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05.31.2008
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बीते शहर से फिर गुजरना
तरुण भटनागर 


रात वाली ट्रेन और भागती छायायें

रात के एक बजे हैं।  अंधेरे में एक ट्रेन जा रही है।

ट्रेन की खिड़की के कांच पर सिर टिकाये, मैं बाहर देख रहा हूँ। बाहर भिन्न-भिन्न प्रकार की छायायें हैं।

मैं अगर वे काली छायायें नहीं देखता तो शायद बोर हो जाता। क्योंकि मेरे पास करने को कुछ नहीं था, सो मैंने अंधेरे में भागती छाया को पकड़ने और छोड़ने का खेल ढूँढ लिया था।

मेरे केबिन में पहले लोगों की आवाजें थीं। पर अब बस ट्रेन की आवाज़ है। बीच-बीच में सोते यात्रियों में से कोई जाग जाता है। पर उसकी आवाज़ ट्रेन की आवाज़ को पछाड़ नहीं पाती है।

छाया को पकड़ने और छोड़ने का खेल अपने आप चालू नहीं हुआ था। मुझे नींद आ रही है। मैं सोना चाहता हूँ।  पर मैंने सोचा है कि मैं जागूँगा। उस समय तक जागूँगा जब तक वह शहर नहीं आ जाता। वह मेरे सपनों का शहर है। पंद्रह साल पहले मैं उसी शहर में रहता था। उस शहर में मैं था और वह थी। तब हम दो थे। आज भी दो हैं। एक यह शहर है और दूसरी उसकी स्मृतियाँ हैं। और यूँ वह आज भी है। कुकुरमुत्ते या आर्किड की तरह...यादों के कचरे पर, एक पराजीवी वह शहर आज भी है। वह शहर आज भी वहीं है, जहाँ मैं पंद्रह साल पहले उसे छोड़ आया था। कोई और शहर होता तो अब तक मर चुका होता। कई दूसरे शहर भी हैं, जहाँ मैं रहा हूँ और जिन्हें मैं छोड़ चुका हूँ। वे सारे शहर मर चुके हैं। बीते शहरों में से बस यही एक शहर अभी तक जिन्दा है। मुझे उस शहर में उतरना नहीं है। बस उसके लिए जागना है। उसे देखने की इच्छा है। मै उसे ट्रेन में बैठे-बैठे देखना चाहता हूँ। और यूँ उस शहर को गुजरता हुआ देखना चाहता हूँ। उसे फिर से एक बार आता हुआ और फिर से गुजरता हुआ देखना चाहता हूँ। पहले जब वह शहर आया था, तब मैं इसी शहर में रुक गया था। मैं इस शहर में रुक गया था। जीवन की ज़रूरत थी इस शहर में रुकना। जीवन में हम ज़रूरत के मुताबिक ही शहरों को चुनते हैं। उन्हें चुनने में चाहत नहीं होती है। फिर ज़रूरत के मुताबिक ही उसे छोड़ भी देते हैं। अगर उसे छोड़ते समय भीतर कुछ कुलबुलाता है तो हम खुद को समझा लेते हैं। हमारी ज़रूरत हमारे मन को समझा देती है।

तभी लगा बाहर भागती छायाओं में से कोई छाया रुक सकती है। कोई छाया रुककर ट्रेन की खिड़की से चिपककर, ट्रेन के साथ-साथ, मेरे साथ-साथ चल सकती है। वह चिपक सकती है, कंपार्टमेण्ट की उसी खिड़की से जिस पर मैं अपना सिर टिकाये ऊँघ रहा हूँ।  खिड़की के कांच के एक तरफ मेरा चेहरा चिपका है और दूसरी तरफ वह छाया चिपक सकती है। एक अनजान छाया। छाया जिसे मैं नहीं जानता। शायद उस छाया को मैं अपने साथ रख लूँ और फिर एकांत में उस छाया के पाजिटिव बनाऊँ। किसी फोटोग्राफर की तरह जो डार्क रूम के अंधेरे में घण्टो नेगेटिव के पाजिटिव बनाता रहता है। कई पाजिटिव चित्र......

वे अकेलेपन के चित्र हैं। वे पाजिटिव चित्र हैं।  अकेलेपन के चित्र जो पुराने होकर भी अपना रंग बनाये रखते हैं, जो कागज पर डिफ़्यूज होकर नहीं मिटते हैं और जिन्हें रसायनों से मिटाया नहीं जा सकता है।  वे अपनी मर्जी के मालिक होते हैं। उन्हें मिटाने के लिए खुद को गोली मारनी पड़ती है। पर उस रात उस ट्रेन में ऐसा कुछ भी नहीं था। भागती ट्रेन के बाहर की अंधेरी छाया, एक टाइम पास थी। जिसके रुकने का कारण नहीं बनता। अगर अटककर रुक भी जाती, तो वह यादों का हिस्सा नहीं बन पाती। मैं उन छायाओं में से किसी को भी आज याद नहीं कर सकता।

हमें क्या याद रहता है? और क्यों? बहुत महसूस करने के बाद लगा, इसका कोई कार नहीं है। जिन यादों के कारण थे, वे ज्यादा टिक नहीं पाईं।

 आई विल रिमैंमबर यू

कुछ दिन और...।

 मुझे जाना ही है। जाना है।

उस रात भी अंधियारे वाला हंसियानुमा चाँद था। उस रात मैंने उसे आखरी बार टटोलती नजरों से देखा था। निकली हुई कॉलर बोन, छोटा लंबा चेहरा, उठी हुई नाक, उभरी चीक बोन, सपाट सी छाती जिसके बीचों-बीच एक गड्‌ढे के होने का भ्रम मुझे होता यद्यपी ऐसा नहीं था, रूखे बाल, गंडेरी की तरह पतले हाथ, थूथन की तरह बाहर निकली कोहनी ...... मैं आज तक नहीं जान पाया कि वह मुझे अच्छी क्यों लगती थी? बाद में लगा मैं बिना बात ही अपने को परेशान करता रहा यह जानने में। इस बात का जवाब किसी के पास नहीं होता है। संसार के सबसे अच्छे प्रश्नों की तरह जो किसी जवाब पर पहुँचकर खत्म नहीं होते हैं।

मैं उससे बच्चे की तरह जिद करता रहा-कुछ दिन और। कुछ और दिनों में कुछ नहीं होता। कुछ और गुंजाइश निकल सकती है।

अभी नये सैशन के लिए टाइम है। तुम चाहो तो रुक सकती हो।

तुम जानते हो.........मेरी प्रॉबलम, आई हैव टू गो.........

 ठीक है। बट आई एम सेइंग फॉर......

नॉट एट ऑल आई हैव टू गो...।

उसने मुझे पूरी तरह नकारते हुए कहा। मानो कह रही हो अब और कुछ नहीं, हाँ कुछ भी नहीं।

यू आर स्टबबॉर्न।

मैं थोड़ा झुंझला गया।

वह मुझसे थोड़ा दूर होकर बैठ गई। उसने अपने कानों में वॉकमैन लगा लिया। वह गाना सुनने लगी। वह इतना तेज गाना सुनने  लगी, कि मुझे भी वह सुनाई देने लगा। उसने एकदम से वाल्यूम बढ़ा दिया था। वाकमैन के इयरफोन से गाने की भुनभुनाती आवाज़ सुनाई दे रही थी। उस आवाज़ पर जरा सा ध्यान देने पर समझ आता था, कि वह कौन सा गाना है। वह उसका गाना नहीं था। वह मेरा गाना था। उस गाने से वह हमेशा चिढ़ती थी- हुंह ट्रेसी चैपमैन। हाउ यू बी सो अनरोमैंटिक...। व्हाट ए नॉनसेंस। और मैं उससे वह इयरफोन छीन लेता था। पर आज...। वह नहीं सुन रही थी। उसके कान में वह गाना भांय-भांय कर रहा था। वह गाना उसके कान के बाहर ही खत्म हो रहा था। वह गाना उसके भीतर नहीं जा पा रहा था।

मुझे पता था, वह नहीं सुन रही है। जैसे मैं ट्रेन में टाइम पास कर रहा हूँ, ठीक वैसे ही उस दिन वह वाकमैन सुन रही थी। वह टाइम पास नहीं था, बस उसमें मन नहीं था। उसका मन कहीं और था और वह सारे संसार से एक मौन अनुरोध कर रही थी- मुझे अकेला छोड़ दो... प्लीज लीव मी एलोन...... धीरे-धीरे अंधेरे में उसकी आँखें चमकने लगी थीं। रात में चाँद की रौशनी में जिस तरह पहाड़ी नाले का पानी और उसके नीचे के पत्थर चमक जाते हैं।  अचानक।  ठीक उसी तरह उसकी आँख चमकने लगी थी। मुझे पता था, उन आँखों में वह पानी भी उसी तरह से आया था, जिस तरह पहाड़ी नाले में दूर पहाड़ से उतरकर, लंबे जंगलों को पार कर पानी आता है। फिर उसके नाक सुड़कने की आवाज़ मुझे सुनाई दी। फिर वह मेरे पास सरक आई और मेरे कंधे पर उसने अपना सिर टिका दिया। ...एक गीला सा अहसास मेरी गर्दन पर जम गया।  लगता है वह अहसास आज भी बाईं गर्दन की खाल पर जमा है। गीलेपन में गर्दन में हल्के चुभते उसके घुंघराले बाल, मानो आज भी मेरी गर्दन पर जमे हैं। वे अक्सर मुझे महसूस होते हैं।

उस समय वह बात अब भी मेरे भीतर थी- कुछ दिन और। ...। यू कैन डू इट......यू कैन डू इट फॉर मी...। मैं उससे जिद करना चाहता था- यू कैन स्टे, फार मी... यू कैन। लगता था वह मान जायेगी। वह समय हमारे अनुकूल नहीं था।  ना मेरे अनुकूल और ना उसके। और जब समय विपरीत होता है, तब सिर्फ़ एक कोरी जिद रह जाती है। मैं उस समय को, उस जरा से समय को भी जीना चाहता था। मैं उसे छोड़ नहीं सकता था। मैं भूलना चाहता था, क बस आज का ही दिन है। कल हम एक दूसरे से अलग हो जायेंगे। मैं मानना चाहता था कि कुछ भी नहीं हुआ है। हम अभी साथ रहेंगे। उस समय तक साथ रहेंगे, जब तक मन चाहेगा। पर ऐसा नहीं होने वाला था। मैं एक बेजान सी कोशिश कर रहा था, कि ऐसा हो जाये। जैसे मैं आज उससे जिद कर रहा था।  मैं समय को नहीं बदल सकता था। पर जो चल रहा है, उसे वैसा ही चलने देना चाह रहा था। मुझे लगता था, जिद कुछ समय के लिए समय के बदले होने का झूठा अहसास देती रहेगी।  मैं उस अहसास को खोना नहीं चाहता था। पर मैं उससे और जिद नहीं कर पाया। भीतर की वह बात बाहर नहीं आ पाई। मैं हार गया था। मैंने उससे बस यही कहा था- आई विल रिमैंमबर यू। और मेरी बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया था। वह वाकमैन सुनने का ढोंग करती रही।

उस रात मैं उसके फ़्लैट तक गया था। रास्ते भर हमने कोई बात नहीं की थी। हमने एक दूसरे को गुड नाइट भी नहीं कहा। मैं उसे सीढ़ियाँ चढ़ते देखता रहा। उसने देखा था, कि मैं देख रहा हूँ। पर वह चुपचाप रही। जब जाने लगा तो लगा एक बार और उससे मिल आएँ। एक अजीब सी इच्छा थी। एक फड़फड़ाती इच्छा। पर मैं रुका रहा। मुझे भ्रम था, कि यह सब झूठ है। हम फिर मिलेंगे। शायद बार-बार मिलें। कितनी बड़ी है, यह दुनिया। बहुत आसान है, दुबारा मिलना और फिर से शुरू करना। दुबारा मिलकर फिर से शुरू करना। या फिर वहीं से शुरू होना जहाँ पर हम समय को बड़ी बेरहमी से काटकर किसी और समय के लटकते टुकड़े को पकड़कर झूल गये थे। कुछ भी तो कठिन नहीं।

पर फिर हम नहीं मिले। कोशिशें नाकाम रहीं। पता चला मैं गलता था। दुनिया बहुत बड़ी है। दुनिया के बड़े-बड़े दांत हैं। दुनिया किसी इंसान को पूरा का पूरा निगल सकती है। दुनिया ने उसे चबाकर निगल लिया था। उसे एक बार देखने की इच्छा आज भी है। क्या वह वैसी ही होगी जैसी कि उन दिनों थी- लंबा पतला चेहरा, धंसी हुई छाती, उभरी हुई कालर बोन, माथे पर फैलते घुंघराले बाल...। क्या वैसी ही स्टबबार्न और अड़े रहने वाली...। क्या... पता नहीं वह कहाँ होगी। पता नहीं कभी वह दिखेगी भी या नहीं। मैं अब नहीं सोचता हूँ कि वह दिखेगी। उसे देखने की इच्छा है, पर उसे देखने का ख्याल नहीं आता। कोई बात इसी तरह पुरानी होती है। इसे ही कहता हूँ उसकी पुरानी बात, एक आकंठ इच्छा जो कहीं इतने गहरे दब गई है, कि उसका अब खयाल ही नहीं। एक चमक खो चुकी पुरानी बात, जिसे बहुत गुनने पर भी कोई खालीपन नहीं उतरता है भीतर, कोई बेचैनी नहीं घेरती...... किस तरह वह पुरानी हो गई है। वह जब याद आती है, तो जैसे एक इतिहास जिससे मैं गुजरा ही नहीं हूँ। कितना कठोर होता है समय, जो छीलकर अलग कर देता है, हर कोमल भाग को, हर बेचारगी और आँसू को...... पता नहीं वह कहाँ होगी। पता नहीं।

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