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12.25.2007
पुस्तक समी़क्षा
अलंकारिक संवेदनाओं का संकलन
समी़क्षक-श्री कृष्ण मित्र


 

पुस्तक का नाम - नदिया स्नेह बूँद सिकता बनती

कवयित्री - डा० श्रीमती तारा सिंह

समी़क्षक - श्री कृष्ण मित्र

 

 नदिया स्नेह बूँद सिकता बनतीयह नाम है, डा० तारा सिंह के नये कविता संग्रह का। इस कविता संग्रह को कवयित्री ने अपने माता-पिता की स्मृति में उन्हीं के चरणों में समर्पित कर उनके प्रति अपनी काव्यांजलि अर्पित की है।

कवयित्री अपने अन्त:करण से ही प्रश्न करती हुई मानो पूछ रही है कि किसकी स्मृतियाँ शूल बनकर हृदय को साल रही हैं। वह कहती है कि जहाँ अनन्त का मुक्त मन अपने में मग्न है और कोमल कलिका की अपलक पंखुड़ियों में गंध सौरभ के रूप में बंद है, ऐसे में तुम किसे ढूँढ़ने में व्यस्त हो। भविष्य की राख को मुट्ठी में भरकर संसार की निस्तब्धता को पूर्णता प्रदान करने के लिए चित्त के चंचल वेग को शांत करने का एहसास लिए कविता की पंक्तियाँ तलातल में उतरकर अवगाहन करने का संदेश दे रही हैं।

   कवयित्री डा० तारा सिंह मनुजता की रक्षा में सन्नद्ध सभ्यता के रुधिर से निकली ज्ञान ज्योति के विषय में दिन-रात सोच रही है। क्योंकि वह जानती है कि पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक ने तो मनुष्य को पहले ही टूटने पर विवश कर दिया है। वह तो क्षितिज के वृक्ष को चीरकर उसे जानने को उत्सुक है। वह पूछ रही है कि मानव रंगों के मोहपाश को तोड़ने के लिए ज्वालामुखी को क्यों हवा दे रहा है? मनुज संभवत: यह नहीं जानता कि क्षितिज के समीप जो सरोवर है, वह कंचन का भ्रम देकर हमारी आँखों पर धुएँ का पर्दा डालना चाहता है।

कवयित्री ने स्पष्ट स्वीकार किया है कि जन्म अगर उत्सव है तो मृत्यु भी महापर्व से कम नहीं है। सृजन के साथ नाश और काया के साथ छाया की अनिवार्यता निर्माण और विध्वंस का शक्ति प्रदर्शन भर है। तीनों लोक इस सत्य के सम्मुख नत मस्तक होकर मौन हो जाते हैं। यह कुरूप होकर भी सृष्टि के कण-कण में रम चुके हैं। डा० तारा सिंह की कविता में इन सच्चाईयों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। वह लिखती है कि जैसे गंगा का उद्‌गम स्थल हिमालय है, उसी प्रकार जन्म का भी उद्‌गम स्थल श्मशान स्वीकार करना चाहिए।

 माँ की ममताका अनुभव जिस कविता में अभिव्यक्त हुआ है, उसमें एक ऐसी सच्चाई का स्फुरण व्यक्त हुआ है जिसे अन्त:करण की प्रसुप्त पीड़ा का बयान समझना चाहिए। यह सच है कि कवयित्री ने अभी-अभी अपने पिता और माता, दोनों से विलग होने का कष्ट पाया है तो स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति को वह साकार करने को आतुर है।

माँ को पृथ्वी का और पिता को मुक्त आकाश की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। अत: माँ से बिछुड़ने की पीड़ा वही बयान कर सकता है जिसने वह वियोग सहा है। यही कारण है कि वह अपनी माँ के पास जाने को आतुर है। अनेक नई उपमाओं से युक्त माँ की ममता, कविता संग्रह की उल्लेखनीय कविता बन गई है। इस तरह की और कविताएँ, संकलन में होनी चाहिए थी।

विकल वक्ष संस्कृति को जीर्ण कर तन की संज्ञा से सम्बोधित कर प्रति प्रश्न में कवयित्री पूछ रही है कि यह नारी कौन है। स्वत: ही उत्तर में वह चाहती है, मैं जीर्ण तन विकल वक्ष अनन्त की वह छाया हूँ जिसे भारत की संस्कृति के नाम से सम्बोधित किया जाता है। रूप के रसमय निमंत्रण का आह्वान पाकर कविता में मधुर अधरों के रस में अतृप्त आलोक मानो भिक्षुक बनकर हृदय प्राण से पूछ रहा है। कवयित्री ने उसे स्पष्ट

भाषा में कहा है कि फूलों और उसके सौरभ पर इतना विश्वास मत करो कि कोलाहल में हम स्वयं खो जायें। यही नहीं अपितु किसान के चिर पवित्र स्वरूप का भी चित्रण उसकी लेखनी ने सुंदर रूप से किया है। भूख-प्यास से पीड़ित और म्लान आकृति में इस देश का सच्चा प्रतिनिधि यह किसान ही हो सकता है जो भारत के प्रत्येक व्यक्ति को भर पेट भोजन देता है, वह भूखा रहकर अपनी विवशता का ढोल नहीं पीटता। जिनकी आँखों पर हरा चश्मा चढ़ा है उन्हें तो केवल हरिाली ही दिखाई देती है। कवयित्री ने उसी किसान को सम्बोधित कर कहा है कि कर्म के पथ पर अपने जीवन के रथ को दौड़ाकर भ्रमजाल को तोड़ने का साहस बटोरो।

हिमालय जो भारत भूमि को अपनी पावन गंगा से अभिसिंचित करता है। जो विश्व को अपना अमृत पिलाता है, जिसका शस्य श्यामल शोभन आँचल भारत की रक्षा को सदैव सन्नद्ध रहता है, वह हमारा पर्वतराज भारत की छत है। वह स्वर्ग का मुख्य द्वार है और सारे ब्रह्मांड को अपनी गोद में समाये रहता है। कवयित्री ने इस कविता में भारत की भौगोलिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को अत्यन्त सरलता से उद्धृत करने का प्रयास किया है।

तीखे हलाहल की कथा कहते हुए कवयित्री ने स्वीकार किया कि हम दोनों ने मिलकर जो अंतहीन कहानी लिखी है उसमें अनन्त की अनेक प्रतिध्वनियाँ बार-बार सुनी गई हैं। हमारा प्यार इन भटकी हवाओं में और चंचल छायाओं में आज भी विद्यमान है। उस तीखे विष का स्वाद आज भी होठों पर अपना प्रभाव छोड़ रहा है। कवयित्री के जीवन से ऊब चुके प्राणों का वर्णन भी अपनी काव्यमयी भाषा में कुछ इस प्रकार किया है,’जीने के दिवस बहुत बीते, मिलन सृष्टि का कण भर भी प्यार मुझे मेरे रंक जीवन में यद्यपि कोई सार नहीं, परन्तु निष्ठुर देवता का उपकार आज भी उपहार बनकर जीवन का करुण गान बन गया है।

मुकुल परिरंभ में बंद भँवरे के समान मानो अब मद पिये बिना रह ही नहीं सकता। सूर्यास्त के समय संध्या के रक्तिम होठों की मदिरा का पान अब मधुर लगता है। प्रात: काल की गुलाबी किरणों में आकाश की नीलिमा का प्रभुत्व  संभवत: बादलों के आडंबर में वासना की मधुर छाया बन उतर जाना चाहता है। भाषा की दृष्टि से इस कविता में नयापन दृष्टिगोचर होता है।

कवयित्री के मन में उठ रहे प्रश्नों में एक प्रश्न यह भी है कि इस सम्पूर्ण  जगती के देवताओं में किसे महादेव के नाम से सम्बोधित किया जाये। कौन है वह शिल्पकार जिसने सारे संसार को एक रूप प्रदान किया है। जिसका आकार इस समूचे विश्व को अपनी भुजाओं में समेटने में सक्षम है। वह पूछती है कि मेरे इन प्रश्नॊं का उत्तर कौन देगा। कौन समझायेगा कि यह सम्पूर्ण सृष्टि निरन्तर क्षितिज की ओर अग्रसर हो रही है।

प्रत्येक कविता में कवयित्री अपनी उत्सुकता व्यक्त करती है। वह पूछ रही है कि प्रिय वह अमृत का प्रवाह कौन सा है जिसे तुम चाहकर भी मोड़ नहीं सकते। वह प्रश्न कर रही है कि मेरे जीवन में तुम कहाँ से उतरकर आये हो। कौन हो तुम जो जो दूर-दूर तक फैले घने अंधकार को भेदकर देखने को आतुर हो। क्या तुम्हें नहीं मालूम कि नदिया एक दिन बून्दों को स्नेह से सिकता का रूप प्रदान करती है? क्या तुम उस उक्ति को असत्य सिद्ध करना चाहते हो। अपनी इस इच्छा को गौण ही रहने दो।

गंगा से प्रश्न करती हुई कवयित्री कह रही है, ’संसार के जहर को निरन्तर पीकर अपनी अमृतमयी धार को प्रवाहित कर, हे गंगे ! तुम्हारे मनोभावों में यह वेदनामय तरंगें क्यों उभर रही हैं।

हे देवी ! मान्व के दिशाहीन रुदन को मत अनुसरण करो। अपने स्वर्ग जाने की इच्छा त्याग मानव कल्याण का मार्ग स्वीकार करो।

डा० तारा सिंह की माताश्री का आकस्मिक निधन और उसके विलग होने की असह्य व्यथा, केवल पाँच शब्दों में साफ़-साफ़ झलक रही है। वे शब्द हैं ---- रोओ मत, रोना यहाँ पाप है। कवयित्री ने माँ के मन की व्यथा को कुछ यूँ व्यक्त किया ---  आते-जाते रहने से स्वर्ग की मर्यादा बनी रहती है। वह कहती है, मरण संताप नहीं। उससे हँसते हुए मिलो। यही नियति का नियम है।

प्रतीक्षा का सिलसिला निरन्तर चल रहा है परन्तु प्रिय के आगमन की घड़ी नहीं आ रही। यह व्यथा है पीड़ित मन कवयित्री की नायिका की। जो प्रतिपल अपने  प्रिय की प्रतीक्षा में आँखों के प्रकाश को भी नहीं बचा पा रही। उसके लिए इस मृत्यु लोक में शायद कुछ भी शेष नहीं बचा। वास्तव में मृत्युलोक और स्वर्गलोक की कल्पना तो शुभ्र चाँदनी के शीश महल की भ्रान्ति भ्रमजाल सी ही है। हम अज्ञानता वश उससे परिचित नहीं होते। यद्यपि सभी को मालूम है कि सृष्टि मात्र किसी एक आनन में संकुचित नहीं हो सकती। कवयित्री डा० तारा सिंह ने प्रकृति के स्वर्णिम किरणों को तरुओं के पत्तों और फ़ूलों का चुम्बन लेते देखा है। उसकी दृष्टि में प्रकृति आनन्दमयी वसुधा में प्रस्तुत तारिकाओं की एक किरण है। वह चाहती है कि अगर तुम्हारा साथ मिल जाये तो मृत्यु को भी स्नेह से स्वीकार कर लूँ। यही व्यथा कथा ही जगती का स्पन्दन है और उसी चितवन को वह निहारते और अनुभव करते हुए देखना चाहती  है। प्रेम तो करुणा और अश्रुओं के मिश्रण से प्रतिपल बढ़ता रहता है। कवयित्री कह रही है कि यदि तुम्हारे पास समय हो तो मैं स्मृति के पंखों पर चढ़कर तुम्हारे साथ चल सकती हूँ। वह कह रही है कि मेरे भाग्य के आकाश में पूर्व दिशा की ओर जो धुँधली रेखाएँ हैं, वही प्रणय की किरणें हैं। उसी में उसके हृदय के प्राणों का प्रणय चित्र विद्यमान रहता है।

काव्याभिव्यक्ति में यग्य की धधकती ज्वाला का चित्रांकन बड़ी ही सूक्ष्म दृष्टि से किया गया है। संतानों के पालन-पोषण में होने वाली तपस्या का अनुभव कोई भुक्त भोगी ही जानता है। तपस्या से, संयम से जोड़ा हुआ बल भी टूट सकता है। यही कारण है कि उपेक्षामय यौवन के भीतर मधुरिम  मधु के खजानों का एक झरना बहने को आतुर है। उन रंगोम को भरने का विश्वास कविता के प्रत्येक छंद में है, प्रत्येक अलंकार में प्रीति के सुधारस के रूप में तपस्वी स्वीकार करने को तैयार रहता है।

इस तरह की काव्याभिव्यक्ति प्रस्तुत कविता संग्रह की प्रत्येक कविता में  डा० तारा सिंह ने उड़ेलने का प्रयास किया है। संकलन काव्य प्रेमियों और साहित्य मनीषियों को अवश्य ही सन्तुष्टि प्रदान करने वाला होगा। --- अस्तु ।

 



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