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ISSN 2292-9754

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10.06.2014


बचे हुए कुछ लोग ....

लक्ष्य का हमको पता नहीं, पतवार लिए हैं
हम गांधारी के बेटों जैसा, संस्कार लिए हैं

हम बेच कहाँ पाते हैं, ईमान टके भाव
अपने-अपने मन का सब, बाजार लिए हैं

भूख-ग़रीबी, हाशियों में भी विज्ञापित
यूँ आगामी कल का देखो, अख़बार लिए हैं

वे अहिंसा के पुजारी, किताबों में चले गए
बचे हुए कुछ लोग यहाँ, तलवार लिए हैं


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