अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.22.2016


रोने की हर बात पे

रोने की हर बात पे कहकहा लगाते हो
ज़ख़्मों पर जलता, क्यूँ फाहा लगाते हो

गिर न जाए आकाश, से लौट के पत्थर
अपने मक़सद का, निशाना लगाते हो

हाथों हाथ बेचा करो, ईमान-धरम तुम
सड़कों पे नुमाइश, तमाशा लगाते हो

फूलो से रंज तुम्हें, ख़ुशबू से परहेज़
बोलो किन यादों फिर, बग़ीचा लगाते हो

छन के आती रौशनी, बस उन झरोखों से
संयम सुशील मन, से शीशा लगाते हो


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें