| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 06.18.2007 |
|
दीप्ति ही तुम्हारी सौन्दर्यता है डा० (श्रीमती) तारा सिंह |
|
तुम ज्वलित अग्नि की सारी प्रखरता को
तुम्हारे कमल नयनों से जब रेंगती हुई
मेरी
बाँहों में आओ,
मेरे
हृदय की स्वामिनी
सूख
चला गंगा - यमुना का पानी
अँधकार के महागर्त में देखना एक दिन
|
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|