अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
06.18.2007
 
दीप्ति ही तुम्हारी सौन्दर्यता है
डा० (श्रीमती) तारा सिंह

तुम ज्वलित अग्नि की सारी प्रखरता को
समेटे बैठी रहो
, नववधू - सी मेरे हृदय में
दीप्ति ही तुम्हारी सौन्दर्यता है
, इसे चिनगारी
बन छिटकने मत दो इस अभिशप्त भुवन में
 

तुम्हारे कमल नयनों से जब रेंगती हुई
निकलती है आग
, मैं दग्ध हो जाता हूँ
दरक जाता है मेरा वदन
, जैसे आवे में
दरक जाता है कच्ची मिट्टी का पात्र
 

मेरी बाँहों में आओ, मेरे हृदय की स्वामिनी
कर लेने दो अपने प्रेम व्योम का  विस्तार
दो फलक दो
, दो उरों से मिल लेने दो सरकार
अंग - अंग तुम्हारा जूही
, चमेली और गुलाब
चंद्र विभा
,चंदन-केसर तुम्हारे पद-रज का मुहताज

सूख चला गंगा - यमुना का पानी
हेम कुंभ बन भर जाओ तुम
यात्री हूँ
, थका हुआ हूँ , दूर देश से
आया हूँ
, दे दो अपने काले गेसुओं की साँझ तुम 

अँधकार के महागर्त में देखना एक दिन
सब कुछ गुम हो जायेगा
, तुम्हारी ये
जवानी
, अंगों की रवानगी, सभी खो जायेंगी
इसलिए आओ
, खोलो अपने लज्जा -पट को
अधरों
के शुचि-दल को एक हो जाने दो
डूबती हुई किश्तियों से किलकारी उठने दो
 



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें