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ISSN 2292-9754

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06.23.2017


मिल रही है शिकस्त

 2122 2122 2122 212
मिल रही है शिकस्त, चारों तरफ़ नाकामियाँ
उतरने को आ गईं पहनी हुई अब टोपियाँ

चमन जो गुलज़ार था, आती कहाँ थी मुश्किलें
पतझड़ों के ख़ौफ़ अब, आती नहीं हैं तितलियाँ

ये जबीं मेरे लिखा है कौन, काजल से तुझे
आ गई मेरे क़रीब, ज़माने की दुश्वारियाँ

तू सियासत माहिरों की, महफ़िलों से उठ के आ
अब वहाँ मिलती कराहें, आह भरती सिसकियाँ

सब नसीबों खेलते हैं, बन करोड़ों जाए हैं
रात-दिन केवल गिनो, अपनी कमी नाकामियाँ


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