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ISSN 2292-9754

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04.13.2017


जिसे सिखलाया बोलना

चश्म नम और दामन तर होने लगा
ज़िन्दगी सादगी से बसर होने लगा

जो निचोड़ के रखा है अपना आस्तीन
अब पसीने से नम कालर होने लगा

दाउदों के पते पूछो तो हम कहें
पाक-दोहा कभी तो कतर होने लगा

बाज आऊँ बुरी हरकत से मैं कभी
मय नशी में इधर-ऊधर होने लगा

अब मेरी मंज़िलों के मिलते हैं निशान
पाँव के छालों का असर होने लगा

बेज़बां बुत जिसे सिखलाया बोलना
पलटते ही मेरे पत्थर होने लगा


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