सुशील यादव

व्यंग्य
एक झोला छाप वार्ता......
गड़े मुर्दों की तलाश....
चलो लोहा मनवायें
जंगल विभाग
जो ना समझे वो अनाड़ी है
तू काहे न धीर धरे ......।
दाँत निपोरने की कला
दिले नादां तुझे हुआ क्या है ...?
नन्द लाल छेड़ गयो रे
नया साल, अपना स्टाइल
नास्त्रेदमस और मैं...
निर्दलीय होने का सुख
पत्नी की मिडिल क्लास, "मंगल-परीक्षा"
पीर पराई जान रे ..
बदला... राजनीति में
भावना को समझो
विलक्षण प्रतिभा के "लोकल" धनी
सठियाये हुओं का बसंत
सिंघम रिटर्न ५३ ....
दीवान
अपनी सरकार
आज़ादी के क्या माने वहाँ
इतने गहरे घाव
इश्तिहार निकाले नहीं
उन दिनों ये शहर...
कब किसे ऐतबार होता है
कभी ख़ुद को ख़ुद से
कोई सबूत न गवाही मिलती
गर्व की पतंग
जब आप नेक-नीयत
जले जंगल में
ज़िद की बात नहीं
जिसे सिखलाया बोलना
जुर्म की यूँ दास्तां लिखना
तन्हा हुआ सुशील
तू मेरे राह नहीं
तेरी दुनिया नई नई है क्या
प्यासे को पानी
बचे हुए कुछ लोग ....
बस ख़्याले बुनता रहूँ
बिना कुछ कहे सब अता हो गया
तुम नज़र भर ये
तो ग़ज़ल होती है
भरी जवानी में
मिल रही है शिकस्त
मैं सपनों का ताना बाना
यूँ आप नेक-नीयत
ये ज़ख़्म मेरा
ये है निज़ाम तेरा
रूठे से ख़ुदाओं को
रोने की हर बात पे
वही अपनापन ...
वो परिंदे कहाँ गए
शहर में ये कैसा धुँआ हो गया
सफ़र में
समझौते की कुछ सूरत देखो
सहूलियत की ख़बर
साथ मेरे हमसफ़र
हथेली में सरसों कभी मत उगाना
कविता
पिता की अस्थियाँ
वर्तमान परिवेश में साहित्यकारों की भूमिका