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05.06.2012


लिखता हूँ कविता

बेचने के लिए नहीं लिखता था कविता
इसलिए लिखता रहा
और तकिये के नीचे दबाता रहा

कुछ ग़ुम हो गयीं और कुछ ग़ुम कर दी गयीं
कुछ कुम्हलाई सी सोयी रहीं चुपचाप
कुछ रूठीं रहीं मुझसे कई बरस
कुछ सरक कर फ़र्श पर आ गिरीं
कुछ ने रेंगना शुरू कर दिया
कुछ चीखने लगीं
कुछ उछालने लगीं हवा में नारे
कर के अपनी मुठ्ठी बंद दस्तक देने लगीं
प्रकाशकों के दरवाज़ों पर
कुछ मंच देखते ही चढ़ बैठीं और तांडव कर डाला

बेचने के लिए नहीं लिखता था
इसलिए कोई मोल भी न लगाया इनका
अनमोल हैं ये
लेकिन अब कमज़ोर नहीं है
कि तकिये से मुँह दबा दूँ इनका

चीखतीं हैं अब, उठ खड़ी होती हैं
कभी-कभी मेरे भी ख़िलाफ़

ये मेरी नहीं रह गयीं हैं अब
उनकी हैं जिनकी आवाज़ रह गयी है
दबी हुई सी
उनकी है जिनकी आत्मा में
दबे हैं बगावत के शोले

लिखता हूँ कविता, बेचता नहीं हूँ
इसलिए मौकापरस्त नहीं बल्कि
ज़ुल्मों सितम की काली कोठरी में
बग़ावत का चिराग़ हैं कवितायें मेरी


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