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ISSN 2292-9754

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02.19.2016


हथेली में सरसों कभी मत उगाना

१२२ १२२ १२२ १२२

हथेली में सरसों कभी मत उगाना
अगर हो सके तो हमें भूल जाना

सितारों के आगे जहां क्या बनाए
बिखरता दिखे है, लुटा सा ज़माना

कभी बदलियाँ हों उधर यूँ समझना
कुहासे घिरा है मेरा आशियाना

क़वायद ये कैसी, कहानी कहाँ की
हमें ख़ुद शर्म से, पड़ा सर झुकाना

न चाहत के दम भरते, रोते कभी भी
शिकायत का लहज़ा न लगता पुराना


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