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05.31.2008
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बीते शहर से फिर गुजरना
तरुण भटनागर 


एक बीता हुआ शहर

बाहर के अंधेरे में रेल की पटरी पर धुंधली सी चाँदनी चमक रही थी। पटरी छूटती जा रही थी, पर धुंधली सी चमक साथ चल रही थी। लगता मानो पटरी रुकी हुई है। उसका एक सा आकार बिल्कुल भी नहीं बदला है। चेतना नहीं होती तो मैं उसे रुका ही जानता। चेतना ना हो तो कितना कुछ रुक जाये। ना आगे जाय और ना पीछे जाय।  बात चेतना भर की नहीं है। यह बात उस धड़कन की है, जो चेतना के खोल में रहती है...जो भ्रम तोड़ती है, स्वप्नों को सुधारती है, कविता के शब्द गढ़ती है...। तभी तो मैं आज भी अपने हाथों पर उसकी देह को महसूस कर पा रहा हूँ। उसकी देह की उष्णता। एक मासूम सी चेतना जो मेरे हाथों पर आज भी फिसलती जान पड़ती है। उन दिनों वह चेतना मुझे उकसाती थी, मुझे उसकी ओर खींचती थी। पर जो आज उकसाती नहीं है और ना ही उत्तेजित करती है। बस आँखों को भिगो जाती है। गले को रूंध देती है।

मुझे नींद आने लगी। मैंने आँखें बंद कर लीं। मेरे अंधेरे में बस ट्रेन की आवाज़ रह गई।

अचानक ट्रेन की आवाज़ बदल गई। उसकी धड़धड़ाहट तेज हो गई। मैं चौंककर जाग गया।  ट्रेन के नीचे से कई नई पटरियाँ निकल आईं और तभी एक जगमगाता स्टेशन तेजी से आया और बीतते अंधेरों में खो गया। मैं उसकी जगमगाहट में से कुछ भी नहीं पकड़ पाया। दूसरे ही क्षण ट्रेन की आवाज़ पुरानी आवाज़ जैसी हो गई। अगर ट्रेन बोलती तो मैं उससे पूछता- वे कौन-कौन से स्टेशन हैं, जिन्हें वह रोज जगमगाता पाती है और लगभग एक ही तरह से उन्हें अंधेरों के हवाले कर देती है? क्या उसने सोचा है, कि उनमें से किसी स्टेशन पर वह रुकेगी? सिग्नल के लाल होने से नहीं बल्कि अपनी मर्जी से। स्टेशन से गुजरते समय उसकी धड़धड़ाहट क्यों बदल जाती है? क्या ठीक वैसे ही जैसे वह जा रही थी। वह हमेशा के लिए जा रही थी। फिर जाते-जाते अचानक वह मेरे गले से लिपट गई और तब मुझे उसकी धड़कन सुनाई दी थी। वह धड़कन अलग तरह की थी। मैंने उसकी जितनी धड़कनें सुनी थीं वह उससे अलग थी। वह बदली हुई धड़कन थी। क्या ठीक उसी तरह......

वे बूढ़ी आँखें मुंदकर लुढ़क चुकी थीं।

कुछ और लोग जाग गये थे। वे अपना सामान बांध रहे थे। उनकी बातें मुझे समझ नहीं आ रही थीं। वे किसी दक्षिण भारतीय भाषा में बात कर रहे थे। मैंने उनमें से एक व्यक्ति से आने वाले स्टेशन के बारे में पूछा। पता चला वह जगह आने वाली है। वही जगह जिसके लिए मैं जाग रहा हूँ। खिड़की के पार एक काली पहाड़ी सरक रही थी और एक झिलमिलाता शहर काले आकाश को घूँट दर घूँट गटकता जा रहा था।

उन दिनों इन पहाड़ियों को हम दोनों लगभग रोज देखते थे। इस शहर में वे लगभग रोज मेरे सामने होती थीं। उन पहाड़ियों से बचकर नहीं रहा जा सकता था। उनका सामने होना एक अजीब सा ढांढस बंधाये रहता था। जैसे घर का बुजुर्ग सदस्य होता है। वह अनुत्पादक है। उसका होना ना होना कोई अंतर पैदा नहीं करता। पर उसके होने से एक ढांढस होती है। जब हम दु:खी होते हैं, तब अपना चेहरा टिकाने के लिए किसी अपने बूढ़े का कंधा ढूँढते हैं। वह कमजोर कंधा होता है। पर वहीं ढांढस मिलती है। वे पहाड़ भी ऐसे ही थे। पूरा शहर थककर उन्हीं के कंधों पर अपना सिर टिका देता था। यद्यपी रोज उन पहाड़ों को काटा जाता था। उन्हें नुकसान पहुंचाया जाता था और वे किसी बुढ्‌ढे की तरह निरीह होकर सब सहते थे। हम दोनों कई बार इन पहाड़ों पर गये थे। पर उन दिनो मैंने इन पहाड़ों को इतनी संजीदगी से नहीं देखा था, जिस तरह इन्हें देखने का मन आज कर रहा है और मैं ट्रेन की खिड़की से अपना चेहरा चिपकाये इन्हें देख रहा हूँ। शायद पहाड़ों को नहीं देख रहा हूँ। एक भ्रम सा है, जैसे आज भी उस पहाड़ पर मैं और वह दिख सकते हैं। एक दूसरे का हाथ थामे, ऊपर की ओर बढ़ती दो छायायें...। मैं और वह।

फिर शहर की पुरानी वाली झुग्गी बस्ती गुजरने लगी। फूस और खप्परों वाले मकानों के बीच इक्का दुक्का पक्के मकान इसमें हैं। यह वैसी ही है, जैसी उन दिनों होती थी। फिर शहर का गंदा नाला आया। हम इसे ही पार कर कालेज जाते थे। नाले ी बू बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी उन दिनों होती थी। खट्टी और उबका देने वाली बू। फिर बोर्ड आफिस वाला एरिया पड़ा। इसी से लगा हुआ वह कैंटीन था, रिजाइस और उसके पीछे ला बैले कालेज। जो आज भी मुझे किसी सपने सा लगता है। यद्यपी मैं वहाँ पढ़ा था। पर कुछ चीजें सपना ही होती हैं। उनसे गुजरने से पहले हम उसे सपना ही जानते हैं और सोचते हैं जब गुजर जायेंगे तब वह सपना नहीं रहेगा। पर वह गुजरने के बाद भी नहीं बदलता है। हम उसको लेकर कल्पनायें गढ़ते रहते हैं। उसको लेकर सपने बुनते रहते हैं। यद्यपी हम जानते हैं कि अब इन सपनों का कुछ नहीं हो सकता। हम लौटकर पीछे नहीं जा सकते हैं। ये सपने और इन्हें देखना पागलपन है। हम जानते हैं।  परन्तु फिर भी उसे लेकर सपने बुनते हैं। एक अधूरापन मन में होता है। उसे भरने के लिए हम इन सपनों को देखने का पागलपन करते हैं। पर वह अधूरापन कभी नहीं भरता है। वह उन सपनों के साथ-साथ और गहरा हो जाता है। वह खालीपन हर सपने के साथ और बढ़ जाता है।

ट्रेन के पास ही से कैण्टीन की वह सफेद बिल्डिंग गुजर रही थी। उस पर लाल रंग से लिखा रिजाइस चमक रहा था। उसके पीछे धीरे-धीरे ला बैले कालेज की बिल्डिंग दीख रही थी। रात के अंधेरे में वह कुछ उदास दिख रही थी। उसका रंग वही था, लाल किरी| पत्थरों वाला रंग। वह उन्हीं पत्थरों से बनी थी। बरसात में माली उन दीवारों पर काही के बीज डाल देता था। तब वह इमारत नीचे से हरी मखमली हो जाती थी। ... मुझे लगा यह संसार की सबसे सुंदर इमारत है। मैं उसे संसार का सबसे बढ़िया कालेज मानना चाहता था। उस क्षण लगा कि मैं सही था। यह सबसे सुंदर है। सबसे बढ़िया है। अगर यह सबसे बढ़िया नहीं है,तो फिर कौन है। मैं आज तक... उससे गुजरने के बाद भी, पंद्रह सालों बाद भी, उसके सपने देखता हूँ।

कुछ भी नहीं बदला। सब वैसा ही है।

इसी इमारत के ठीक पीछे था-ग्रीन पैसेज। वह ट्रेन से नहीं दीख सकता। पर मुझे विश्वास था, कि वह वैसा ही होगा जैसा पंद्रह साल पहले था। वह वैसा ही होगा। कहीं कुछ भी तो नहीं बदला है। वह भी वैसा ही होगा। यहाँ कुछ भी नहीं बदलना चाहिए। मुझे लगा कुछ भी नहीं बदलना चाहिए। अगर समय गुजरता है, तो गुजरता रहे। पर कुछ भी ना बदले। कम से कम जब तक मैं ज़िंदा हूँ। तब तक तो कुछ भी ना बदले। अगर बदलना ही हो तो मेरे मरने के बाद बदले।

वे बूढ़ी आँखें फिर से जाग गई थीं। वे मुझे फिर से देख रही थीं। वे अचरज में थीं, कि मैं इतनी डूब के साथ क्या देख रहा हूँ? उनमें अब कोई बेचारगी नहीं दीख रही थी। वे अब उत्सुक थीं।

रेल की पटरियों से थोड़ी ही दूर एक संकरी गहरी पुलिया थी। पुलिया के किनारे ही वह अपार्टमेंण्ट था, जिसमें उसका फ़्लैट था।  अपार्टमेंण्ट का नाम आज मुझे याद नहीं है।

मैं उत्सुकता से ट्रेन के बाहर देखने लगा। वह पुलिया और वह अपार्टमेंण्ट शायद स्टेशन के पहले ही पड़ते थे। तभी एक के बाद एक दो पुलियाँ निकलीं। पर ये वो नहीं थीं। मैं इंतजार करता रहा। पर वह पुलिया और वह अपार्टमेंण्ट नहीं आये। मुझे लगा शायद नये कंस्ट्रक्शन के कारण जगह बदल सी गई हो। वह पुलिया और वह अपार्टमेंण्ट छुप गये हों।

थोड़ी ही देर में रेल्वे स्टेशन आ गया।  स्टेशन के ऊपर दीखता चाँद पहले से ज्यादा पीला होकर दूसरी दिशा में सरक गया था। तारे सोडियम की लाइट में खो गये थे। स्टेशन पर लटकी घड़ी के काण्टे दो बजकर चालीस मिनट पर अटके थे।

मैं ट्रेन से नीचे उतर आया। स्टेशन बिल्कुल वैसा ही था, जैसा मैंने उसे उन दिनों देखा था। यहाँ मैं उससे आखरी बार मिला था। एक पुराना लैंप पोस्ट है। ओव्हर ब्रिज के ठीक नीचे। वह आज भी वहीं है। उससे सटी हुई एक बैंच है। वह भी वहीं है। उस दिन उसकी ट्रेन लेट आई थी। हम दोनों उस बैंच पर काफी देर तक बैठे रहे थे। मैं ट्रेन से उतरकर उस बैंच के पास जाकर खड़ा हो गया। उस बैंच पर एक भिखारी सो रहा था। उस दिन भी देर रात हो गई थी। हम दोनों देर तक उस बैंच पर बैठे रहे थे। उसने अपना बैग अपनी गोद में रखा हुआ था। वह चुप थी। स्टेशन में बहुत कम भीड़ थी। क्षण भर को लगा, जैसे अभी-अभी उसकी ट्रेन स्टेशन से गई है और मैं अकेला छूट गया हूँ। जैसे उस दिन छुट गया था और थोड़ी देर तक उस बैंच के पास खड़ा रहा था।

पर दूसरे ही क्षण लगा जैसे मैं बहुत समय से अकेला और खाली रहा हूँ, बस उसका अहसास मुझे आज हो पाया है। और मुझे यह शहर पराया लगने लगा। एक बिल्कुल अजनबी शहर, जिसके रेल्वे स्टेशन में रात के तीन बजे मैं किसी दूसरे ग्रह के प्राणी की तरह खड़ा हूँ। इस शहर पर अब मेरा कोई अधिकार नहीं। यह अब दूसरों का शहर है। जब हम किसी शहर में रहते हैं, तब कितने अधिकार के साथ रहते हैं। लगता ही नहीं कि शहर कभी भी हमारा नहीं होता है। वह तो हमेशा समय का होता है। लोगों में धोखे पालता है। स्मृतियों के बावजूद भी वह बेगाना हो जाता है। मानो वे स्मृतियाँ कूड़ा हों। एक मजबूरी है जो वे स्मृतियाँ इस शहर से जुड़ी हुई हैं। उन स्मृतियों का इस शहर से पोंछने का काम समय हमेशा करता रहता है। पर यह शहर मेरे लिए शायद कभी भी मर ना पाये। वह अगर मेरे जीवन में ना आती तो यह शहर मेरे लिए मर सकता था। पर उसकी स्मृतियों के कारण यह शहर मर नहीं सकता। उसकी स्मृतियों के कारण यह शहर याद रहता है। समय कितनी भी निर्ममता से पोंछे यह शहर मिट नहीं पायेगा।

मैं उस बैंच के पास थोड़ी देर और खड़ा रहना चाहता था। पर तभी ट्रेन के चलने का सिग्नल हो गया और मैं वापस अपने केबिन में आ गया।

यह उसकी स्मृतियों का शहर है। मैंने इसे उसके शहर के रूप में जाना है। उसकी स्मृतियों से भी आगे यह उसका शहर है। उसका शहर। यह शहर जिस तरह उसका हुआ, उस तरह किसी और का नहीं हो सकता है। इस शहर की हर जगह उसने इस शहर को दी है। हर जगह उसकी दी हुई है- पहाड़ियाँ जहाँ हम कई बार गये जिसे सोचते कई कहानियाँ याद आ जाती हैं। ला बैले कालेज और रिजाइस कैण्टीन जहाँ उसे पहली बार देखा था। जहाँ उससे पहली बार मिला। जहाँ से हमने शुरूआत की थी। ग्रीन पैसेज, यह स्टेशन,यह बैंच, चाँद के सामने चमकता सोडियम वाला लैंप......सब कुछ उसी का ही तो है। वह ना होती तो यह सब यहाँ नहीं होता। वह ना होती तो यह सब यहाँ इस तरह होता कि उसका होना, उसका ना होना होता। वह ना होती तो यह ट्रेन भी यहाँ नहीं रुकती।  अगर रुकती तो किसी अजनबी की तरह रुककर आगे बढ़ जाती। उसका रुकना अर्थहीन होता। उसका रुकना और ना रुकना बराबर होता।

वह ना होती तो मैं इस शहर से गुजरकर भी इससे नहीं गुजरता। मैं उसी तरह गुजरता जैसे भीड़-भाड़ वाले रास्ते से किसी शवयात्रा में कोई मुर्दा गुजरता है।  वह मुर्दा होता है। उस मुर्दे को उसके आसपास से गुजरने या घटने वाली चीजों से कोई मतलब नहीं होता है। मुर्दे का किसी से क्या मतलब? वह तो लोगों के कंधों पर चढ़ा हुआ एक तमाशा होता है। मुर्दे के आसपास की दुनिया, संसार के दूसरे लोगों की दुनिया होती है। उस दुनिया में मुर्दे का कुछ भी नहीं होता है। ... वह ना होती तो मैं इस शहर से शवयात्रा वाले मुर्दे की तरह गुजरता। एक मुर्दा बनकर गुजरता। एक तमाशा बनकर गुजरता।

वह ना होती तो यह स्टेशन भी उन आम स्टेशनों की तरह होता, जिन्हें ट्रेन पकड़ने और ट्रेन से उतरने की सुविधा के लिए बनाया गया है। वे स्टेशन सामान्य हैं। उनमें कुछ भी अलग नहीं है, कुछ भी विचित्र नहीं है। जब हम उन स्टेशनों पर उतरते हैं, तब हम पत्थरों और सीमेण्ट के लंबे चौड़े बेजान से प्लेटफार्म पर उतरते हैं। वहाँ उतरना हमें धड़काता नहीं है। वहाँ उतरना हमें खाली नहीं करता है। .........वह नहीं होती तो मैं भी इस स्टेशन के बेजान पत्थरों और सीमेण्ट पर बिना किसी धड़कन के उतरता। वास्तव में मैं उतरता ही नहीं। वह ना होती तो मैं इस स्टेशन पर नहीं उतरता। इतनी रात जब ना उतरना हो, तो कौन अजनबी स्टेशनों पर उतरता है।

वह ना होती तो स्टेशन की वह बैंच वहाँ नहीं होती। उस पर कोई भिखारी ना सोया होता। किसी को पता भी नहीं चलता कि स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक बैंच है और बैंच पर एक भिखारी सोया है।  ट्रेन चली जाती और उस बैंच का वहाँ होना कोई मायने नहीं रखता। उस बैंच का होना, उसका नहीं होना होता।

वह ना होती तो मैं नहीं होता। सिर्फ़ स्टेशन होता, ट्रेन होती,एक गुजरता हुआ शहर होता, सरकते पहाड़ होते, चाँद और पीला सोडियम होता, रिजाइस कैण्टीन का लाल रंग से चमकता साइनबोर्ड होता, बैंच पर सोता भिखारी होता, ला बैले कालेज की लाल किरी| पत्थरों वाली ऊँघती इमारत होती.........पर मैं नहीं होता। इन सब चीजों के बीच मैं नहीं होता। वह नहीं होती तो इन सब बेजान चीजों के बीच मैं नहीं होता। एक अजीब से खालीपन के साथ इस स्टेशन पर मैं नहीं होता। वह नहीं होती तो इस शहर से गुजरती ट्रेन में मेरे होने का कुछ अलग मतलब होता। पता नहीं क्या मतलब होता? कोई बेजान सा मतलब। एक ऐसा मतलब जो किसी बड़ी चट्टान की तरह हो। जो इस शहर से गुजरते हुए जरा भी नहीं धड़के।

वह नहीं होती तो यह एक बीता हुआ शहर होता। उन बीते शहरों में से एक जहाँ फिर से जाने का कोई कारण नहीं बचा है। ऐसे बहुत से शहर हैं जो बीत गये। जहाँ जाना समय को खोना है। जहाँ जाकर कुछ नहीं हो सकता। पर वह थी और आज यूँ यह शहर पूरी तरह से बीत नहीं पाया है। उसके होने के कारण यह शहर मर नहीं पाया है। लगता है कुछ रह गया है। कुछ रह गया है बीतने से। कुछ रह गया है, इसे पूरी तरह से बेजान बनाने से। यह शहर अभी खोया नहीं है। इस शहर को अभी गुम होना है। उसने अभी इसे गुमने नहीं दिया है।

पता नहीं वह कहाँ होगी? पंद्रह साल हो गये। पर आज भी इस शहर पर उसका बस चलता है। यह शहर आज भी उसका कहा मानता है। पता नहीं वह कभी मिलेगी भी या नहीं? यह शहर भी मेरी तरह उसकी उम्मीद में धड़कता है। यह शहर नहीं मरेगा। उसकी यादें इसे मरने नहीं देंगी।

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