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05.31.2008
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बीते शहर से फिर गुजरना
तरुण भटनागर 


समय: एलार्मिंग डाग या शिकारी 

ट्रेन कुछ धीमी हो गई थी। अब छायाओं को पकड़ने और छोड़ने के काम में मन नहीं था। वह बेमन का काम था। गुजरते समय की मजबूरी। क्योंकि घड़ी रुकती नहीं। क्योंकि अकेलापन हाड मांस बन गया है। क्योंकि हम कभी खाली नहीं होते। क्योंकि निर्वात(वैक्यूम) मरने से पहले सिर्फ़ एक कमरा भर हवा के लिए तड़पाता है। ऐसे बहुत से क्योंकि मैंने ढूँढें हैं, जो इस बेमन के पीछे उसे धकियाते से पड़े हैं।

केबिन में ऊपर की बर्थ पर सोया बूढ़ा जाग गया है। वह बूढ़ा मुझे ताक रहा था। उसकी आँखें मेरे देह पर पड़ी थीं। वे मेरे भीतर झाँकने की ताक में थीं। मैं कुछ असहज सा हो गया। बूढ़ी आँखों का भीतर झाँकना सकुचा देता है, जैसे कोई अनुभवहीन आदमी जब किसी वेश्या के सामने नंगा होता है तब एक हिच उसके भीतर की दीवारों को नोचता रहता है।  उस बूढ़े की आँखों से खुद को छिपाना कठिन था। क्या पता ट्रेन की खिड़की के कांच से चिपका अंधेरे देखता आदमी उन बूढ़ी आँखों के करोड़ों खांचों में से किसी खांचे में फिक्स हो जाय। मैं क्षण भर को ऐसा प्रदर्शित करने लगा जैसे मैं कुछ भी तो नहीं कर रहा हूँ...बस मुझे नींद नहीं आ रही थी, सो कांच से चिपक गया... पर अब नींद आ रही है... मुझे जम्हाई आ रही है, जिसका मतलब है कि मैं जल्दी ही सो जाएँगा... उन आँखों का मुझे ताकना बेमानी है...। मैं प्रदर्शित करता रहा, जैसे चाइनीस चेकर की गोटी एक सोच के तहत एक गढ्‌ढे से दूसरे गढ्‌ढे पर कूदती रहती है।

कितना विचित्र है, उस दिन हमें लगा ही नहीं था, कि हेज होनी चाहिए। किसी ओट का खयाल ही नहीं आया था और आज मैं एक निरीह बूढ़ी आँख से सकुचा रहा था। समय कितना कुछ बदल देता है। वह नष्ट भी करता है। शिकारी जानवर की तरह किसी जीवन को चबाकर नष्ट कर देता है।

पर वे आँखें मुझे ताकती रहीं। मैंने क्षण भर को उन आँखों को देखा। पता नहीं क्य्¡ मुझे लगा कि मैं गलत हूँ। मेरा अनुमान मुझे गलत खींच रहा है। वे आँखें मेरे घर के दरवाजे पर भिखारी की तरह खड़ी हैं,पर वे कुछ मांग नहीं रही हैं। उन आँखों का टटोलना चुप्पी में बैठे-बैठे पैरों को हिलाने जैसा है। उसके पीछे कोई नीयत नहीं है। ऐसा सोचकर मैं निश्चिंत हो गया और फिर से खिड़की के कांच से चिपक गया।

मुझे फिर से उसकी आखें दिख गईं-डेट आनली डेट। उसने एक लिमिट बनाई थी। शुरू में हम दोनों मानते थे- डेट...आनली डेट। पर फिर लगा ही नहीं कि कब यह डेट, डेट नहीं रही। बात समय गुजारने भर की नहीं थी। हमने सोचा था, थोड़ी सी मौज-मस्ती और फिर सब कुछ दफन। हमेशा आसान लगा था, समय को इस तरह गुजारकर दफन कर देना। कितना आसान है, कोई झंझट नहीं। हम समय को अपनी तरह से गुजारना चाहते थे। हमने जाना था, कि समय हमारी मुट्ठी में बंद है। वह उन पामेरियन, तिब्बती लासाप्सा या सिल्की सिडनी सरीखे पालतू कुत्तों की तरह है, जिन्हें उनके मालिक शाम को घुमाने के लिए ले जाते हैं और वे हगने-मूतने के लिए भी अपने मालिक की दया पर होते हैं। जब रात को कोई अजनबी आ जाता है, तब दूर से ही भौंकते हैं और फिर भीतर घुस जाते हैं। एलार्मिंग डाग्स... समय भी ऐसा ही लगता था। जब हम नये-नये जवान होते हैं, तब पहली बार समय हमारे सामने इसी रूप में आता है। एक मजबूर एलार्मिंग डाग की तरह। ...पर डेट, फिर आगे डेट नहीं रही। हम गलत सिद्ध हुए थे। और इस तरह गलत होना हमें अच्छा लगा था। हमने इस बारे में संजीदगी से बात भी नहीं की। हम एक दूसरे पर हँसते हुए कहते थे- डेट आनली डेट...। व्हाट ए फन...यू वर लुकिंग सिली सेइंग डेट आनली डेट...। मुँह में स्ट्रा दबाये हुए, लिपिiस्टक पुते चेहरे को अजीब तरह से घुमाते हुए...डेट आनली डेट। कभी-कभी वह चिढ़ जाती। पर यही वह बात थी, जिससे मैंने जाना कि समय पामेरियन डाग की तरह अलार्मिंग डाग ही नहीं है, वह शिकार भी कर सकता है। उसने हमारी डेट्‌स का इस तरह शिकार किया था, कि हमें पता भी नहीं चला। फिर यह भी कि आप तय करके किसी के साथ नहीं चल सकते। अगर किसी के साथ चलना है, तो कई चीजों को समय के हवाले करना पड़ता है। जैसे समय ने हमारे प्यार को तय कर दिया था, जबकी हमने सोचा था, कि हम आगे नहीं बढ़ेंगे।

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