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05.31.2008
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बीते शहर से फिर गुजरना
तरुण भटनागर 


खुले आकाश के नीचे बिना हेज के......        

जब हम मिले थे, तब नहीं सोचा था कि हम इस तरह अलग होंगे। हमने सोचा था, सब कुछ थोड़ा दिन चलेगा और फिर खत्म हो जायेगा। कॉलेज के दूसरे लड़के-लड़कियों की तरह, जो बस कुछ ही दिनों में अपने फ्रैण्डस बदल लेते हैं। बस कुछ दिन का घूमना फिरना, मौज मस्ती और फिर सब खत्म...। हमने इसे एक नाम दिया था- लव फॉर फन। कितनी उल्टी चीज है, लव और फन।  हमारे कॉलेज में यह खूब था। पर लगा जैसे कोई एक ही चीज होती थी-लव या फन। आज सोचता हूँ तो लगता है दोनों कभी भी साथ नहीं था। किसी से संबंध के लिए लव जरूरी था। यह था। लोग बीते समय को जल्दी भूल नहीं पाते थे। उसे बेदर्दी से झटकारना पड़ता था, जैसे शरीर पर चिपकी जोंक पर नमक डालकर चिमटे से खींचकर अलग करना पड़ता है। 

कुछ दिन हमारी यादों में उन पोस्टरों की भांति चिपक जाते हैं, जिन्हें हम बेदर्दी से फाड़कर अलग तो कर देते हैं, पर उनके कुछ निशान रह जाते हैं। कुछ टुकड़े पोस्टर के चिपके रह जाते हैं। मुझे ऐसा ही चिपका टुकड़ा याद आया।

हम दोनों कालेज के कैण्टिन में थे। वह मुझसे किसी बात का आश्वासन चाहती थी।

  डेट।  ऑनली डेट।   

उसने ऑनली थोड़ा वजनदारी से कहा। कहते समय उसकी आँख मेरी आँख में घुसी जा रही थीं।

या...ऑनली डेट। नथिंग एल्स।

मेरे चेहरे के सामने से उसकी ब्राउन आँखें हट गईं। उसके चेहरे पर एक बेपरवाही तैर गई। वह बिल्कुल रिलैक्स हो गई।

उसको मैंने पहले भी देखा था। पर आज वह कुछ अलग लग रही थी। वह वैसी ही थी, जैसी हमेशा दिखती थी। धंसे हुए गाल, उभरी चीक बोन, दुबला-पतला लंबा सा चेहरा जिस पर अब भी थोड़ा बचकानापन रह गया था। कंधे पर झूलते सर्पिलाकार बालों की लटें जो बार-बार उसके चेहरे के सामने आ जातीं और वह उन्हें इकट्ठा कर अपने कानों के पीछे खोंस देती। उसके होंठों में स्ट्रॉ फंसी थी, जिसमें से ऊपर चढ़ता कोल्ड ड्रिंक दिख रहा था। बीच-बीच में वह अपने दातों से स्ट्रॉ को दबा देती और तब उसके गुलाबी लिपिiस्टक पुते होंठ अजीब से दिखने लगते।

उसकी चिन पर एक तिल है। मैंने उस तिल को छूआ है। मैंने सोचा है, आज मैं उस तिल को अपने होंठों में दबा लूँगा।

उस दिन हम दोनों ग्लोबस माल के मार्केट में घूमते रहे। मैं उससे जिद करता रहा कि हम वहाँ नहीं जायेंगे, पर वह ले गई। उसे एक बुक खरीदनी थी। फिर हम दोनों ग्रीन पैसेज गये। ग्रीन पैसेज हमारे कॉलेज के पास ही है। वहाँ अक्सर कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ जाते हैं। अक्सर और पूरे दिन वे वहाँ मिल जाते हैं। यह जगह उन्हें इतनी अच्छी लगती है, कि उन्होंने उसका नाम ही बदल दिया है। वे उसे एमरैल्ड पैसेज कहते हैं। वह एमरैल्ड लगता भी है। पूरे पार्क में ताड़ के पेड़ लगे हैं और स्क्वेयर कट वाली हेज लगी है। वहाँ गजब की शांति है।  उस जगह पहुँचकर लगता है, जैसे हम इस भीड़-भाड़ वाले शहर में ना हों। मानो यह पार्क इस शहर में ना हो। सुना है चाँद में एक जगह है, जिसे हम नहीं देख पाते हैं। अंधेरे में खोई हुई गजब की शांति वहाँ है। उसे नाम दिया गया है- ओशेन ऑव ट्रेंक्वेलिटी। बस वैसा ही है ग्री पैसेज। लगता जैसे बरसों से ई यहाँ ना आया हो।

पहले मैं अकेले यहाँ आता था। तब अक्सर इक्का दुक्का लड़के-लड़कियाँ वहाँ दिख जाते थे। घास के छोटे-छोटे लॉन में दुनिया से बेखबर वे एक दूसरे में डूबे रहते।  लॉन के किनारों पर जहाँ हेज मुड़ती है, वहाँ कोई ना कोई लड़के-लड़की का जोड़ा दिख ही जाता था। जब मैं उनके पास से गुजरता तो अक्सर उन्हें पता ही नहीं चलता था। फिर अगर कहीं वे मुझे देख लेते तो खुद को और सुरक्षित करते हुए हेज के और भीतर घुस जाते।  कुछ परवाह नहीं करते थे। पर कभी-कभी जब किसी जोड़े पर नजर पड़ती और वह सकुचाकर किसी दूसरी सुरक्षित जगह पर चला जाता तो मुझे एक तरह का अपराध बोध होता। जब कोई मुझे देखकर सकुचा जाता तो एक अजीब सा गिल्ट, एक संकोच सा होता जिसे बता पाना मुश्किल है। पर एक मुश्किल भी थी। उस पार्क में लड़के-लड़कियों से बचकर चलना मुश्किल सा था। कोई ना कोई दिख ही जाता । सच बचकर चलना कठिन ही था। फिर ज्यादातर लड़के-लड़कियाँ जो वहाँ दिखते वे हमारे कॉलेज के ही होते थे। इक्का-दुक्का बाहरी चेहरे भी दिख जाते थे। जब किसी अपने कालेज वाले जोड़े से मेरी नजर मिलती, हम दोनों क्षण भर को एक दूसरे को ऐसे देखते जैसे हम एक दूसरे से अजनबी हों। हम एक दूसरे कोइस तरह देखते जैसे पहली बार देख रहे हों।  कॉलेज में साथ-साथ मटरगस्ती करने वाले लड़के-लड़कियाँइस पार्क में अजनबी और पराये से लगते। फिर जब उनमें से कोई मुझे देखकर सकुचाता तो मेरा गिल्ट और बढ़ जाते जैसे मैं अपने केा बरदाश्त नहीं कर पा रहा हूँ। उस पार्क में सच्ची शांति थी। चाँद के अदेखे अंधेरे वाले भाग ओशन ऑव ट्रेंक्वेलिटी से भी ज्यादा शांति। इतनी शांति कि वहाँ पहुँचकर अजनबी और पराया बना जा सकता था। एक अण्डरस्टैडिंग कि हम मटरगश्ति करने वाले यार दोस्त होकर भी कितने अनजान हो सकते हैं। उस पार्क का प्रभाव विरक्ति पैदा करता था, वह भी बिना किसी दबाव के स्वभाविक तरीके से।

मैं और वह ग्रीन पैसेज के एक कोने में लकड़ी की पार्क चेयर पर बैठ गये। चेयर के ऊपर कचनार का एक पुराना पेड़ था। जिसकी पत्तियाँ चारों ओर बिखरी थीं। मेरा ध्यान उसके बैग पर गया। उसमें से वह बुक झाँक रही थी, जो उसने अभी खरीदी थी। मैंने उस बुक को निकाल लिया। थॉमस हार्डी की टैस ऑव द अरबरविल

 कोर्स बुक। आई हेट लिट्रेचर।

उसने कहा।

बट आई डोंट।

 हाउ यू बी सो अनरोमैंटिक।

 मुझे यह अच्छा लगता है।

मैंने उसके चिन पर बने तिल पर उंगली रखते हुए कहा।

 व्हाट।

उसके माथे के बीच बनावटी से बल पड़ गये। मैंने अपना चेहरा उसकी ओर बढ़ाया। मैं उस तिल को अपने होंठों में दबा लेना चाहता था। वह कुछ सकपकाकर पीछे हट गई। मेरे और उसके बीच एक खाली जगह बन गई। एक छोटी सी खाली जगह जो लम्बी सी खाली जगह महसूस हो रही थी। उस खाली जगह में पार्क चेयर के लकड़ी के बत्ते थे। हम दोनों अपने-अपने में बैठे थे। मैं उस खाली जगह को भरना चाहता था।  मैंने उसका हाथ अपने हाथ में खींच लिया। वह खाली जगह भर गई। अब वहाँ उसका हाथ था। मेरी हथेली में दबा उसका हाथ। उसके बढ़े हुए नाखून मेरी हथेली में चुभ रहे थे। पास ही एक स्क्वैयर कट हेज थी। वह हेज हल्की सी हिली। हम दोनों उस हेज को देखने लगे। फिर वह मुझे देखने लगी। पता नहीं उस समय वह क्या सोच रही थी? तभी हेज जोर से हिली। मैं उसकी ओर देखकर मुस्करा दिया और वह मुझे देखकर अपना मुँह अपने हाथों से दबाकर हँस पड़ी। शायद उसकी हँसी हेज में दबे लोगों ने सुन ली। हेज शांत हो गई। मुझे हमेशा की तरह गिल्ट महसूस हुआ।

मेरा बैग अभी तक मेरे कंधे पर था।  मैंने उसे उतारकर चेयर के नीचे घास पर रख दिया। मुझे उस पर थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था। वह उसी किताब को देख रही थी, जिसके लिए उसने कहा था आई हेट। मैं उसे अपने और पास बुलाना चाहता था। पर फिर लगा मैं ही क्यों?

व्हाय यू लैफ़्ट निशा? तुम दोनों ज्यादा दिन साथ नहीं रहे।

उसने अचानक पूछा।

वी वर नॉट इंट्रेस्टेड लांगर। शी ए ट्रेडिशनल...। यू नो आई हेट सच थिंग्स। बट इट्‌स ऑब्वियस। इट कैन हैपेन। तुम्हें पता है, व्हॉट इज द बेस्ट थिंग एबाएट ए डेट?’

उसने ना कि मुद्रा में अपना सिर हिला दिया।

 इट्‌ द बेस्ट वे ऑव लiन्§ग रिलेशंस। यू कैन नो द सीक्रेट ऑव रिलेशन्स।

आई डोंट थिंक। ये कोई रिलेशन नहीं है। यह सिर्फ़ डेट है। डेट।  ऑनली डेट।

मैं उससे बहस नहीं करना चाहता था। मैंने अपने बैग से एक मैगजीन निकाली और उसे उलटने-पलटने लगा। मैं उसे दिखाना चाहता था, आई डोंट केयर। जैसा की वह मेरे साथ कर रही थी। फिर वह भी उस मैगजीन को देखने लगी। मेरे कंधे पर उसकी चिन थी और वह मेरी तरह से उस मैग्जीन को देख रही थी। मैग्जीन के बीच ग्लेज्ड पेपर पर दो पोस्टर बने थे। पोस्टर में जो मâडल थी, वह नेकेड थी। मैंने उस फोटो को उसे दिखाते हुए उसके कान में कुछ कहा। उसने मेरे बाल पकड़कर हल्के से झिंझोड़ दिये और अपना चेहरा मेरे कंधे से ऊपर उठाकर हँसने लगी। उसके चेहरे पर कचनार के पेड़ से छनकर आती घूप-छांव अपना खेल दिखाने लगी। मैंने धीरे से उसके चिन पर बने तिल पर अपने होंठ रख दिये। अचानक उसके हाथ मेरे कंधे और पीठ पर आ गये। मेरे चेहरे के दोनों ओर उसके सर्पिलाकार बाल थे और मेरे सामने उसकी ब्राउन आँखें थीं। मैं उन आँखों को अपने से दूर नहीं जाने देना चाहता था। वहाँ कोई हेज नहीं थी। पार्क की कुर्सी के चारों ओर खुली हवा और इपर कचनार की जाली से झाँकता आकाश था। लगा ही नहीं कि हेज होनी चाहिए। खयाल ही नहीं आया।

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