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ISSN 2292-9754

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12.30.2015


मैं सपनों का ताना बाना

मैं सपनों का ताना बाना, यूँ अकेले बुना करता हूँ
मंदिर का करता सजदा, मस्जिद भी पूजा करता हूँ

मिलती फुरसत, मुझको जिस दिन, दुनिया के कोलाहल से
राम रहीम की बस्ती, अलगू जुम्मन ढूँढा करता हूँ

जब-जब बादल और धुएँ, बारूदी ख़ुशबू मिल जाती
उस दिन घर आँगन, छुप-छुप पहरों मैं रोया करता हूँ

मज़हब-धर्म के रखवाले, इतने गहरे उतर न पाते
जिस सुलह की गहराई से, मैं मोती साफ़ चुना करता हूँ

हम सब ले कर चलते, तर्कों के अपने-अपने मुखड़े
मेरी शक़्ल से तुम हो वाक़िफ़ किस दिन मैं छुपा करता हूँ


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