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ISSN 2292-9754

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10.05.2016


ये है निज़ाम तेरा

२२१२ २२१२ २२१२ १२१२

दरवेश के हर हुजरे से अब मेहमां हटाइए
जो लाश ले चलती ग़रीबी, दरमियाँ हटाइए

बार-ए-गिरेबां को कलफ़ न मिले जहाँ नसीब में
तहज़ीब की अब उस कमीज़ से गिरेबां हटाइए

ये है निज़ाम तेरा, सफ़ीना सोच कर उतारना
चलती हवा दरिया से बे-मकसद तुफ़ां हटाइए

उनको बिछा दो मखमली कालीन मगर साहेब
उम्मीद की बुनियाद हों काँटे, वहाँ हटाइए

जाने कोई क्यों खटकता है आँख में दबा-दबा
अब हो सके मायूस नज़रें अँखियाँ हटाइए

दरवेश = संत
हुजरे= निजी कमरा
बार-ए-गिरेबाँ- कमीज़ के कॉलर का वज़न
नि्ज़ाम = व्यवस्था, सफ़ीना=नाव


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