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| 02.16.2008 |
| ढीली पड़ती मुट्ठियाँ सुशील कुमार |
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मेरी मुट्ठी में डाल थी माँ ने
बाबूजी ने रख दिये थे उसमें
दीदी को खुशहाल घर ब्याहने का सपना,
पत्नी के उदास चेहरे से झाँकती उम्मीदें,
मित्रों के चंद सुझाव, पर हर दिन ढीली पड़ रही थी मेरी मुट्ठी।
उँगलियों के खुलते कसाव के बीच
कोई तोड़ रहा था चुपके-चुपके
मैं कालचक्र में फँसा, घूमता हुआ
मैं कोई कविता नहीं कर रहा भाई, |
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