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05.31.2008
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बीते शहर से फिर गुजरना
तरुण भटनागर 


रिलेटिविटी

छायायें पीछे की ओर भाग रही थीं। पर उनसे जी एकता गया था।  अब उन्हें पकड़कर छोड़ने का मन नहीं कर रहा था। मैंने काले आकाश की ओर देखा और उसे पकड़कर छोड़ना चाहा। पर वह छुट नहीं पाया। एक बार पकड़ में आया काला आकाश छूटता नहीं है। वह ट्रेन के साथ-साथ चलता है।  उसके चाँद-तारे और उसका अंधेरा ट्रेन के साथ चलते हैं। वह बीतते अंधेरों में नहीं छुटने की अपनी जिद पर अड़ा रहता है। वह ट्रेन के साथ ही रुकता है, ट्रेन के साथ ही चलता है और ट्रेन के साथ ही दौड़ता है। ना एक कदम आगे और ना पीछे।

ऐसा क्यों है? क्यों पेड़ घर, पहाड़, पुल, रेल्वे स्टेशन, शहर, गाँव...... सब तेजी के साथ पीछे चले जाते हैं और चाँद तारे, आकाश.....भागती ट्रेन के साथ-साथ चलते रहते हैं। स्कूल में फिजिक्स में पढ़ा था, कि ऐसा प्रिंसिपल ऑफ रिलेटिविटी’(सापेक्षवाद का सिद्धांत) के कारण होता है।  चाँद-तारे पृथ्वी से बहुत दूर हैं। इसलिए ट्रेन के चलने पर भी पृथ्वी के रिलेटिव उनका डिस्प्लेसमेंण्ट (विस्थापन) बहुत कम याने लगभग शून्य होता है, जबकी पेड़, जंगल, पहाड़, घर... वगैरा का डिस्प्लेसमेंण्ट बहुत ज्यादा होता है। इसलिए चाँद तारे साथ-साथ चलते हैं। पर बात शायद इससे भी आगे जाती है। जो जितना निकट होता है, वह इतने ही तेज झटके के साथ बीत जाता है।

वह भी जब निकट हो गई, झटके के साथ बीत गयी। मैं उसे ठीक से विदा भी नहीं कर पाया। बहुत सी बातें हमेशा-हमेशा के लिए मिट गईं। आज सोचता हूँ तो लगता है, कि कितना कुछ किया जा सकता था, जो नहीं हो पाया। लगता है अगर वह मिल गई। बीत चुके पूरे पंद्रह सालों के बाद तो मैं आज भी उससे कह सकता हूँ, वह सब जो कहना था। मैं उसके सामने चुप भी रह सकता हूँ। ठीक उसी तरह जैसे मैंने उसके सामने चुप होना सोचा था, कभी उसे निहारते हुए, कभी उसके कामों को देखते हुए उनमें इनवाल्व होते हुए, कभी उसे मुझमें डूबने के लिए गिरते हुए......तरह-तरह की चुप्पियाँ। लगता है जो छुट गया है उसे आज पूरा किया जा सकता है। कोई अंतर नहीं अगर पंद्रह साल बीत गये।

जब वह जा रही थी, मैंने उससे कहा था कि मैं आ सकता हूँ। वह जब भी बुलायेगी, मैं आऊँगा। पर फिर कभी उससे बात नहीं हुई। ना कोई फोन आया, ना कोई मैसेज... बाद में कुछ दिन मैंने उसे तलाशा भी। कालेज के पुराने फ्रैण्ड्‌स जिनसे मेरे कान्टेक्ट थे, उसकी वह फ्रैण्ड जो उसकी रूम मेट थी उसे मैंने ढूँढ निकाला था, पर उसे भी पता नहीं था... यहाँ तक की मैंने इंटरनेट पर भी उसे तलाशा-ओल्ड फ्रैण्ड्‌स डाट काम। पर वह कहीं नहीं थी।

मैं ट्रेन के बाहर दिखते आकाश को फिर से ताकने लगा। काला आकाश हमेशा साथ चलता है। हाँ हमेशा...।

उसकी तरह का प्यार

मैं याद करने लगा। वे दिन जब हम अक्सर मिलते थे।

उसने एक फ़्लैट ले रखा था। वह अपनी एक फ्रैण्ड के साथ उसे शेयर करती थी। एक कमरा और एक छोटी सी बालकनी। बालकनी से दिखते चौरस छत वाले बेतरतीब मकान और उनके पास से गुजरने वाली रेल्वे लाइन। हर थोड़ी देर बाद ट्रेन की धड़धड़ाहट फ़्लैट के उस कमरे की चुप्पी को तोड़ देती थी।

अक्सर हम दोनों कालेज से उसके फ़्लैट तक साथ-साथ आते थे। कभ उसकी फ्रैण्ड फ़्लैट में हो थी, तो कभी वह खुद उस फ़्लैट का लाक खोलती थी। जब उसकी फ्रैण्ड देर से लौटती तो वह फ़्लैट का दरवाजा खोले बिना भीतर से ही उससे कहती कि वह थोड़ी देर कहीं और चली जाये, क्योंकि मैं उसके साथ हूँ। वह अक्सर एडजस्ट कर लेती, पर कभी-कभी वह इरिटेट हो जाती। फिर हम लोगों ने अपनी मीटिंग्स इस तरह तय कर लीं कि उसे प्राब्लम ना हो। उसे पहले से पता होता और वह कहीं और चली जाती।

जब उस फ़्लैट को याद करता हूँ तो कुछ भी सिलसिलेवार याद नहीं आता है।  बस कुछ टूटे हुए चित्र हैं। वे चित्र किसी एक मोमेण्ट को पूरा नहीं करते हैं।  

मुझे याद आया मैं और वह फ़्लैट की बालकनी में खड़े थे। उसने मुझसे कुछ कहा था। पर तभी ट्रेन गुजरी और मैं सुन नहीं पाया। मैंने उससे पूछा। उसने कहा-कुछ नहीं। फिर उसने दुबारा कहा। शाम घिर रही थी। चौरस छत वाले घर धुंये में घिर रहे थे। मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। बस उस रात मैं घर नहीं गया। वह पहली रात थी। उसकी फ्रैण्ड भी उस रात नहीं आई।  उसे पहले से पता था। उस रात मैंने हर धड़धड़ाती ट्रेन को सुना था। फिर जब सुबह अपने घर गया तो घर वालों के पूछने पर उनसे झूठ बोला कि, रात भर मैं कहाँ रहा था। फिर बाद में यह झूठ मुझे कई बार कहना पड़ा। मैंने पहली बार महसूस किया, कि हेज का होना जरूरी है। पर जैसे यह मेरी कमजोरी हो। फिर इससे भी आगे मानो मैं गलत हूँ। जब यूँ सोचता तो खुद से चिढ़ सी हो जाती। मन कहता घर वालों से कह दूँ, कि रात को मैं कहाँ था, किसके साथ सोया था, हम दोनों पूरी रात एक दूसरे से...... कह दूँ सब कुछ। क्या ज़रूरत है, इस झूठ की, इस ढोंग की जो मुझे पाप लगता है। पर जैसे मैं हार रहा था। मुझे पता ही नहीं था, कि यही वह रास्ता है जहाँ से मौत को आने की जगह मिलती है, वरना आदमी कभी मरने के लिए पैदा नहीं होता।

उस फ़्लैट में मैं उसके साथ उन रास्तों पर चला था, जहाँ मैं फिर किसी और लड़की के साथ नहीं चल पाया। वे रास्ते उसने खुद बनाये थे। उसने सोचा था, वह मुझे वहाँ अपने साथ लेकर चलेगी। उसने मुझे अपने साथ लेकर चलने का सोचा था। ऐसा बहुत कम होता है। ऐसी कितनी लड़कियाँ होती होंगी, जो अपने प्रेमियों के लिए रास्ते सोचकर रखती हैं। कि जब प्यार होगा तब वे उसे अपने साथ उन रास्तों पर ले जायेंगी।  वे उन रास्तों पर नहीं जायेंगी जिन्हें उनके प्रेमियों ने उनके लिए सोचा है। बल्कि वे उन्हें खुद ले जायेंगी, उनका हाथ पकड़कर, उन रास्तों पर जो उन्होंने सोचा है। वे खुलकर बतायेंगी कि यह है, जो उन्हाँेने सोचा है। मैंने जितना जाना है, जितना महसूस किया है, वह यह है, कि ज्यादातर के पास उनके अपने रास्ते ही नहीं होते हैं। अगर होते हैं, तो वे उन्हें छिपाकर रखती हैं। फिर उनका दावा होता है, कि वे प्यार करती हैं। वे उन रास्तों को छिपाकर प्यार करती हैं। कितना अजीब है यह विरोधाभास।  कुछ छिपाकर प्यार करना। पर हर कोई इसे अंधे की तरह मानता है और प्यार चलता रहता है। पर उसने नहीं छिपाया। मैंने उससे पूछा भी नहीं। जब छिपा ही ना हो तो पूछना कैसा। उसके साथ उन रास्तों पर चलना बड़ा सहज सा था। मैंने सोचा था, कि प्यार इसी तरह होता है। पर मैं गलत था। बहुत कम लड़कियाँ उस तरह कर पाती होंगी। उसकी तरह प्यार करना कठिन है।

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