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| 03.22.2008 |
| मोहब्बत के जज़्बे फ़ना हो गये डा० (श्रीमती) तारा सिंह |
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मोहब्बत के जज़्बे फ़ना हो गये
मेरे दोस्त क्या से तुम क्या हो गये कभी आरज़ू थी, निकले दम तुम्हारा मेरे दर के आगे, उसके क्या हो गये कहते थे, लो आ गया क़ातिल तुम्हारा दोनों हाथ बाँधे उनके क्या हो गये वो बेबाकी के दिन, याद है मुझको तुम्हारे मोहब्बत के जज़्बे को क्या हो गये जब भी मिले तुम, मिले मुसकुरा के आज नज़रों को ये क्या हो गये |
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