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05.31.2008
 
बन्द पृष्ठों में

तरुण भटनागर 


बन्द पृष्ठों में,
दबे हैं,
शब्द, शब्दों पर.
एक दूसरे का स्थान छीनते,
बनाने, बिगाड़ने,
नये-पुराने अर्थ...।

दबा है,
एक सूखा फूल
लड़ता कागज़ों से,
बचाने,
बचा-खुचा रंग।

बंद पृष्ठों में,
लिखने की इच्छा पर,
कुछ कोरे कागज़।

दबी है,
फोटोग्राफी की रील,
घूमती अंधेरे में,
कैद करती
मनचाहे दृश्य।

बंद पृष्ठों में,
कुछ लोग सोचकर,
चुप हैं।
दबी है,
बहुत पुरानी हवा,
और नई गंध।

बंद पृष्ठों में,
अण्डरलाइन पंक्तियाँ,
कोने से मुड़े पन्ने,
और याददाश्त का टैग,
दबी हैं,
यादें, कहती-सुनाती बातें,
हर बार बताने,
एक नई कहानी।

बंद पृष्ठों में,
खुलने की इच्छा,
हवा में फरफराने को मन,
दबी है,
नाव की पाल,
बहाने पछुआ हवाओं में।

बंद पृष्ठों में,
क्रम से लगे पृष्ठ,
उनका तय स्थान।

दबा है,
व्यवस्था से कुचला मन,
फड़फड़ाता,
गर्दन कटे मुर्गे की तरह।

बंद पृष्ठों में,
एक किताब।

दबी है,
एक बात,
खुलने से पहले बेमानी सी।


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