर घाटीनुमा गड्ढे में उतरने लगे। जल्दी ही हम उस  स्थान पर उतर गये, जहाँ  लगभग दस फीट लम्बी और दो फीट चौड़ी दरार सी थी। चट्टानों के बीच वह दरार किसी अंतहीन कुँए सी दीख रही थी। इस दरार में लोहे की सीढ़ियाँ नीचे को उतर रही थीं। हमें इसी से नीचे उतरना था। मुझे बताया गया था, कि पूरी गुफा जमीन के नीचे बीस से पचास फीट गहराई में है।

उन्होंने अपनी कैप ठीक की। सर्च लाइट जलाई और लोहे की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे। मैं उनके पीछे-पीछे संभलकर, सीढ़ियों पर अपने पैर जमाता हुआ उतरने लगा। थोड़ी देर बाद वे दरार के भीतर दिखते अन्धेरे में गुम हो गये। मुझे अजीब सी बेचैनी हुई। मैंने लगभग चीखते हुए उनसे पूछा-तुम्हें रास्ता तो पता है ना...। मेरी बात पर उन्होंने कोई  जवाब नहीं दिया बस मेरी तरफ़ सर्च लाइट घुमा दी।  उनके पीछे-पीछे मैं भी घुप्प अन्धेरे में घुस गया। 

सीढ़ियों से थोड़ा नीचे उतरने के बाद एक बड़ी सी चट्टान थी। जिसपर हम दोनों खड़े हो गये। लगता था कि उस चट्टान के आगे कोई  रास्ता नहीं है। पर चट्टान के किनारे एक माँद सी थी। जो मुश्किल से ही दिखती थी। जिसमें से एक समय में एक ही आदमी भीतर जा सकता था। वह भी लेटकर लगभग घिसटते हुए। उन्होंने अपने घुटने मोड़े और उस माँद में घुस गये। मैं भी उनके पीछे-पीछे उस  माँद में उतर गया। वह माँद संकरी और भीतर को उतरती सी थी। लेटे-लेटे तो कहीं पर उकड़ू घिसटते हुए हम दोनों उस  माँद में उतरते गये। करीब बीस फीट उतरने के बाद वह माँद गुफा के अन्दर खुलती थी। गुफा का वह अन्दरुनी हिस्सा एक विशाल खोह जैसा था। चारों ओर घुप्प अंधेरा था। सर्च लाइट की रौशनी भी बमुश्किल उस खोह की छत और दूसरे किनारे तक पहुँच पा रही थी। एक अजीब सा मुर्दा सन्नाटा हमें घेरे था। गुफा में हमारे पैरों के पास से ठंडा पानी बह रहा था। बहते पानी की आवाज़ के अलावा वहाँ और कोई  आवाज़ नहीं थी।

हम उस  गुफा में चलते रहे। थोड़ी देर बाद उन्होंने गुफा की छत की ओर टार्च की रौशनी फेंकी-

देखिये मैं इनकी बात कर रहा था।

छत से अजीब सी शंखाकार आकृतियाँ नीचे की ओर उल्टी लटक रही थीं। पत्थर का अजीब सा रूप। सफेद और चमकता हुआ। टार्च की रौशनी में वे आकृतियाँ कांच के टुकड़ों की तरह चमक रही थीं। फिर उन्होंने गुफा के फर्श पर सर्च लाइट की रौशनी फेंकी। जहाँ हम खड़े थे वहाँ से लेकर गुफा के दूसरे किनारे की ओर जहाँ तक रौशनी जा रही थी, चारों ओर नुकीली शंखाकार आकृतियाँ नीचे से ऊपर की ओर उठी हुई थीं। वैसी ही चमकती और लुभाती। ... मैं विस्मृत सा उन्हें देखता रहा। उन्होंने मुझे यूँ ताकते हुए देखा और पूछने लगे-

उस समय हमारी बात अधूरी रह गई थी।

क्या-?’ मैंने अनमने से भाव से कहा ।

ड़ू यू बिलीव इन गॉड? समबाडी वाज टेलिंग मी...यू बिहेव लाइक एन एथीस्ट।

ड़ू यू थिंक सो?’ मैं उस के चेहरे को पढ़ने लगा।

तभी हमारे पैरों के पास से बहने वाले पानी में हलचल सी हुई। जैसे कोई अपने हाथों से उसमें छप-छप कर रहा हो। वहाँ इतनी शांति थी, कि पानी की आवाज़ पूरी गुफा में गूँजती सी लग रही थी।

 ब्लाइन्ड फिशेज़....ये सिर्फ़ इन गुफाओं में ही पाई जाती हैं और हाँ गहरे समुद्र में भी। बहुत गहरे समुद्र में। कई किलोमीटर नीचे जहाँ सूरज की रौशनी नहीं पहुँच पाती है।

 स्ट्रेंज...।

अन्धेरे में आँखों की ज़रूरत नहीं। इन मछलियों को भी नहीं।

मैं गुफा के भीतर तक, गहरे अंधेरों तक भागती पानी के छपाकों की आवाज़ सुनता रहा। हम दोनों क्षण भर को सुस्ताने वहाँ बैठ गये। उस ने सर्च लाइट बुझा दी। मुझे यह सोचकर मतली सी आने लगी कि कहीं वह प्रश्न फिर से ना आ जाये-ड़ू यू बिलीव इन गॉड।यह बड़ा घिसा पिटा सा प्रश्न है। मैंने कई बार खुद से यह प्रश्न पूछा है। फिर अक्सर मुझे कुछ अजीब सा लगने लगता है। खासकर तब जब सोचता हूँ, कि कितने लोग यह प्रश्न अपने से पूछते होंगे। ज़्यादातर लोगों को ज़रूरत ही नहीं है। वे बस मानते हैं कि भगवान है। वे प्रश्न नहीं खड़ा करना चाहते। वे यह भी मानना नहीं चाहते कि ऐसा प्रश्न हो सकता है। और साफ मन से उस का जवाब भी ढूँढा जा सकता है। वे इस प्रश्न से बचते हैं। जबकी इसकी ज़रूरत नहीं है।....पर मैं भी  तो इस प्रश्न से बच रहा हूँ। शायद बच नहीं रहा। मुझे इस प्रश्न का जवाब देना झंझट सा लगता है। कितनी बार तो जवाब दिया है। कितनी बार खुद से। बार-बार वही जवाब। एक बोरियत सी होती है।   पर उस  बात को सोचते बोरियत नहीं होती है, जो इस प्रश्न और उत्तर के पीछे दुबकी सी पड़ी है। जैसे बैठी अलसाती कुतिया के नीचे से उस का पिल्ला झाँकता है। बरसों बाद हमने वह जगह छोड़ दी। पहाड़ वाला मंदिर मेरी स्मृति में धूल खाता पड़ा रहा।

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