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06.18.2007
 
शाश्वत सत्य को रेखांकित करता कविता संग्रह
समीक्षक: श्री कृष्ण मिश्र

"अब तो ठंडी हो चली जीवन की राख"
रचयिता - डॉ. (श्रीमती) तारा सिंह

मीनाक्षी प्रकाशन, दिल्ली-110092
सम्पर्क:
डॉ. (श्रीमती) तारा सिंह

बी-605, अनमोल प्लाजा
प्लाट नं0 -7 सैक्टर-8
खारधर, नवी मुम्बई-410210


"अब तो ठंडी हो चली जीवन की राख" यह सद्यः प्रकाशित कविता संग्रह सम्मुख है। कवयित्री "श्रीमती तारा सिंह" मीनाक्षी प्रकाशन, शहादरा से प्रकाशित इस संग्रह में सामाजिक सरोकारों की कवितायें हैं। सभी कवितायें पठनीय और मनन योग्य तो हैं ही, उनमें प्रणय निवेदन, सौन्दर्यानुभूति, समर्पण की उत्सुकता और मानवीय संवेदनाओं की सार्थक अभिव्यक्ति मुखर हुई है। उसके लिये कवयित्री की जीवन गत विवेचनाओं ने सामाजिकता की पारिभाषिक अनुभूतियों का योगदान मुख्य रूप से उपस्थित हुआ है।

मृदुमलयानिल सी शान्त और शीतल नारी के अनेकरूपों का वर्णन "नारी तुम स्व्यं प्रकृति हो" में प्रगट हुआ है। नारी का मातृरूप, भगिनी रूप और भार्या का रूप अपनी वेदनामय अभिव्यक्ति लेकर साकार हुआ है। संग्रह की पहली कविता से ही प्राचीन काल की नारी के स्वरूपों की विवेचना कवयित्री की भावुकतामय शैली का आभास देती है। यह एक कथनीय यथार्थ है। कविता संग्रह की निरन्तरता, उसकी सभी कविताओं में विद्यमान है। चाहे वह "यादों की टीस" हो या "पंख बिना अधूरा मनुज" शीर्षक की कवितायें हों। "वृद्ध पद्मासन हृदय अरविन्द मुरझा जाता है" कविता भी लेखनी की सशक्त शक्ति का प्रतीक है। सरू जीवन मरीचिका का सुख एक प्यास, "हमारे प्रिय बापू" जैसी सुदीर्घ कविताओं में बौद्धिक जिज्ञासा का सुन्दर समन्वय है। प्रणय निवेदन के रूप में "आओ प्रिये, आज बैठो मेरे पास" एक जीवन की सत्यता का प्रगटीकरण है तो "किसान के घर अन्धेरा क्यों" जगती के प्रतिपालक से सीधे सीधे पूछे गयए मानव मन के प्रश्न हैं, जिनके उत्तर तलाशने का प्रयास कलम के माध्य्म से हो रहा है। यही नहीं नारी की व्यथाकथा को कहती कविता "तुम्हारा स्वर्ण विहान कहाँ है आली" में मुखरित हो कर स्वयं की वेदना व्यक्त कर रही है। "प्रणीत" के माध्यम से धन्यवाद देता स्वर है तो "लोग मुझे कवि नहीं मानते" में कवयित्री का आत्म निवेदन अत्यन्त विनम्र भाव से व्यक्त हुआ है।

"बेटियाँ पराया धन होती हैं" इस कटुसत्य की मीमांसा काव्य संग्रह की "बेटियाँ होती पराया धन" के माध्यम से अभिव्यक्त हुई है। कविता संग्रह में अनेक सामाजिक सरोकारों की व्याख्या के साथ साथ इस सृष्टि की संरचना की भी विवेचना की गई है। त्योहरों की अनिवार्यता और अपरिहार्यता का भी विशेष चित्रण है। सौन्दर्य की दीप्ति का आख्यान है तो देवताओं के सिर पर विजय ध्वज फहराने की उत्कट लालसा भी है। परम पिता की कृपाओं का उल्लेख अपने स्वप्नों में भी विद्यमान है। इस विषय को संग्रह की विभिन्न कविताओं में स्पष्ट किया गया है। कवयित्री ने अपनी प्रत्येक पंक्ति को सूझ बूझ के साथ लिखने का प्रयास किया है।

उदयाचल की ऊषा के दर्शनों की अनूठी भावाभिव्यक्ति है जिस कविता की पंक्तियों में उसमें विशेष उल्लेखनीय बिम्ब विधान है। ’बुद्धि से लहू बलवान निकला’ कविता मनोव्यथा का भावुक चित्रण है, तो जीवन की विरक्ति का बोझ ढोते ढोते, थकी हुई ज़िन्दगी का कटुसत्य भी है। स्वप्नपरी को सम्बोधित पंक्तियों में जीवन की विवशता का उल्लेख है तो प्राणों में प्राण बन कर निवास करने का आमन्त्रण भी है। यही नही जिसे प्रत्येक तकदीर का मारा कहकर व्यक्त करता है, उसके प्रति एक आभारमय अभिव्यक्ति भी है।
"अब तो ठन्डी हो चली जीवन की राख" यह कविता जीवन की सत्यता पर आधारित एक समर्थ कवित है। इसमें अनेक प्रश्नों के उत्तर ढूँढने के प्रयासों का उल्लेख है। हृदय का वह भूभाग यथावत विद्यमान है जो अनेकों खण्डित चिन्ह लिये, जर्जर दैन्य शरीर के रूप में आज भी खड़ा ह। नील निशा के आँचल में तारों के दीप जलाकर, अलौकिक भावों के आधार पर मन्द मन्द मुस्काती चाँदनी एक कहानी कह रही है। इसके अतिरिक्त संग्रह में भूतकाल की स्मृतियों को कुरेदकर कुछ विशेष अभिव्यक्ति भी मुखरित हुई है। घर के वातावरण का बेबाक वर्णन भी संग्रह की अनेक कविताओं में अभिव्यक्त हुआ है।

ऊषा की अरुणिमा का सौन्दर्य बोध कवयित्री की लेखनी से प्रस्फुटित हुआ है। प्राणों के बिना जीवन में हर्ष कहाँ से और कैसे आयेगा, इन सवालों के जवाब देती पंक्तियाँ भी संकलन की सार्थकता व्यक्त करती है। कवयित्री ने जीवन, मरण, सुखदुख के सम्बन्धों को स्वप्न में प्राप्त हुए आलिंगन के रूप में महसूस किया है। इसी स्पर्श सुख का वर्णन काव्य का कथ्य बन गया है।
संग्रह के समापन को कवयित्री ने जो मार्मिक स्वरूप दिया है, उसमें एक प्रतीक्षा की पूर्ति का आभास विद्यमान है। प्रियतम के आगमन की रोमाँचित करने वाली स्वीकृति का सुखद आनन्द भी है। अब कोई भी सिन्धु मानव वंश के आँसुओं से खारा नहीं होगा; क्योंकि

अब गूँजने लगा है उसका निर्घोष लोक गर्जन में
विद्युत बन चमकने लगा है जन जन के मन में

संकलन में राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद के डॉ सन्त कुमार टण्डन ’रसिक’ का आलेख संकलन की महत्ता को द्विगुणित कर रहा है। डॉ. गोकलेश्वर कुमार द्विवेदी की समीक्षा भी समीचीन है। अनेक पुरस्कारों, सम्मानों और अलंकारों से विभूषित श्रीमती तारा सिंह एक विशिष्ट प्रतिभा सम्पन्न लेखिका हैं। ऐसा कहने के आधार पुष्ट हैं। कवयित्री के सफल काव्यजीवन के प्रति स्नेहमय आशीष।


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