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07.08.2007
 
लोकमंगल की भावना की अभिव्यक्ति है
डा० तारा सिंह का नवीन कविता संग्रह
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"तम की धार पर डोलती जगती की नौका"
समीक्षक : कृष्ण मित्र

"तम की धार पर डोलती जगती की नौका"
रचयिता -
डा० (श्रीमती) तारा सिंह
मीनाक्षी प्रकाशन, दिल्ली-110092
सम्पर्क:
डॉ. (श्रीमती) तारा सिंह

बी-605, अनमोल प्लाजा
प्लाट नं0 -7 सैक्टर-8
खारधर, नवी मुम्बई-410210

'तम की धार पर डोलती जगती की नौका', यह नवीन कविता -संग्रह, कवयित्री (श्रीमती) डा० तारा सिंह की सद्य प्रकाशित कृति है। इस सग्रह से पूर्व कवयित्री की दश कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। श्रीमती डा० तारा सिंह की कविताओं में जहाँ आध्यात्मिकता के दर्शन होते हैं, तो वहीं उनमें सामाजिक विद्रूपताओं के विरुद्ध आक्रोश के स्वर भी प्रतिध्वनित होते हैं। कवयित्री ने "अपनी बात" में सपाट भाषा में कहा है, 'इसमें प्रेम से उत्पन्न निराशा, बेवफाई की वेदना, वियोग की तड़प आदि के अलावा नियति की निर्मम मार, लोकमंगल की भावना आदि पर मैंने यथा संभव विस्तार से अपने विचार को आप तक पहुँचाने की कोशिश की है।'

३० कविताओं से सम्पन्न यह संग्रह, अपनी भावुक भाषा में अनेक प्रश्नों के उत्तर दे रहा है। वह प्राण विहग जो आँखों की खिडकी से तारों के दीप जलाकर, नील निशा के आँचल में अपने शशिमुख को छिपाये हुए मृदु-  हासिनी चाँदनी की कथा सुनने में मग्न है,वहीं उस डूबती हुई चाँदनी के परिवेश में प्रतिष्ठित स्वर्ण भूषित परिधानों का स्मरण कर कालिमा के करों से क्षितिज के मस्तक पर अंकित कुमकुम की बेंदी की विकलता सुख के अश्रुनीर की भाँति गुंजित भावों की भीड़ का चित्रण है। अपने उदर के भीतर दश मास तक सुरक्षीत रखे हुए अंश की अभिव्यक्ति में केवल संकेतों को माध्यम बनाकर व्यक्त भाव भूमि में पृथ्वी के भीतर और आकाश के परे क्या? ऐसे प्रश्नों का स्पृहात्मक उत्तर है। क्योंकि यह धुआँ पहले से नया नहीं है।

क्रियाविहीन चिंतन के अनुचर को क्या पता कि गंगा किस हिमशिखर से उतरकर कहाँ जाकर विलीन हो जाती है। कवयित्री ने दानवी बुद्धि वाले लोगों को ग्यानी नहीं माना। उसने स्पष्ट कहा कि अगर सचमुच जिंदग़ी के विषय में जानना चाहते हो तो उन कारीगरों से जाकर पूछो जो मृत्तिका में भी प्राण प्रतिष्ठा करने में व्यस्त है। "तम की धार पर डोलती जगती की नौका" को संभालने के लिए कवयित्री स्वार्थ और प्रभुता क़ी बाढ से मन को स्थिर बनाने की कामना करती है। वह अपने आँचल की सेज पर सोने वाले को लोरी सुनाने को आतुर है। क्योंकि उसकी दृष्टि में जहाँ दोनों मिलकर बैठेंगे, वहीं उसका संसार होगा।

डा० तारा सिंह ने जीवन की वास्तविक सत्यता को ग्यारह जुलाई की साँझ को,आग के शोलों की उष्णता को अनुभव कर माना था। उसने घायलों की चीखों का क्रंदन जब सुना तो देश मौन हुआ दिखाई दिया, उसने देखा कि हिमालय भी झुक गया है। मानवता के ऊपर होने वाले इस आक्रमण से आग के गोलों ने कैसे जलाया था, मुम्बई के रहने वालों को। संग्रह की यह उल्लेखनीय भाव कविता है जिसमें नृशंसता और बर्बरता का तांडव सुनकर स्वयं ईश्वर भी खामोश होने को बाध्य है। किन्तु अगले ही क्षण मानव मन के आभूषण के रूप में स्नेह का स्मरण कर सम्पूर्ण सृष्टि को परमात्मा की सोच के रूप में देखने का दायित्व निर्वाह कर रही है। वह कहती है कि साधना की वीणा से निकलने वाली ध्वनियाँ मानव के अमूल्य आभूषणों के जीवन का सार है। डा० तारा सिंह का व्यंगात्मक विश्लेषण में पयोधि के रूप में महोदधि की लहरों का आधार ढूँढने में व्यस्त है।कवयित्री की दृष्टि में प्रेम ही जीवन की उदगम- स्थली है।

संग्रह में मातृत्व की परिभाषा के लिए 'माँ और संतान का रिश्ता' कविता में निमग्न होने की आवश्यकता है। गर्भ में भ्रूण को धारण करना ही मातृत्व का लक्षण नहीं,अपितु माँ और संतान का रिश्ता आत्मा का रिश्ता है। जब रातों में सारा संसार सुख की निद्रा में सो रहा होता है, तब माँ जागकर संतान की तृप्ति और सुख के लिए अपना स्नेह लुटाने में व्यस्त होती है। कवयित्री का कहना है कि विश्वास के बिना सौन्दर्य के संसार की कल्पना की ही नहीं जा सकती। क्योंकि जीवन की इच्छाओं से मर्यादित सीमा ही विश्वास का दृढ आधार है। यही नहीं, अंतरिक्ष में ज्योतित ग्रह, नक्षत्र मानव के भाग्याकाश में आच्छादित रहते हैं। जहाँ नियति नटी की नग्न छाया प्राणी मात्र की किस्मत बनकर शून्य में भी नृत्य कर रही है।

डा० तारा सिंह ने संग्रह में अनेक परिभाषाओं को रूप दिया है। ‘आदम का बेटा ही आदम कहलायेगा’, इस कविता में आदम की परिभाषा को सरल रूप से व्यक्त किया गया है यही वजह है कि मनुज मन की आत्मा के संग संबंधों की निष्कपट भावाभिव्यक्ति मनु और श्रद्धा के माध्यम से हृदय के कक्ष तक अवतरित होते हुए देखना कवयित्री का नवीन स्वप्न है  | करोड़ों शिव और हजारों विष्णु पूजन की पावनता से तृप्त होते हुए भी दृष्टिगोचर होते हैं।

कवयित्री ने जीवन की सत्यता को कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है कि जिसने सेहरा सजाया है वही चिता भी रचायेगा। कड़वा सच साकार हो जाता है। जनम और मृत्यु, जीवन के दो पहलू हैं इसलिए मौत से भी भयभीत न हो,उसे सहर्ष, सादर स्वीकार करो। क्योंकि आत्मा तो अमरता के आवरण में निश्छल, निष्कपट रूप में विद्यमान रहती है। डा० तारा सिंह ने उस सांसारिक मदिरालय को खोज लिया है जिसे पाने के लिए वह सतत संघर्षशील रही है। इस मदिरालय में जीवन का सोमरस और भाग्य के सूर्योदय का अरुण मदमत्त प्रकाश उसने समीप से देखा है। यहीं पर वासना की तृप्ति के लिए उसने कवि का दिल तोड़ने का अपराध किया था।

अतिथि सत्कार हमारी संस्कृति का आधार रहा है। इसलिए आने वाले दुख को अतिथि मानकर उसको आदर दो, वह तुम्हारी दीनता को दूर करेगा।  यह संसार तो मकड़ी की जाल की तरह ताना - बाना बना मानवीय परिकल्पनाओं को अपने मे समेटना चाहता है। इसलिए कवयित्री कहती है कि घने कुहासे के भीतर से कंकाल के समान खड़ी ठूँठ बने वृक्ष की छाया को मकड़ी के जाल की भाँति समझकर उससे मुक्त होने का प्रयास करो। वह कहती है कि यह संसार तो विस्मय से युक्त है। लघु -लघु प्राणियों के अश्रुजल से बनाया विशाल समुद्र अपनी उत्ताल तरंगों से मानवीय मन की नौका को लील जाना चाहता है।

कविता संग्रह में कवयित्री डा० तारा सिंह के अनेक रूपों के दर्शन होते हैं। एक रूप साकीवाला के रूप में बनकर उभड़ा है। जब वह कहती है कि मेरे उस मदिरालय में आपका स्वागत है। मैं तुम्हारे लिए प्याले में मदिरा ढालने के लिए स्वयं साकी बनने को तैयार हूँ। यद्यपि आगे चलकर वही मदिरा विष के रूप में छलकती दिखाई देती है।  पौस मास की शीतल पूर्णिमा में छलकी उस मदिरा को विष समझकर भी वह जब तक तन में प्राण है, तब तक साकी बनने को उद्यत है। कवयित्री ने परमात्मा से पूछा है किस पंथ से होकर तुम्हारे पास पहुँचना आसान है क्योंकि उसका मानना है कि जब जागने का समय था तब वह सुप्तावस्था में ही रही और वारिश- आँधी आकर मेरे अस्तित्व को उड़ा ले गई। उसे उस पार जाना था, मगर वह इस पार ही किनारे पर खड़ी रह गई।

डा० तारा सिंह ने वर्तमान समय में कश्मीर का जो चित्रण, 'आज का कश्मीर ' में किया है, उसके लिए उन्हें बधाई देने का मन करता है। दुनिया का स्वर्ग कहलाने वाला कश्मीर आज मनुष्यत्व से वंचित है।  वहाँ आतंक का भय पसरा है और अनैतिक अत्याचारों से चारों ओर सन्नाटा है। घाटी की निरीह आत्मा   चित्कार कर रही है। जहाँ मानवता का अमानुष व्यवहार का दौड़ चल रहा है।

राजनीति और अर्थनीति के स्वार्थमय कंदर्प में,'संस्कृति और सम्प्रदाय' में स्पष्ट हुआ है। कवयित्री के शब्दों में आज की संस्कृति अमीरों के पेट भरने का साधन बन गई है। कवयित्री प्रश्न करती है कि प्रिये ! तुमसे किसने कहा कि जो पुरुष रमणी को आलिंगन में बाँध चुका है, वह देश काल के आगे बौना है ; जब कि उस मनुष्य का लक्ष्य ईश्वर तक पहुँचने का है। वह आगे स्वीकार करती है कि अतीत स्वर्णिम होता है। अतीत के गीतों को सुनकर मन में फिर से नवीन वर्तमान के दर्शनों की उत्कट अभिलाषा जागने लगी है। ऐसे में यदि मनुष्य यह स्वीकार कर ले कि स्वर्ग धरती से श्रेष्ठ होता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

डा० तारा सिंह ने काल के अश्वरथ की गति पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह धरा घृणा और द्वेष से कभी खाली नहीं होगी। वह तो एक आकाश की छत के नीचे सुख और शांति के अन्वेषण में निरंतर लगा हुआ है। यही कारण है कि संग्रह की अंतिम कविता में अपनी कविताओं के विषयों में, लोगों की प्रतिक्रिया को व्यक्त करती हुई कहती है कि इन कृतियों में मेरा जीवन इतिहास नहीं अपितु इनमें मेरे प्राणों की कथाएं हैं। वर्षों से कवयित्री के मानस पटल पर जमी बर्फ की चट्टान जिसमें पीड़ा और लाचारी जमी पड़ी थी, शब्द बनकर पिघल रहे हैं और यही मेरी कविताओं की भूमिका है। इस कविता संग्रह की प्रत्येक कविता,'तम की धार पर डोलती जगती की नौका ' के समान,निरंतर प्रवाहमान है। यही इसका सार्थक नामकरण है।


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