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ISSN 2292-9754

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05.04.2016


ये ज़ख़्म मेरा

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ये ज़ख़्म मेरा, भरने लगा है
शहर इस नाम से, डरने लगा है

विष के प्याले, हाथों नहीं थे
'नस' ज़हर कैसे, उतरने लगा है

हाथ किस के आया, बीता जमाना
'पर' समय कौन, कुतरने लगा है

भूल रहने की, टूटी कवायद
रह-रह के अक़्स उभरने लगा है


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