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ISSN 2292-9754

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03.15.2017


इतने गहरे घाव

२१२२ २१२२ २१२२ २२२
ख़ौफ़ रहजन का रखे हो, दर खुला भी रखते हो
कोई घर में अजनबी , अपने सिवा भी रखते हो

जानता हूँ मै हक़ीक़त सब, वफ़ाओं की तेरी
याद के दश्त में भटकने का, सिला भी रखते हो

आइना किस काम का यूँ, लोग कहते हैं पागल
चेहरे में सब जहाँ के गम, मिला भी रखते हो

तुम उसी की सोचते, हैरान हुए जाते हरदम
वो तबाही सोचता, उस पे दुआ भी रखते हो

हाथ बँधे, पाँव बेड़ी डाल दी अगर किसी ने
बोल दो फूटे ज़रा, मुँह में ज़ुबां भी रखते हो

घाव इतने भी तहों तक, ना उतारा कर दिल में
सोच में अपनी जिसे, सालों हरा भी रखते हो

हो गया था जीतना तय, बस उसी दिन तुम्हारा
राम मुँह में, जेब लेकिन, उस्तरा भी रखते हो

टूट जाते लोग चाहत को कंधे पर बैठाए
तुम इस जहां के नहीं जो हौसला भी रखते हो


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