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ISSN 2292-9754

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05.18.2016


वर्तमान परिवेश में साहित्यकारों की भूमिका
(दोहे)

लिखिए कुछ ऐसा मनुज, सज उठे वर्तमान
हो टक्कर की लेखनी, रख आत्मसम्मान

कोलाहल हो 'जग' अगर, बनो शान्ति के दूत
ले चरखा फिर हाथ में, सुख के कातो सूत

घुले वाणी में अमृत, रहे मधुर आवाज़
परिपाटी हो स्थापना, जिसको कहें रिवाज़

तुमसे क्या-क्या माँगता, व्याकुल आज समाज
स्वर्ण नोक बना क़लम, पहना दो फिर ताज

स्वारथ सभी छोड़ दो, त्याग दो अहंकार
परमार्थ में जी लगा, जानो तुम संसार


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