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ISSN 2292-9754

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05.19.2017


ज़िद की बात नहीं

है कौन जिसे दर्द का एहसास नहीं होता
सब कुछ होते हुए भी, कुछ पास नहीं होता

चल देते हैं छोड़, क़रीबी लोग अचानक
लुट जाने का मन को आभास नहीं होता

मै अपने तर्कों की दुनिया में हूँ तनहा
तेरी दख़ल यहाँ कोई, ख़ास नहीं होता

हर शाम बुझा रहता, ये दिल एहतियातन
जुगनू अच्छे लगते, जब उजास नहीं होता

समझा के रखता हूँ दिल-ए-नादां को तभी
ज़िद की बात नहीं, बहुत उदास नहीं होता


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