| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.31.2008 |
| 1 |
|
छूटा हुआ भगवान |
|
पहाड़
पर एक मंदिर है। घर की खिड़की से कोई मंदिर नहीं दीखता है। बस क्रचे
पहाड़ पर एक झण्डा दिखता है। एक छोटे धब्बे की तरह। एक छोटा लाल धब्बा।
हवा में लहराता हुआ। सुना है वहाँ एक मंदिर है। पर उस मंदिर के बारे
में कोई बात नही. करना चाहता है। वहाँ बहुत कम लोग जाते हैं। उन दिनों
मैं पाँच साल का था और वह मंदिर मुझे उत्सुक करता था।
“कावेरी
वहाँ चलेंगे ना...”
“कहाँ?”
“वहाँ
पहाड़ पर... जहाँ मंदिर है।”
मैंने
खिड़की के पार आकाश पर दीखते उस लाल धब्बे की ओर इशारा किया।
“नहीं
बाबू वहाँ कुछ नहीं है।”
कावेरी घर में नौकर है। माँ और पिताजी दोनों नौकरी पर चले जाते हैं और
मैं दोपहर भर कावेरी के पीछे-पीछो घूमता रहता हूँ।
“तुम
झूठ बोलती हो। वहाँ भगवान की मूर्ती
है।”
“तुम्हें
किसने बताया?”
“मन्टू
ने”
“हुंह...उसको
कैसे पता होगा?”
“उसके
बापू ने बताया होगा ना...।”
“वे
लोग तो अभी आय हैं। उनको कुछ नहीं मालूम है।”
“नहीं
उसको मालूम है। वह कह रहा था वहाँ भगवान की मूर्ती
है।
बिल्कुल माँ के ठाकुरजी जैसे भगवान। तेरे को तो कुछ भी नहीं पता।”
“अच्छा
और क्या बताया उसने?”
घर
में कावेरी मुझे नहलाती है। कपड़े पहनाती है। खाना खिलाती है। फिर
दोपहर को सुला देती है।
“बताओ
मन्टू ने और क्या बताया?”
बात
करते -करते उसने मेरे कपड़े उतार दिये। अंगीठी पर रखे भगौने के गर्म
पानी
को बाल्टी में ऊँडेल दिया। फिर पानी मे ऊँगली डालकर उसकी गरमाहट देखने
लगी। वह अपने काम में मगन थी और मैं उसे बता रहा था।
“मन्टू
बता रहा था। पहले वहाँ कोई बाबा रहते थे। वे ही उस मूर्ती
को
वहाँ लाये थे। वो लाल रंग वाला झण्डा भी। वो जो खिड़की से दिखता है...।”
कावेरी मुझे नहलाने लगी। मेरी बातें पतझर के पीले पत्तों की तरह आँगन
में झड़ने लगीं। जिन्हें महतरी रोज बुहारकर फेंक देती है। कावेरी ने
मुझे नहलाकर तैय्यार कर दिया। तब तक मेरी बातें भी बदल गईं थीं। पर
थोड़ी देर बाद मुझे पहाड़ पर लहराता वह झण्डा फिर से दिख गया। छूटी हुई
बात फिर से जुड़ गई। पर अब वह एक कोरी जिद थी।
“कावेरी
चलो ना।”
“बाबू
बाद में जायेंगे। पहले आप खाना खा लो।”
“नहीं।
अभी चलो।”
मैंने
कावेरी की साड़ी का पल्लू पकड़ लिया और खींचने लगा।
“बाबू
वहाँ नहीं जाते। तेरे को मालूम है..वहाँ पर एक साँप भी है।”
“नहीं,
मैं
जाऊँगा...तू ले चल।”
“नहीं,
अभी
नहीं। बाद में।”
“नहीं
अभी चल।”
मैं
जमीन पर पैर पटकने लगा।
“अच्छा
माँ आ जायें तब चलेंगे।”
‘माँ
नहीं जाने देगी तू अभी चल।’
‘बाबू
जिद नहीं करते पहले आप खाना खा लो।’
मैं
जोर-जोर से पैर लगा। जब शांत हुआ तब हिचकियाँ रह गईं। कावेरी ने मुझे
मना लिया। मैंने खाना खाया और सो गया। वह मंदिर मेरी आँखों में रह गया
जैसे एकदम से अंधेरा हो जाने के बाद कुछ देर तक ट्यूबलाइट का
प्रोजेक्शन आँखों में रह जाता है मेरी उत्सुकतायें बढ़ गईं। क्या उस
मंदिर के भगवान माँ के ठाकुर जी जैसे दिखते हैं?
उस
भगवान की पूजा कौन करता होगा?
पहाड़
के ऊपर जब बादल आ जाते हैं तब कैसा लगता होगा?
सुना
है वह मंदिर बड़ा है पर वह दिखता
तो छोटा है?
वहाँ पूजा कैसे होती है?
कुछ दिनों बाद मेरे विचित्र से कल्पना संसार में मण्टू भी शामिल हो
गया। मण्टू मेरे से थोड़ा छोटा था। उस ने मेरी कल्पना के तलाब में,
जो
मेरी उत्सुकता के साथ फैलता और सिकुड़ता था,
अपने
पैर डाल दिये थे और छपर-छपर करने लगा।
‘तेरे
को नहीं मालूम बाबू भगवान अलग-अलग होते हैं। शंकर जी,
गणेश
जी,
तुम्हारी माँ के ठाकुर जी,
पहाड़
वाले भगवान,.........सब,
सब अलग-अलग होते हैं।’
‘पर
सब चुप रहते हैं। कोई बोलते नहीं। चलते नहीं। बस एक जगह बैठे
रहते
हैं। है ना...।’
‘नहीं
बाबू वो चलते भी हैं। बोलते भी हैं।’
‘तेरे
को कैसे मालूम?’
“पिता
जी ने बताया।”
‘क्या
बताया?’
मैं
उत्सुकता से,
बिना
सिर पैर वाली ख़ुशी के साथ उस की ओर खिंच सा गया।
‘वो
बता रहे थे,
भगवान
बहुत बड़े होते हैं। वो जो सामने वाला इमली का पेड़ है ना,
उससे
भी बड़े। बहोत बड़े। बहोत बहोत बड़े....।’
आकाश
की ओर उठे
मण्टू
के हाथों में भगवान का विशाल आकार नहीं समा रहा था। मैं आकाश की ओर उठे
उस के
हाथों को देख रहा था। उस के दोनों हाथों के बीच नीले आकाश पर बगुलों का
एक झुण्ड व्ही के आकार में उड़ा जा रहा था....।
बचपन
की यह बात मुझे अक्सर याद आ जाती है। अकारण याद आ जाती है। उस दिन भी
मैंने इस बात को याद किया। तब मैं छब्बीस वर्ष
का
था। उस दिन मैं रेस्ट
हाऊस के दालान में बैठे-बैठे
उकता
गया था। मैं इन्तज़ार कर रहा था। वह काफी देर बाद आया।
‘तुम
तैय्यार हो?’
‘हाँ।
पर थोड़ी देर बाद चलेंगे। एक-एक कप चाय पीते हैं।’
‘हम
वैसे ही लेट हो चुके हैं।’
‘कुछ
नहीं होता मैं फ़ुर्सत में हूँ।’
सूरज
पश्चिम की ओर खिसक रहा था। गर्मियों में शाम आते ही तपिश और बढ़ जाती
है। दोपहर की उबासी मुझसे चिपकी थी। उसे झटककर अलग करने के लिए चाय
ज़रूरी थी।
‘तुमने
पहले कभी कोई ऐसी केव
देखी है?’
‘नहीं।’
‘इट्स
वर्थ
सीइंग।’
‘सुना
ज़रूर है पढ़ा भी है। वो क्या कहते हैं...कार्स्ट...चूना
पत्थर वाले एरिया में होती है। इज़ दैट ट्रू?’
हाँ।
जब मैं वहाँ पहली बार गया था,
मुझे
अजीब सा लगा। मुझे लगा जैसे पता नहीं मैं कहाँ हूँ। जमीन से बीस फीट
नीचे,
उमस
और ठंड में। गहरे काले अन्धेरे में। जहाँ
हाथ को हाथ नहीं सूझता है। अगर लाइट बुझ जाये तब आप उस
गुफा से बाहर नहीं निकल सकते है। गुफा के अन्दर अन्धेरे ें
विश्वास ही नहीं होता है,
कि
बाहर दोपहर होगी। धूप खिली होगी। चिलचिलाती धूप वाली दोपहर।’
‘तुम
वहाँ अकेले गये थे।’
‘नहीं।
इसी गाँव का एक आदमी था और एक फॉरेस्ट गार्ड
था।
वहाँ अकेले नहीं जाना चाहिए।’
‘क्यों?’
‘बड़ी
ऊटपटांग जगह है। आड़े टेढ़े
अंधियारे रास्ते। गुफा के अन्दर बहुत अन्दर तक...करीब तीन एक किलोमीटर
तक,
अंधेरी भूलभुलैय्या सी है। पूरी तरह उलझ जाते हैं। कहीं बहुत चौड़े
गलियारे से हैं,
तो
कहीं इतनी संकरी दरारें कि लेटकर,
सरककर
धीरे-धीरे ही आगे बढ़ा जा सके। फिर कोई
एक रास्ता नहीं है। कहीं-कहीं तो एक साथ आठ दस दरारें या रास्ते
हैं। कुछ रास्तों का तो पता ही नहीं चलता। वे भीतर किसी अंधियारे कोने
में होते हैं। फिर पहचानना मुश्किल कि कौन सा रास्ता सही है। कहीं-कहीं
बहुत गहरे गड्ढे हैं। बड़े कुओं के माफ़िक....उससे भी बड़े। अगर उनमें
टार्च
की
रौशनी फेंको तो वह उस के
नीचे तक,
उस के
पेंदे तक नहीं पहुँच पाती है। रौशनी अन्धेरे में ही खत्म हो जाती है।
मैं एक बार उस गुफा में
बड़ी वाली सर्च
लाइट
ले गया था। पर उस की रौशनी भी उन गडढों के तल तक नहीं पहुँच पाई और उस
के भयंकर अन्धेरे में गुम हो गई। अगर उन गडढों में कोई
बड़ा सा पत्थर फेंको
तो पत्थर की आवाज़ काफी देर बाद
सुनाई देती है। वह भी मद्धम सी...ध्यान से सुनने के बाद। उन
गडढों का साइंटिफ़िक नाम सिंक होल्स है। कुछ गुफाओं में वे इतने विशाल
पाये गये हैं कि पूरी की पूरी नदी उनमें समा जाती है। शायद
योगेस्लाविया में ऐसा एक सिंक होल है। जो किसी विशाल नदी को लील जाता
है। यह गुफा थोड़ी डरावनी भी है। अगर कोई
उस गुफा में एक
बार भटक गया तो फिर उस
का बाहर निकलना असंभव है।’
वह
थोड़ी देर के लिए चुप हो गया। नौकर चाय ले आया। उस ने सिगरेट जला ली।
‘इस
गुफा में एक एक्सीडेण्ट हो गया था। दैट इंसिडेण्ट सम्टाइम्स हॉन्ट्स
मी। सोचता हूँ तो भीतर तक हिल जाता हूँ।’
वह
कुछ कहते-कहते रुक गया। सिगरेट के धुंये का एक छल्ला उसके सिर के ऊपर
डगमगाता सा डिफ़्यूज़ होता
जा रहा था।
‘उस
आदमी का नाम इमैन्युएल था। वह ऑस्ट्रिया का रहने वाला था।
इंट्रेस्टिंग परसन...।
वह एक स्कॉलर था और कार्स्ट
गुफाओं की स्टडी के लिए यहाँ आया था। मेरी उस से दोस्ती हो गई। फिर वह
कुछ दिन मेरे साथ मेरे घर भी रहा। वह लगभग रोज उन गुफाओं में जाता था।
वह कामचलाऊ
अंग्रेज़ी जानता था। कुछ दिनों में हमारी अच्छी पटने लगी। एक बार मुझे
काम से शहर जाना पड़ा। इस दौरान वह मेरे घर में ही रहा। घर की चाबी मैं
उसे दे आया था। पन्द्रह रोज बाद जब मैं घर लौटा
तो मैंने देखा कि,
घर का
ताला बंद था। मैंने सोचा इमैन्युएल कहीं घूमने गया होगा। पर जब काफी
देर हो गई और वह नहीं लौटा तो मैंने आसपास के कुछ गाँव वालों से उस के
बारे में पूछा। मुझे पतो चला कि वह
तो करीब आठ नौ रोज से घर नहीं आया है। मेरा माथा ठनका। मैंने
दरवाज़े का ताला तोड़ा। फिर कुछ लोगों के साथ घर में घुसा। मैंने पाया
कि घर का सारा सामान ठीक-ठाक है। और इमैन्युएल का डफल बैग,
उसकी
किताबें,
उसके
कपड़े सब सही सलामत हैं। पर वह नहीं था। मुझे लगा यह बार पुलिस को
बतानी चाहिए। सो मैंने एक शिकायत दर्ज
करा
दी। शुरू में पुलिस ने कुछ नहीं किया। पर करीब पच्चीस एक रोज बाद,
एक
दिन अचानक,
पुलिस
का एक इंस्पेक्टर उस की फोटो और ऑस्ट्रिया,
ऐंबेसी के कुछ कागज लेकर मेरे पास आया और उस के बारे में पूछताछ करने
लगा। इमैन्युएल का वीसा खत्म हो चुका था और उसे वापस लौटना था। पर वह
वापस नहीं लौटा था,
सो,
ऐंबेसी उसकी खोजखबर ले रही थी। पुलिस ने कुछ दिन तो छानबीन करी और फिर
उसके मिसिंग होने की रिपोर्ट
ऑस्ट्रिया,
ऐंबेसी भेज दी। इस घटना को हुए करीब एक साल हो गया। इमैन्युएल का सामान
मैंने पुलिस के मार्फ़त ऑस्ट्रिया,
ऐंबेसी भेज दिया। बस उसकी एक डायरी जिसमें वह अपनी रोज की बातें और खोज
सम्बन्धी विवरण लिखता था और उस का फोटो एलबम जिसमें ज्यादातर गुफाओं के
चित्र तथा मेरी और उस की तस्वीरें थीं,
मैंने
अपने पास रख ली। फिर एक दिन एक अजीब सी बार हुई....।’
उसकी
चाय ठंडी हो गई थी। उस ने दूसरी सिगरेट सुलगा ली थी। उस की आँखें चौड़ी
हो गई थीं। उस का चेहरा भावविहीन सपाट हो गया था। वह रेस्ट हॉऊस की छत
की ओर देखने लगा।
‘फिर
कुछ दिनों बाद एक और सज्जन आये। वो यहीं की यूनिवiर्सटी
मं जियोलाजी के प्रोफेसर थे। उन्हें प्रोमोशन के लिए पी.एच.डी. करनी
थी। सो वे इन गुफाओं पर रिसर्च
करने
चले आये। मेरी उनसे मुलाकात हुई। मैंने उन्हें इमैन्युएल के बारे में
बताया। उन्होंने मुझसे उस की वह डायरी माँगी जिसमें उसके उन गुफाओं
संबन्धित ऑब्सरवेशन लिखे थे। मैंने वह डायरी उन्हें दे दी। वे गुफा के
उन्हीं भागों का अध्ययन करने लगे जिसे इमैन्युएल ने अपनी डायरी में
लिखा था। एक तरीके से वे इमैन्युएल के अधूरे काम को आगे बढ़ा रहे थे।
फिर एक दिन दोपहर को वे मेरे पास आये। उनके साथ वह इंस्पेक्टर भी था,
जिसने,
ऐंबेसी को रिपोर्ट
भेजी
थी। वे किसी चीज की शिनाख्त मुझसे करवाना चाहते थे। एक टार्च,
एक
चमड़े का जर्जर बैग,
एक हथौड़ा... और एक कपड़े में बँधी आदमी की हड्डियाँ,
बाल,
सूखी चमड़ी के कुछ टुकड़े। जानते हैं। वह कौन था?
वह
इमैन्युएल था। उस के टार्च
और
बैग से मैंने उसे पहचाना। वह गुफा में बहुत अन्दर तक चला गया था। फिर
शायद रास्ता भटक गया और फिर उस
गुफा से कभी भी बाहर नहीं निकल पाया। अगर वह प्रोफेसर ना आता और
मैं उसे इमैन्युएल की डायरी नहीं देता या वह इमैन्युएल के काम को आगे
बढ़ाते हुए उसी रास्ते पर नहीं जाता जहाँ वह गया था...गुफा के बहुत
अन्दर,
गहरे
अन्धेरे में,
कई
किलोमीटर भीतर,
जहाँ कभी कोई नहीं गया...तब शायद कोई
भी नहीं जान पाता कि इमैन्युएल का क्या हुआ?
जिस
दिन इमैन्युएल को हम उस के देश वापस भेज रहे थे,
मुझे
बड़ी अजीब सी रिक्तता
महसूस हुई। क्या कोई सोच
सकता है,
ऑस्ट्रिया का एक व्यक्ति
हज़ारों किलोमीटर दूर इस देश के एक छोटे से गाँव में आयेगा... वह भी
अंधेरी गुफाओं में भटकने के लिए...फिर अचानक गायब हो जायेगा,
सालों
बाद भुला दिया जायेगा... और फिर एक दिन अचानक हम उस की सूखी बेजान
हड्डियों को विदा करेंगे। नो वन,
ऐण्टीसिपेट द टाइम...।’
वह
चुप हो गया। ठंडी चाय में पड़ा सिगरेट का अधजला टुकड़ा चिनचिनाता हुआ
ठंडा रहा था। फिर उस ने अचानक पूछा-
‘मिस्टर
माथुर डू यू
बिलीव
इन गॉड?’
|
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|