अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
09.03.2007
 
विषाद नदी से उठ रही ध्वनि
छायावादी कविताओं का संकलन
समीक्षक: श्री कृष्ण मिश्र

विषाद नदी से उठ रही ध्वनि
रचयिता - डॉ. (श्रीमती) तारा सिंह

मीनाक्षी प्रकाशन, दिल्ली-110092
सम्पर्क:
डॉ. (श्रीमती) तारा सिंह

बी-605, अनमोल प्लाजा
प्लाट नं0 -7 सैक्टर-8
खारधर, नवी मुम्बई-410210


'विषाद नदी से उठ रही ध्वनि',   यह डा० श्रीमती तारा सिंह के सद्य प्रकाशित काव्य -संग्रह का शीर्षक है।  यह उनकी ग्यारहवीं कविता पुस्तक है।  कवयित्री निरन्तर लेखन के पथ पर अग्रसर रहकर साहित्य सृजन में लगी हैं।           

"अपनी बात" शीर्षक में कवयित्री ने कहा है, "जन्म से मृत्यु तक दुख ही दुख है" इसके अलावा मानवकृत आर्थिक, सामाजिक, अपमान, अत्याचार, अन्याय शोषण तो है ही, यही तथ्य हैं। इस नये प्रकाशित काव्य - संकलन 'विषाद नदी से उठ रही ध्वनि' का सार संक्षेप।

पहली कविता से मनुष्य के मन में मिलने की प्रतीक्षा का भाव साकार हुआ है। काल बंधन से बंधा यह जीवन, रंगशाला का नायक बनकर जीना चाहता है। कविता के माध्यम से अपनी प्राणकथा सुनाने की उत्कट अभिलाषा कवयित्री के भावुक मन की तप्त कथा है कवयित्री कह रही है कि उसे ज्ञात ही नहीं कि जाने किस वातायन से कौन सा दुख कब आ गया और मुझे किसी अनजान लोक में ले गया है।  विषाद की नदी सृष्टि का संताप बनकर उफन रही है और गरज -गरजकर कह रही है तुम कैसे इस मृत्यु वाहक नदी को पार करोगे। डा० तारा सिंह ने अलंकारिक भाषा में अपने मन्तव्य को अभिव्यक्ति दी है।  वह कहती है कि मैं तुम्हारे मन के क्षितिज द्वार तक सशरीर ले जाने के लिए सोमरस का पान कराऊँगी और स्वर्ग तक ले जाऊँगी।

राष्ट्रपिता को सम्बोधित कविता में शांति के दूत को उसके त्यागपूर्ण जीवन की यशगाथा है।  राम - राज्य के स्वप्न को साकार करने के लिए उसके द्वारा किये गये विराट बलिदान का चित्र - चित्रण है। कवयित्री के अनुसार बापू के कृतित्व पर जन -गण की दृष्टि निरन्तर लगी रहती है। वह उसे धरती पर पुनः लौट आने का आग्रह कर रही है। रजनी की नीरवता को शब्दमय होने के कारणों पर विचार करती हुई कवयित्री ने कहा है कि जीवन संग्राम में प्रत्येक व्यक्ति को विजय प्राप्त नहीं होती।  पराजय के डर से जीवन का प्रत्येक कोना व्याकुल लिए होता है। इसलिए पूर्व जन्म की कथाओं  के आधार पर अतीत का स्वरूप स्पष्ट होता है।       

 गंगा कविता में मनोहारिनी अमृतमयी, निर्मल, स्नेहमयी धारा की महिमा का स्तवन है। अमरता प्रदान करने वाली इस नदी के अजस्र धारा को विनत भावांजलि है। वहीं भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप में देवकीनंदन का स्मरण है। इस कविता में कवयित्री आध्यात्म के चरम क्षणों को स्वयं जी रही है। प्राणों में व्याप्त विरक्ति के भावों को कवयित्री ने अत्यन्त लक्षणायुक्त शक्तियों से सजाया है। जीवन की गति की सत्यता यही है। यहाँ कवयित्री कह रही है कि जब तक ये दुर्बल धारणायें मूर्च्छित होकर मेरी चेतना से लिपटी रहेंगी तब तक मैं अपनी प्राणमयी अभिव्यक्ति कैसे कर सकती हूँ। प्रतिपल प्रकृति अपने परिधान बदलने में व्यस्त है।  इस कविता में लेखिका ने कह है कि सभी जानते हैं कि प्रकृति का आकाश की नीलिमा से सीधा सम्बन्ध है। अब मानवीय जीवन की प्रकृति पूर्व की भांति अपरिवर्तनीय नहीं रही। उसके सूक्ष्म भावों को नतमस्तक होकर स्वीकार करने की अभिव्यक्ति इस कविता में रसमयी भाषा में हुई है।

                

   "यह कौन सी जगह है साथी" इस शीर्षक से कविता में अनेक प्रश्न और उत्तर हैं। जीवन का यह कौन सा मोड़ है जहाँ हर ओर अग्नि के स्फुलिंग हैं। पाँव घायल हैं, शून्य का त्योहार है, हृदय के सागर में सुलगती हुई आग है, आदि प्रश्नों के सपाट उत्तर हैं।

जहाँ सम्पूर्ण संसार की माया विनाश शील नृत्य में मग्न है, जहाँ काया अपनी पलपल सूरत बदल रही है। हर तरह से यह स्थान तुम्हारे अनुकूल है।  इन भावों को व्यक्त करती हुई कविता है " लहरियाँ लोट रही हैं धरा पर सर्पणियों सी "।  डा० श्रीमती तारा सिंह ने अपनी कविता " सुख के भस्म समूहों में चिनगारियाँ जिंदी हैं" में कहा है कि प्रियवर तुम अंधकार में क्या ढूँढ रहे हो। जब कि धरती और आकाश पुष्पाच्छादित नवल किरणों भरी ज्योति को दृष्टिगत रखकर अपनी रूपहली किरणों से अमर स्नान कराने को तत्पर है। कवयित्री अतीत के गौरव का गीत गुन- गुनाने वाले अतीत को उन्मीलित नयनों से देख रही है          

मोहन दास कर्मचन्द गाँधी के अवतरण से सम्बन्धी कविता में कवयित्री ने कहा है कि जब देश दावाग्नि से जल रहा था तो तुमने पुतली बाई माँ के घर जन्म लिया और मानवता के दुख दूर करने के लिए,  अमीर गरीब के बीच की खाई को दूर किया। तुम स्वाधीनता के अमर सैनानी बनकर विश्व के मार्गदर्शक बन गये।       

इसी क्रम में राम का सन्दर्भ दे कर लेखिका ने लक्ष्मण के प्रिय अग्रज के रूप में सम्बोधित किया गया है। सूर्य वंशी उस प्रतापी को कवयित्री ने संयमी,  तपस्वी और अन्तर्यामी कहकर पुकारा है। कविता "तुम क्यों हो गई इतनी बेपरवाह' में अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तलाशती अभिव्यक्ति है तो बड़ा आतंक मचा रखा था पतझड़ ने" में मंदिर के निमंत्रण के मधुर आमंत्रण का दर्शन है। कवयित्री कहती है कि सुंदरता के सागर से मैं तुम्हारे लिए रूपमय रस का चषक लेकर उपस्थित रह सकती हूँ।  कवयित्री का मन तो धरती के मौन स्थल पर पुष्पित उद्यान में होने वाले मंगलमय कोलाहल का आनंद ही कुछ अलग तरह का है।             

दीर्घ निश्वास की स्थितियाँ कैसे बनीं, इस प्रश्न का उतार ढूँढते हुए अपने प्रिय को विस्मृति के धरातल में स्मृतियों के रूप में आज भी है। कवयित्री पूछती है कि मरने के बाद मृतात्मा कहाँ जाती है। उसके मतानुसार जैसे जीवन के बुरे दिन मनुष्य का साथ छोड़ देते हैं तो वह अपनी इन्हीं आँखों से स्वर्णिम दिनों के दर्शन कर सकता है। ठीक उसी प्रकार देह अपना लय त्याग कर आनंदमय परमतत्व में विलीन हो जाता है। वह धधकती मरुभूमि,  भटकती सरिता की लहरों, तथा जहाँ चातक आकाश से बरसे जल कणों की आशा में पुकारता हो, वहाँ एक भव्य भवन बनबाने का आग्रह कर रही है।  ताकि अपने जीवन की संध्या में उसमें रात्री व्यतीत कर सके।

कवयित्री का वह दर्पण,  जिसके साथ वह अपना रूप संवारा करती थी के टूट जाने पर व्यथित है। वह सोच रही है कि अब वह मुखड़ा संवारने के  लिए क्या करेगी। कल्पना करती है कि चाँद के दर्पण में यह कार्य संभव हो सकता है। प्रकृति के इस स्वाभाविक वर्णन में भाषा का स्वरूप सुंदर हो गया है। सिसकियों और चमत्कारों से गुंजायन मान आकाश और वसुन्धरा को राम -राज् कैसे प्राप्त होगा, यह प्रश्न है राम और उसी जैसे मर्यादा रक्षक अवतारी से। लेखिका की आकांक्षा है कि जल, थल,  पर्वत, चाँद,  सितारे,  फूल और हवा सब मिलकर स्वर्ग की रचना इस धरती पर ही कर दें। यही नहीं, वह पूछ रही है कि आखिर स्नेहशील माया, ममता और करुणा का विराट धन मानव के पास है तो किस पीड़ा के गाहन भार से इतनी चिन्ताजनक और आतंकपूर्ण स्थिति बन रही है। कवयित्री डा० तारा सिंह कविता के माध्यम से अमृत के अन्वेषण में दिन -रात लगी है। उसका मानना है कि कवि में वह शक्ति है कि उसके कहने से सूरज भी अमृतमय हो जायेगा। जो प्रकृति के स्वभाव के अनुरूप स्वयं को ढालने पर विवश नहीं है। उसके यौवन तरी की डाल हरी हो गई है। आषाढ की प्रथम फुहार से ही उसकी जीवन लतिका लहरा उठी है। कवयित्री अपने लाल की खुशी के लिए उत्सुक है। उसकी उत्सुकता उस श्याम प्रदेश को खोजने की है।  जिसमें न दुख हो,  न पराजय हो और न ही अतीत का वेदनामय स्वर हो। लेखिका के नयन अश्रु की अविरल धारा से थक चुके हैं | उसे अब रात को पहरेदार की तरह जागकर व्यतीत करनी पड़ रही है। वह धरती का स्वर्ग बनाने की कामना कर रही है।    विषमता से मुक्ति प्राप्तकर संसार स्वतः स्वर्ग की तरह बन जायेगा।  इसके अतिरिक्त वह अनचाहे प्रेमरोग के पाश में बंध चुकी है। उसकी दृष्टि में साधु, फकीर, राजा या रंक सभी इस प्रेम रोग से ग्रसित हैं।  इससे बच पाना कठिन  है।   

कवयित्री अनुभव कर रही है कि नयनों ही नयनों में परस्पर होने वाली बातचीत हृदय की भावनाओं को व्यंजित करती है।  अब तो वह सोते - जागते हरि का नाम लेकर अपने आने वाले स्वर्णिम भविष्य की तलाश में जुटी है। प्रकृति के परिवर्तन के इस क्रम को भी कवयित्री ने काव्य में अभिव्यक्त किया है।         

इस प्रकार डा० श्रीमती तारा सिंह ने अपनी  काव्य -प्रतिभा से जो रचनायें इस संग्रह में प्रस्तुत की हैं उनमें छायावाद की स्पष्ट झलक मिलती है। अन्य सभी संकलनों की भांति इसका भी साहित्य में स्वागत होगा।   


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें